धमतरी में बाढ़ का प्रहार: 4000 हेक्टेयर में धान की फसल तबाह, बीमा के बाद भी किसानों के हाथ खाली!Dhamtari Deluge: 4000 Hectares of Paddy Crops Submerged; No Relief Despite PM Crop Insurance!धमतरीमण्डले जलप्लवः: ४००० हेक्टरमिते क्षेत्रे धान्यशस्यं निमग्नम्, बीमा-योजनानन्तरमपि न लाभः!

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धमतरी: छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में पिछले दो दिनों से जारी मूसलाधार बारिश और बाढ़ ने खरीफ सीजन की तैयारियों पर पानी फेर दिया है। खेतों में पककर तैयार हो रही सैकड़ों किसानों की धान की फसल अब पूरी तरह पानी में डूब चुकी है। कृषि विभाग के शुरुआती सर्वे के मुताबिक, जिले की लगभग 4000 हेक्टेयर (यानी करीब 10,000 एकड़) धान की फसल इस आपदा से प्रभावित हुई है।

किस फसल को कितना नुकसान?

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस बाढ़ का सबसे ज्यादा नुकसान अर्ली वैरायटी (जल्दी पकने वाली धान) और ‘गबोद अवस्था’ (तैयार होने की कगार पर खड़ी फसल) को होने की आशंका है, क्योंकि पानी में डूबे रहने से इनके सड़ने का खतरा सबसे अधिक है। वहीं, राहत की बात सिर्फ इतनी है कि लेट वैरायटी (देर से पकने वाली धान) की फसल फिलहाल अपेक्षाकृत सुरक्षित बताई जा रही है। फिर भी, किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं।

उपसंचालक कृषि मोनेश कुमार साहू के मुताबिक लगातार बारिश और बाढ़ के चलते करीब 4 हजार हेक्टेयर धान की फसल प्रभावित हुई है। खेतों से पानी निकालने का काम शुरू कर दिया गया है, लेकिन तैयार हो चुकी अर्ली वैरायटी की धान को सबसे ज्यादा नुकसान होने की आशंका है। वहीं गबोद अवस्था में पहुंच चुकी फसल पर भी प्रत

फसल बीमा कराने के बावजूद किसानों को नहीं मिलेगा मुआवजा.

खेतों में जमा पानी की समय पर निकासी हो जाए तो जलमग्न धान की फसल को काफी हद तक बचाया जा सकता है। हालांकि, यदि लंबे समय तक खेतों में पानी भरा रहा तो धान के पौधों के गलने-सड़ने और फसल को नुकसान पहुंचने की आशंका बढ़ जाएगी।

महानदी तटवर्ती और बाढ़ से प्रभावित किसानों ने धान की फसल का प्रधानमंत्री फसल बीमा कराया है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में उन्हें बीमा का लाभ मिलने की संभावना नहीं है। योजना के नियमों के तहत कटाई के बाद 14 दिनों के भीतर खेत में पानी भरने से होने वाले नुकसान को ही निर्धारित शर्तों के अनुसार बीमा कवरेज में शामिल किया जाता है। धान को पानी में उगने वाली फसल माना जाता है, ऐसे में इस बार बाढ़ से हुए नुकसान के लिए प्रभावित किसानों को बीमा योजना के तहत मुआवजा दिए जाने का प्रावधान नहीं बताया गया है।

सरकार के समक्ष भेजा गया प्रस्ताव.

बाढ़ और अतिवृष्टि से फसल नुकसान झेल रहे किसानों को राहत देने के उद्देश्य से इस वर्ष धान को जलीय फसल मानकर बीमा कवरेज का लाभ देने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। प्रस्ताव को मंजूरी मिलने पर भविष्य में बाढ़ जैसी परिस्थितियों में प्रभावित किसानों को फसल बीमा योजना के दायरे में राहत मिल सकेगी।

(English)

Dhamtari: Torrential rains and floods over the past two days in the Dhamtari district of Chhattisgarh have ruined the preparations for the Kharif season. The paddy crop of hundreds of farmers, which was ripening and ready in the fields, is now completely submerged in water. According to the initial survey by the Agriculture Department, about 4,000 hectares (nearly 10,000 acres) of paddy crops in the district have been affected by this disaster.

Which crop suffered how much damage?

According to agricultural experts, this flood is feared to cause the maximum damage to the early variety (early ripening paddy) and the ‘Gabod stage’ (crop standing on the verge of being ready), because being submerged in water poses the highest risk of them rotting. On the other hand, the only matter of relief is that the late variety (late ripening paddy) crop is currently being described as relatively safe. Even so, lines of worry have deepened on the foreheads of the farmers.

Deputy Director of Agriculture Monesh Kumar Sahu said that nearly 4,000 hectares of paddy crops have been affected due to heavy rainfall and flooding. Water drainage from the fields has begun, but early-variety paddy that has already matured is expected to suffer the most damage. Crops at the gabod stage are also likely to be impacted. Agricultural fields in several villages, including Mujgahan, Ratnabandha, Potiyadih, Parastarai, Khartuli, Koliyari, Achhota, Telinsatti, Rudri, Kharenga, Devpur, Mudpar, Barari and Kotabharri, remain submerged.

Farmers May Not Receive Compensation Despite Crop Insurance.

If excess water is drained from the fields in time, a significant portion of the submerged paddy crop can still be saved. However, prolonged waterlogging may cause the paddy plants to rot, increasing the risk of extensive crop damage.

Farmers living along the Mahanadi and those affected by the floods had insured their paddy crops under the Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana, but under the existing provisions, they may not be eligible for compensation in the current situation. As per the scheme guidelines, waterlogging-related crop losses occurring within 14 days after harvesting are covered only under specified conditions. Although paddy is considered a water-growing crop, there is reportedly no provision under the scheme to provide insurance benefits for the flood-related losses suffered by farmers this time.

Proposal Submitted to the Government.

A proposal has been sent to the government seeking insurance coverage for paddy this year by treating it as an aquatic crop, with the aim of providing relief to farmers affected by floods and excessive rainfall. If approved, the proposal could enable farmers facing similar flood-related crop losses in the coming years to receive benefits under the crop insurance scheme.

(संस्कृत)

धमतरी: छत्तीसगढ़राज्यस्य धमतरीमण्डले विगतद्विदिवसात् प्रचलन्त्याः मुसलधारवृष्ट्याः पूरस्य च कारणेन खरीफ-ऋतोः सज्जाः निष्फलाः अभवन्। क्षेत्रेषु पक्वाः सिद्धाः च शतशः कृषकाणां धान्यफसलाः (शालिक्षेत्राणि) अधुना पूर्णरूपेण जले निमग्नाः सन्ति। कृषिविभागस्य प्रारम्भिकसर्वेक्षणानुसारं मण्डले प्रायः ४००० हेक्टेर् (अर्थात् प्रायः १०,००० एकड्) परिमिता शालिफसला एतया आपदा प्रभाविता अस्ति।

कस्याः फसलस्य (शस्यस्य) कति हानिः?

कृषिविशेषज्ञानां मतेन, अस्य पूरस्य सर्वाधिकं हानिः शीघ्रपक्वायां प्रजातौ (शीघ्रं पच्यमाने धान्ये) तथा ‘गबोद-अवस्थायाम्’ (सज्जीभवनस्य कगार पर स्थितायां शस्यशकट्याम्) भवितुं सम्भावना अस्ति, यतो हि जले निमज्जनात् एतेषां सडनस्य (कोथस्य) भयम् उच्चतमं वर्तते। अपरपक्षे, केवलम् एतावान् एव राहतस्य (आश्वासनस्य) विषयः अस्ति यत् विलम्बपक्वा (देर से पकने वाली धान) शस्यप्रजातिः इदानीं अपेक्षाकृतं सुरक्षिता कथ्यते। तथापि, कृषकाणां भालपटलेषु चिन्तायाः रेखाः गभीराः अभवन्।

कृषि-उपनिदेशकः मोनेशकुमारः साहू अवदत् यत् अतिवृष्टेः जलप्लावनस्य च कारणेन प्रायः चतुःसहस्र हेक्टेयर-मितं धान्यफलं प्रभावितम् अस्ति। क्षेत्रेभ्यः जलनिर्गमनस्य कार्यं प्रारब्धम् अस्ति। प्रारम्भिक-प्रकारस्य परिपक्वं धान्यफलं सर्वाधिकं क्षतिग्रस्तं भवितुम् आशङ्क्यते। गबोद-अवस्थायां वर्तमानस्य धान्यस्य अपि प्रतिकूलः प्रभावः भविष्यति। मुजगहन, रत्नाबान्धा, पोटियाडीह, परसतराई, खर्‍तुली, कोलियारी, अछोटा, तेलीनसत्ती, रुद्री, खरेंगा, देवपुर, मुड़पार, बरारी, कोटाभर्री इत्यादिषु ग्रामेषु कृषिक्षेत्राणि जलेन निमग्नानि सन्ति।

पीमां कृत्वापि कृषकेभ्यः क्षतिपूर्तिः न प्राप्स्यते।

क्षेत्रेषु संचितस्य जलस्य समये निर्गमनेन जलमग्नं धान्यफलं बहुधा रक्षितुं शक्यते। किन्तु दीर्घकालपर्यन्तं क्षेत्रेषु जलसञ्चयः भवति चेत् धान्यपादपानां सडनस्य नाशस्य च सम्भावना वर्धते।

महानदी-तटवर्तिनः तथा जलप्लावनेन प्रभाविताः कृषकाः धान्यफलं प्रधानमन्त्रि-फसल-बीमा-योजनया बीमितवन्तः, किन्तु वर्तमानपरिस्थितौ तेभ्यः बीमालाभः न प्राप्येत इति सम्भावना अस्ति। योजनायाः नियमानुसारं कटाईनन्तरं चतुर्दशदिनानां अन्तः क्षेत्रेषु जलसञ्चयेन उत्पन्नं हानिः निर्धारितपरिस्थितिषु एव बीमासुरक्षायां समावेश्यते। धान्यं जलाधारितं फलं मन्यते, तथापि अस्मिन् वर्षे जलप्लावनेन प्रभावितानां कृषकाणां कृते बीमायोजनायाः अन्तर्गतं क्षतिपूर्तिप्रदानस्य प्रावधानं नास्ति।

शासनस्य समक्षं प्रस्तावः प्रेषितः।

जलप्लावनेन अतिवृष्ट्या च प्रभावितानां कृषकाणां साहाय्यार्थं धान्यं जलीयफलं मत्वा अस्मिन् वर्षे बीमालाभं प्रदातुं प्रस्तावः शासनाय प्रेषितः अस्ति। यदि अयं प्रस्तावः स्वीकृतः भवति, तर्हि भविष्यत्काले जलप्लावनसदृशेषु परिस्थितिषु प्रभावितेभ्यः कृषकेभ्यः फसल-बीमायोजनायाः लाभः प्राप्तुं शक्यते।

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