धान का कटोरा या छह महीने का सूखा? छत्तीसगढ़ के खेतों से दर्द बयां करती ग्राउंड रिपोर्ट।Rice Bowl or Bowl of Joblessness? A Hard-Hitting Ground Report on Chhattisgarh’s Seasonal Unemployment.धान्याधारं (धान का कटोरा) वा षण्मासानां निरूद्योगित्वम्? छत्तीसगढ़राज्यस्य वास्तविकस्थितिः।

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रायपुर:सितंबर के अंतिम सप्ताह में छत्तीसगढ़ के खेत धान की लहलहाती फसलों से सजे हैं, जो चारों ओर खुशहाली का अहसास कराते हैं। सरकारें अपनी पीठ थपथपाने में जुटी हैं, कृषि मेलों का माहौल है और रिकॉर्ड धान खरीदी के दावे सरकारी फाइलों में दर्ज होने लगे हैं। लेकिन इस सियासी और चुनावी चमक-दमक के पीछे एक कड़वी हकीकत दबी हुई है, जिसे राज्य का अन्नदाता हर साल खामोशी से सहने पर मजबूर है।असल संकट नवंबर-दिसंबर में धान की कटाई के बाद शुरू होता है। खरीफ सीजन में हरी-भरी दिखने वाली राज्य की लगभग 83 प्रतिशत कृषि भूमि अचानक बंजर या मरुस्थल जैसी नजर आने लगती है। आधिकारिक आंकड़ों और जमीनी पड़ताल से तैयार यह खोजी रिपोर्ट बताती है कि छत्तीसगढ़ का किसान हर साल जनवरी से जून तक एक ‘अघोषित कृषि तालाबंदी’ का शिकार होकर पूरी तरह बेरोजगार हो जाता है।

सरकारी दावों में सैलाब, जमीन पर सूखा: छत्तीसगढ़ में सिंचाई के आंकड़ों का खेल।

जल संसाधन विभाग (CGWRD) के सरकारी हैंडबुक के पन्ने पलटें, तो छत्तीसगढ़ में पानी की कोई कमी नज़र नहीं आती। गर्व करने के लिए राज्य के पास 12 बड़े जलाशय (Major Dams), 34 मध्यम जलाशय और 1,770 से अधिक छोटे सिंचाई बांध मौजूद हैं। इतना ही नहीं, महानदी और गोदावरी सहित पांच प्रमुख नदी बेसिन इस राज्य से होकर गुजरती हैं, जिनसे हर साल लगभग 59,900 MCM पानी बहता है।लेकिन इस भारी-भरकम जल-वैभव के पीछे का विरोधाभास चौंकाने वाला है। नदियों और बांधों के इतने बड़े नेटवर्क के बावजूद, हमारी सरकारें इस विशाल सतही जल का महज 22 प्रतिशत हिस्सा ही सहेजने में कामयाब हो पाती हैं। नतीजा यह है कि राज्य का अरबों लीटर कीमती पानी बिना किसी उपयोग के बह जाता है और पड़ोसी राज्यों की प्यास बुझाने के काम आता है, जबकि यहाँ के खेत सूखे रह जाते हैं।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के हालिया आंकड़ों ने छत्तीसगढ़ में सिंचाई दावों की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य का शुद्ध सिंचित क्षेत्र (Net Irrigated Area) आज भी महज 23% से 28% के बीच अटका हुआ है। इसका सीधा मतलब यह है कि प्रदेश की 72 प्रतिशत से अधिक कृषि भूमि आज भी पूरी तरह से केवल ‘इंद्र देव’ यानी मानसूनी बारिश के भरोसे है।छह महीने की बेकारी और रबी का संकट:पानी की इसी प्रशासनिक कमी का नतीजा है कि खरीफ की कटाई के बाद रबी सीजन आते ही खेतों में सन्नाटा पसर जाता है। राज्य के सिर्फ 17% से 19.3% हिस्से पर ही दोबारा रबी फसलें (जैसे चना, गेहूं, अलसी) उगाई जा पाती हैं। छत्तीसगढ़ के करीब 75% से 80% किसान लघु एवं सीमांत श्रेणी में आते हैं, जिनके पास निजी नलकूप या सिंचाई के आधुनिक साधन नहीं हैं। रबी सीजन में सरकारी नहरों से पानी न मिलने के कारण, लगभग 80 प्रतिशत किसान जनवरी से जून तक पूरी तरह बेरोजगार रहने को मजबूर हैं।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के आधिकारिक आंकड़े छत्तीसगढ़ में सिंचाई की वास्तविक स्थिति को उजागर करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य का शुद्ध सिंचित क्षेत्र (Net Irrigated Area) आज भी महज 23% से 28% के बीच सिमटा हुआ है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि प्रदेश की 72 प्रतिशत से अधिक खेती के भाग्य का फैसला आज भी सिर्फ मानसूनी बारिश (इंद्र देव की कृपा) से होता है।रबी का सन्नाटा और 6 महीने की बेकारी:सिंचाई के सरकारी दावों और जमीनी हकीकत का यह अंतर रबी सीजन में साफ दिखाई देता है। खरीफ के बाद पानी की कमी के चलते राज्य के केवल 17% से 19.3% हिस्से पर ही दोबारा फसल (जैसे गेहूं, चना, अलसी) ली जा पाती है। छत्तीसगढ़ के 75% से 80% किसान लघु एवं सीमांत वर्ग में आते हैं। निजी नलकूपों के अभाव और रबी के लिए सरकारी नहरों से पानी न मिलने के कारण, लगभग 80 प्रतिशत किसानों को जनवरी से जून तक पूरी तरह बेरोजगार बैठना पड़ता है।

व्यवस्था पर तीखा कटाक्ष: छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए 6 महीने की ‘अनचाही’ सरकारी पेड-लीव!

छत्तीसगढ़ की कृषि व्यवस्था पर कड़ा प्रहार करते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य सरकार ने बिना कोई बड़ी इंडस्ट्री लगाए ही हर साल लाखों किसानों को छह महीने की ‘बिना सैलरी वाली अनिवार्य छुट्टी’ (Paid-Leave) देने का नायाब हुनर सीख लिया है। सरकारी तंत्र की प्राथमिकताएं देखिए—बांधों पर पिकनिक स्पॉट और सोशल मीडिया रील्स बनाने के लिए पर्यटन केंद्र तो चमका दिए जाते हैं, लेकिन जब वही पानी जनवरी की तपती धूप में किसान के सूखे खेतों को चाहिए होता है, तो प्रशासन ‘जल संकट’ का रेडीमेड बहाना लेकर सामने खड़ा हो जाता है।अन्नदाता से बेरोजगार मजदूर का सफर:सितंबर की इस मखमली हरियाली के बीच छत्तीसगढ़ का किसान आज भी अंदर से डरा हुआ है। उसे चिंता है कि दिसंबर के बाद जब खेत सूखेंगे, तो उसके घर का चूल्हा कैसे जलेगा। जमीनी हकीकत यह है कि जब तक इन 1,770 छोटे-बड़े बांधों और जीवनदायिनी नदियों का पानी फाइलों की कैद से छूटकर 80% खेतों तक नहीं पहुंचेगा, तब तक छत्तीसगढ़ का किसान खरीफ सीजन में सिर्फ कागज़ी ‘अन्नदाता’ और रबी सीजन में एक ‘बेरोजगार मजदूर’ बनकर रहने को अभिशप्त रहेगा।

(English)

Raipur:As September draws to a close, the lush green paddy fields of Chhattisgarh paint a picture of widespread prosperity. Governments are busy taking credit, agricultural fairs are being organized, and files are filling up with claims of record-breaking paddy procurement. However, behind this political and electoral glitz lies a grim reality that the state’s farmers are silently forced to endure year after year.The real crisis unfolds post-harvest in November and December. Nearly 83 percent of the agricultural land, which thrives during the Kharif season, suddenly transforms into a barren desert-like expanse. Combining official data with ground realities, this investigative report uncovers how farmers in Chhattisgarh fall victim to an ‘undeclared agricultural lockdown’ from January to June, leaving them completely unemployed for half the year.

Floods in Files, Drought on Ground: The Statistical Mirage of Irrigation Schemes.

If one goes by the official handbook of the Water Resources Department (CGWRD), Chhattisgarh appears to be immensely water-rich. The state proudly boasts 12 major reservoirs, 34 medium reservoirs, and over 1,770 minor irrigation dams. Furthermore, five major river basins, including the Mahanadi and Godavari, crisscross the state, carrying an annual flow of approximately 59,900 MCM of water.However, beneath this statistical abundance lies a stark governance failure. Despite a vast network of rivers and dams, successive governments manage to harness only 22% of this massive surface water. The remaining billions of liters of pristine water simply drain away into neighboring states, leaving Chhattisgarh’s own fields parched during the lean months.

According to data released by the Indian Council of Agricultural Research (ICAR), Chhattisgarh’s Net Irrigated Area remains stagnant between a mere 23% and 28%. Consequently, over 72% of the state’s agriculture continues to depend entirely on the vagaries of the monsoon.The Rabi Stagnation and Seasonal Unemployment:This severe deficit in state-provided irrigation has led to a complete lull during the Rabi season. Post-Kharif, only 17% to 19.3% of the agricultural land is re-cropped for winter crops like chickpea, wheat, and linseed. Compounding the crisis, 75% to 80% of Chhattisgarh’s farmers fall into the small and marginal categories. Lacking private tubewells and denied canal water from government sources during the winter months, nearly 80% of these farmers face absolute unemployment from January to June.

Official assessments from the Indian Council of Agricultural Research (ICAR) reveal a worrying trend for Chhattisgarh’s primary sector. The state’s Net Irrigated Area remains static between 23% and 28%. This indicates that more than 72% of the agricultural land continues to depend entirely on seasonal monsoon rain.The Post-Harvest Economic Slump:This systemic water shortage triggers a massive economic slowdown during the winter months. Post the Kharif harvest, a mere 17% to 19.3% of the land undergoes double-cropping for Rabi crops like wheat, chickpea, and linseed. With 75% to 80% of the farmers classified as small and marginal, the lack of private tube wells and the unavailability of canal water during the off-season leave close to 80% of the farming community structurally unemployed from January to June.

The Irony of Governance: Chhattisgarh Farmers Forced Into a Six-Month ‘Paid Leave’ by Systemic Failure.

Taking a swipe at the state’s agricultural policy, agro-experts remarked that Chhattisgarh has mastered the bizarre art of sending millions of farmers on a six-month mandatory ‘unpaid leave’ every year—all without setting up a single major industry. The priorities of the administrative machinery remain highly questionable; massive public funds are channeled into transforming dams into scenic picnic spots and tourist hubs perfect for social media reels. Yet, when the exact same water is desperately needed by parched fields under the scorching January sun, the bureaucracy readily deploys its readymade excuse of a ‘water crisis’.From Breadwinner to Jobless Laborer:Amid the lush green fields of September, a dark anxiety looms over the farmers of Chhattisgarh. They are constantly worried about how they will keep their household fires burning after the harvest in December. The harsh reality remains: until the water trapped in official files from these 1,770 minor and major dams actually flows into the 80% un-irrigated fields, the farmers of Chhattisgarh will remain celebrated ‘Annadatas’ (food providers) during Kharif, only to be reduced to ‘unemployed laborers’ during the Rabi season.

(संस्कृति)

रायपुरम्:सितंबर-मासस्य अन्तिमे सप्ताहे छत्तीसगढ़स्य क्षेत्रेषु धान्यानां हरिताः सस्याः (फसलें) परितः समृद्धिं दर्शयन्ति। सर्वकाराः आत्मप्रशंसां कुर्वन्ति, कृषिमेलानां आयोजनं भवति, धान्यानां कीर्तिमान-क्रयस्य दावाः च शासकीय-सञ्चिकाषु (फाइलों में) अङ्किताः भवन्ति। किन्तु एतस्याः राजनैतिक-चमक-दमकस्य पृष्ठतः एकं भयानकं सत्यं निगूढम् अस्ति, येन राज्यस्य अन्नदाता प्रतिवर्षं मूकवेदनया सहते।नवंबर-दिसंबर मासयोः धान्यकर्तनस्य (धान की कटाई) परं वास्तविकं सङ्कटं आरभ्यते। खरीफ-ऋतौ या प्रायः ८३ प्रतिशत (83%) कृषिभूमिः हरिता दृश्यते, सा सहसैव मरुभूमौ परिणमते। आधिकारिक-अङ्कानां भूमिसमीक्षायाः च आधारेण एषा विशेष-अन्वेषणात्मिका रिपोर्ट् ज्ञापयति यत् कथं छत्तीसगढ़स्य कृषकः जनवरीतः जूनमासं यावत् ‘अघोषित-कृषि-तालाबन्दी’ इत्यस्य शिकारः भूत्वा पूर्णतः उद्योगहीनः (बेरोजगारः) भवति।

पत्रेषु जलप्रवाहः, क्षेत्रेषु शुष्ककुल्याः (सूखी नहरें): जलसंसाधनविभागस्य अङ्कक्रीडा (आंकड़ों का खेल)।

यदि जलसंसाधनविभागस्य (CGWRD) शासकीय-हस्तपुस्तिका अवलोक्यते, तर्हि छत्तीसगढ़राज्ये जलसंरचनानां प्रचुरता दृश्यते। राज्यस्य समीपे आत्मप्रशंसाायै १२ बृहत् जलाशयाः (Major Dams), ३४ मध्यमाः जलाशयाः तथा च १,७७० तः अधिकाः लघुसिञ्चनबन्धाः सन्ति। किञ्च, महानदी-गोदावरीसहिताः पञ्च प्रमुखाः नदीमातृकाः (River Basins) अस्मात् राज्यात् प्रवहन्ति, यस्मात् प्रतिवर्षं प्रायः ५९,९०० MCM जलं प्रवहति।परन्तु एतस्य विशालजलवैभवस्य विडम्बनां पश्यन्तु। एतासां महतीनां नदीनां बन्धानां च तन्त्रे (Network) सत्यपि, अस्माकं सर्वकाराः एतस्य विशालस्य भूस्तरीयजलस्य केवलं २२ प्रतिशतं (22%) भागं एव सञ्चितुं समर्थाः भवन्ति। अवशिष्टं अब्जशः लीटर्मितं जलं वृथा प्रवहद् प्रतिवेशी-राज्यानां तृष्णां शमयति, किन्तु अस्माकं क्षेत्राणि शुष्काणि एव तिष्ठन्ति।

भारतीय-कृषि-अनुसन्धान-परिषदः (ICAR) अङ्कक्रीडानुसारं छत्तीसगढ़राज्यस्य शुद्ध-सिञ्चित-क्षेत्रं (Net Irrigated Area) अद्यापि केवलं २३% तः २८% यावत् सीमितम् अस्ति। अस्य स्पष्टः अर्थः अस्ति यत् राज्यस्य ७२ प्रतिशततः अधिका कृषिः अद्यापि पूर्णरूपेण ‘इन्द्रदेवस्य’ (वृष्टेः) कृपायाम् एव आश्रिता वर्तते।षण्मासानां बेकारी रबी-ऋतोः सङ्कटं च:जलस्य एतस्याः शासकीय-न्यूनतायाः कारणतः खरीफ-सस्यकर्तनस्य परं रबी-ऋतौ क्षेत्रेषु नीरवता (सन्नाटा) दृश्यते। राज्यस्य केवलं १७% तः १९.३% भागे एव पुनः द्वितीयवारं फसलं (चणकः, गोधूमः, अतसी च) उत्पादितुं शक्यते। छत्तीसगढ़स्य प्रायः ७५% तः ८०% कृषकाः लघु-सीमांत-वर्गे आगच्छन्ति। तेषां समीपे निजी-कूप-साधनानि न सन्ति, रबी-ऋतौ च शासकीय-कुल्याभ्यः (नहरों से) जलं न मुच्यते, अतः प्रायः ८० प्रतिशतं कृषकाः जनवरीतः जूनमासं यावत् पूर्णतः बेरोजगारितां अनुभवन्ति।

भारतीय-कृषि-अनुसन्धान-परिषदः (ICAR) अङ्कक्रीडानुसारं छत्तीसगढ़राज्यस्य शुद्ध-सिञ्चित-क्षेत्रं (Net Irrigated Area) अद्यापि केवलं २३% तः २८% यावत् सीमितम् अस्ति। अस्य स्पष्टः अर्थः अस्ति यत् राज्यस्य ७२ प्रतिशततः अधिका कृषिः अद्यापि पूर्णरूपेण ‘इन्द्रदेवस्य’ (वृष्टेः) कृपायाम् एव आश्रिता वर्तते।षण्मासानां बेकारी रबी-ऋतोः सङ्कटं च:जलस्य एतस्याः शासकीय-न्यूनतायाः कारणतः खरीफ-सस्यकर्तनस्य परं रबी-ऋतौ क्षेत्रेषु नीरवता (सन्नाटा) दृश्यते। राज्यस्य केवलं १७% तः १९.३% भागे एव पुनः द्वितीयवारं फसलं (चणकः, गोधूमः, अतसी च) उत्पादितुं शक्यते। छत्तीसगढ़स्य प्रायः ७५% तः ८०% कृषकाः लघु-सीमांत-वर्गे आगच्छन्ति। तेषां समीपे निजी-कूप-साधनानि न सन्ति, रबी-ऋतौ च शासकीय-कुल्याभ्यः (नहरों से) जलं न मुच्यते, अतः प्रायः ८० प्रतिशतं कृषकाः जनवरीतः जूनमासं यावत् पूर्णतः बेरोजगारितां अनुभवन्ति।

व्यवस्थायाः उपहासः: छत्तीसगढ़स्य कृषकेभ्यः सर्वकारेण प्रदत्ता षण्मासानां ‘अनिवार्य-सवेतन-अवकाशः’ (पेड-लीव)!

छत्तीसगढ़राज्यस्य कृषिप्रणाल्याः तीव्रमालोचनं कुर्वन्तः कृषि-विशेषज्ञाः वदन्ति यत् राज्यप्रशासनेन विना किमपि उद्योगस्थापनं प्रतिवर्षं लक्षशः कृषकेभ्यः षण्मासानां ‘अवेतन-अनिवार्य-अवकाशः’ (बिना सैलरी की पेड-लीव) दातुं विलक्षणं कौशलं प्राप्तम्। सर्वकारस्य प्राथमिकताः विचित्राः सन्ति—बन्धेषु पिकनिक-स्थानानि, सामाजिक-माध्यमेषु चलचित्र-निर्माणाय (Reels) च पर्यटनकेन्द्राणि तु विकसितानि भवन्ति, किन्तु यदा तदेव जलं जनवरीमासस्य तीव्रातपे कृषकाणां शुष्कक्षेत्राणां कृते आवश्यकं भवति, तदा प्रशासनिकस्तरे ‘जलसङ्कटस्य’ सज्जं बहाना (व्याजं) प्राप्यते।अन्नदातुः उद्योगहीन-श्रमिकं प्रति यात्रा:सितंबर-मासस्य एतस्यां हरितिमायां सत्यामपि छत्तीसगढ़स्य कृषकः आगामि-समयस्य भयात् व्याकुलो वर्तते। दिसंबर-मासात् परं तस्य गृहस्य चुल्याः अग्निः कथं प्रज्वलिष्यति इति तस्य महती चिन्ता अस्ति। वास्तविकी स्थितिः एषा वर्तते यत् यावत् एतेषाम् १,७७० लघूनां बृहतां च बन्धानां नदीनां च जलं शासकीय-सञ्चिकाभ्यः (फाइलों से) मुक्तं भूत्वा ८०% क्षेत्रेषु न प्राप्स्यति, तावत् छत्तीसगढ़स्य कृषकः खरीफ-ऋतौ केवलं नाममात्रं ‘अन्नदाता’ तथा च रबी-ऋतौ ‘उद्योगहीनः श्रमिकः’ (बेरोजगार मजदूर) एव स्थास्यति।

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