छत्तीसगढ़ धर्मांतरण कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी.Supreme Court Issues Notice to Centre and Chhattisgarh Government Over Conversion Law. छत्तीसगढस्य धर्मान्तरणविधेयकविषये सर्वोच्चन्यायालयेन केन्द्राय राज्यसर्वकाराय च सूचना प्रेषिता.
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के धर्मांतरण विरोधी कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत ने दोनों सरकारों को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। साथ ही, इस मामले को उत्तर प्रदेश और राजस्थान के धर्मांतरण विरोधी कानूनों के खिलाफ पहले से लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ दिया है, ताकि इन सभी मामलों पर एक साथ सुनवाई की जा सके।

याचिका में कानून के कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाए गए हैं। इनमें धर्म परिवर्तन से पहले 30 दिन की पूर्व सूचना देने की अनिवार्यता और धर्म वापसी के लिए दी गई छूट जैसे प्रावधान शामिल हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ये नियम नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर सकते हैं। अब इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार के जवाब के बाद कानून की संवैधानिक वैधत
ईसाई आदिवासी महासभा की ओर से दायर याचिका में छत्तीसगढ़ विधानसभा द्वारा मार्च महीने में पारित किए गए कड़े धर्मांतरण विरोधी कानून को चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत नागरिकों को प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को प्रभावित करता है। याचिका में यह भी कहा गया है कि बेहतर जीवनशैली का आश्वासन देना या किसी धर्म की प्रशंसा करना भी कानून के तहत अवैध प्रलोभन माना जा सकता है। इससे सामान्य धार्मिक प्रचार और मानवीय सहायता से जुड़े कार्यों के भी अपराध की श्रेणी में आने की आशंका जताई गई है।
याचिका में कानून के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं पर भी गंभीर आपत्ति जताई गई है। नए प्रावधानों के अनुसार, धर्म परिवर्तन करने के इच्छुक व्यक्ति को पहले इसकी सूचना देनी होगी। इसके बाद इस सूचना को ग्राम पंचायत और संबंधित स्थानीय पुलिस थाने के नोटिस बोर्ड पर सार्वजनिक किया जाएगा।
याचिकाकर्ता ने इस व्यवस्था को व्यक्ति की निजता और अपनी पसंद से निर्णय लेने की स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया है। इसके अलावा, कानून में मूल धर्म या पूर्वजों के धर्म में वापसी को इसके दायरे से बाहर रखने वाले प्रावधान पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिका में इस व्यवस्था को अस्पष्ट और भेदभावपूर्ण बताते हुए इसकी निष्पक्षता पर आपत्ति दर्ज की गई है।
छत्तीसगढ़ के धर्मांतरण विरोधी कानून में सामूहिक धर्मांतरण के मामलों के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान रखा गया है। वहीं, महिलाओं, नाबालिगों तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों से जुड़े धर्मांतरण के मामलों में दोषी पाए जाने पर 7 से 10 वर्ष तक की कठोर सजा का प्रावधान है।
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की। पीठ ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू होने के साथ ही इस कानून की संवैधानिक वैधता और भविष्य को लेकर न्यायिक समीक्षा की प्रक्रिया आगे बढ़ गई है।
English
The Supreme Court has issued notices to the Central and Chhattisgarh governments while hearing a petition challenging the constitutional validity of the state’s anti-conversion law. The court has directed both governments to submit their responses. It has also tagged the case with pending petitions challenging similar anti-conversion laws in Uttar Pradesh and Rajasthan, allowing the related matters to be heard together.
Senior advocate Colin Gonsalves, appearing on behalf of the petitioner, argued before the Supreme Court that the law infringes upon the fundamental right to religious freedom guaranteed under Article 25 of the Constitution. The petition also contends that promising a better lifestyle or praising a religion could be classified as unlawful inducement under the legislation. According to the plea, this could potentially bring ordinary religious preaching and humanitarian activities within the scope of criminal offences.
The petition has also raised serious objections to the procedures prescribed under the law. According to the new provisions, anyone intending to convert to another religion must provide prior notice of their intention. The notice is then made public on the notice boards of the gram panchayat and the local police station.
The petitioner has argued that this public disclosure process infringes upon an individual’s privacy and autonomy in making personal decisions. The plea has also questioned the provision that excludes reconversion to one’s original or ancestral religion from the scope of the law, describing the exemption as ambiguous and discriminatory.
Chhattisgarh’s anti-conversion law prescribes life imprisonment in cases involving mass religious conversions. It also provides for rigorous imprisonment ranging from seven to ten years in cases involving the conversion of women, minors, and members of Scheduled Castes and Scheduled Tribes.
The matter was taken up by a bench comprising Chief Justice Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi, and Justice V. Mohana. The bench issued notices to the Central and Chhattisgarh governments, seeking their responses. With the commencement of the proceedings, judicial scrutiny of the law’s constitutional validity and its future has begun in the Supreme Court.
संस्कृति
छत्तीसगढस्य धर्मान्तरणविरोधिनः अधिनियमस्य संवैधानिकवैधतां चुनौतीं ददतीं याचिकां श्रुत्वा सर्वोच्चन्यायालयेन केन्द्रसर्वकाराय तथा छत्तीसगढराज्यसर्वकाराय सूचनापत्राणि प्रेषितानि। न्यायालयेन उभयोः सर्वकारयोः स्वपक्षं प्रस्तुतं कर्तुं निर्देशः दत्तः। अस्य प्रकरणस्य उत्तरप्रदेशस्य राजस्थानस्य च धर्मान्तरणविरोधिनः अधिनियमयोः विरुद्धं लम्बमानाभिः याचिकाभिः सह संयोजनमपि कृतम्, येन सर्वेषां प्रकरणानां संयुक्तरूपेण श्रवणं भवितुं शक्नुयात्।
याचिकाकर्तुः पक्षतः उपस्थितेन वरिष्ठाधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस-महोदयेन सर्वोच्चन्यायालये तर्कः प्रस्तुतः यत् अयं अधिनियमः संविधानस्य पञ्चविंशतितमस्य अनुच्छेदस्य अन्तर्गतं नागरिकेभ्यः प्रदत्तस्य धार्मिकस्वातन्त्र्यस्य मौलिकाधिकारस्य उल्लङ्घनं करोति। याचिकायाम् एतदपि कथितम् अस्ति यत् उत्तमजीवनशैल्याः आश्वासनं दानम् अथवा कस्यचित् धर्मस्य प्रशंसा अपि अस्मिन् अधिनियमे अवैधप्रलोभनस्य अन्तर्गतं गण्येत। एतेन सामान्यधार्मिकप्रचारः तथा मानवीयसेवासम्बद्धाः कार्याणि अपि अपराधस्य श्रेण्यां समाविष्टानि भवितुम् अर्हन्ति इति आशङ्का व्यक्ता कृता।
याचिकायां विधाने निर्धारिताः प्रक्रियाः अपि गम्भीरतया आक्षेपिताः सन्ति। नूतनप्रावधानानुसारं धर्मान्तरणम् इच्छुः व्यक्तिः पूर्वमेव स्वेच्छायाः सूचना दातुम् अर्हति। ततः सा सूचना ग्रामपञ्चायतस्य तथा सम्बन्धितस्य स्थानीयपुलिसस्थानकस्य सूचनाफलके सार्वजनिकरूपेण प्रदर्श्यते।
याचिकाकर्त्रा एषा सार्वजनिकसूचनायाः प्रक्रिया व्यक्तेः गोपनीयतायाः स्वनिर्णयस्वातन्त्र्यस्य च उल्लङ्घनम् इति कथिता। अपि च, स्वमूलधर्मे अथवा पूर्वजानां धर्मे पुनरागमनम् अस्य अधिनियमस्य क्षेत्रात् बहिः स्थापयितुं यत् प्रावधानम् अस्ति, तस्यापि प्रश्नः उत्थापितः। याचिकायां तत् प्रावधानम् अस्पष्टं पक्षपातपूर्णं च इति वर्णितम्।
छत्तीसगढस्य धर्मान्तरणविरोधिनि अधिनियमे सामूहिकधर्मान्तरणस्य प्रकरणेषु आजीवनकारावासस्य प्रावधानम् अस्ति। महिलानां, अवयस्कानां, अनुसूचितजातीनां तथा अनुसूचितजनजातीनां व्यक्तीनां धर्मान्तरणसम्बद्धेषु प्रकरणेषु दोषसिद्धौ सप्तवर्षेभ्यः दशवर्षपर्यन्तं कठोरकारावासस्य दण्डः निर्धारितः अस्ति।
अस्य प्रकरणस्य श्रवणं मुख्यन्यायाधीशस्य सूर्याकान्तस्य, न्यायमूर्तेः जॉयमाल्या बागची-महोदयस्य तथा न्यायमूर्तेः वी. मोहना-महोदयस्य पीठेन कृतम्। पीठेन केन्द्रसर्वकाराय छत्तीसगढराज्यसर्वकाराय च सूचनापत्राणि प्रेषितानि तथा उत्तरं प्रस्तुतकर्तुं निर्देशः दत्तः। सर्वोच्चन्यायालये श्रवणस्य प्रारम्भेन अस्य अधिनियमस्य संवैधानिकवैधतायाः भविष्यस्य च न्यायिकसमीक्षाप्रक्रिया प्रारब्धा अस्ति।


