गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सोमनाथ मंदिर के आसपास मांसाहारी भोजन पर प्रतिबंध बरकरार.Gujarat High Court Upholds Ban on Non-Vegetarian Food Near Somnath Temple. गुजरातोच्चन्यायालयेन सोमनाथमन्दिरस्य समीपे मांसाहारभोजनस्य प्रतिबन्धः पुनः स्थिरीकृतः।
सोमनाथ मंदिर के आसपास नॉनवेज बिक्री पर प्रतिबंध बरकरार, गुजरात हाईकोर्ट ने सिंगल बेंच के आदेश पर लगाई रोक

गुजरात हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने शुक्रवार को सोमनाथ मंदिर के आसपास मांसाहारी भोजन बनाने, बेचने और भंडारण करने पर लगी रोक को दोबारा लागू कर दिया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (ACJ) मनश रंजन पाठक और न्यायमूर्ति निर्जर एस. देसाई की पीठ ने सिंगल जज के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसमें प्रतिबंध हटाने का आदेश दिया गया था। खास बात यह है कि सिंगल जज का फैसला आने के कुछ ही घंटों बाद डिवीजन बेंच ने यह आदेश जारी किया। राज्य सरकार ने फैसले के तुरंत बाद इसके खिलाफ अपील दायर की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने प्रतिबंध बहाल रखने का निर्देश दिया।
राज्य सरकार ने सिंगल जज का आदेश आते ही हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए अपील दाखिल कर दी।
सिंगल जज न्यायमूर्ति निशा एम. ठकोर ने शुक्रवार दोपहर करीब 3 बजे अपना फैसला सुनाया था। दिलचस्प बात यह रही कि आदेश की प्रति हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड होने से पहले ही राज्य सरकार ने इसके खिलाफ अपील दाखिल कर दी। इसके बाद डिवीजन बेंच ने शाम करीब 5:30 बजे मामले की सुनवाई की। इस तरह अपील दायर होने के महज ढाई घंटे के भीतर ही अदालत ने सुनवाई पूरी कर अंतरिम आदेश जारी कर दिया।
इस मामले में इससे पहले जिला मजिस्ट्रेट ने 10 जुलाई को प्रारंभिक अधिसूचना जारी की थी। इसके तहत सोमनाथ मंदिर के आसपास के चिन्हित इलाकों में दुकानों, रेस्तरां, होटलों और सड़क किनारे लगने वाले स्टॉलों पर मांस, मछली और मांसाहारी व्यंजनों की बिक्री, भंडारण एवं तैयारी पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रखा गया था। साथ ही इस संबंध में आम लोगों से आपत्तियां और सुझाव भी मांगे गए थे।
इसके बाद 10 अगस्त को अंतिम अधिसूचना जारी कर प्रतिबंध को लागू कर दिया गया। यह पाबंदी सोमनाथ मंदिर के 500 मीटर के दायरे समेत कुल सात निर्धारित क्षेत्रों में प्रभावी की गई थी।
रेस्तरां संचालकों की याचिका पर सुनवाई, सिंगल जज ने रखी अहम टिप्पणी
सोमनाथ मंदिर के आसपास मांसाहारी भोजन पर प्रतिबंध लगाने वाली अधिसूचना को क्षेत्र के रेस्तरां संचालकों ने गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए सिंगल जज न्यायमूर्ति निशा एम. ठकोर ने 30 अक्टूबर को याचिका स्वीकार कर ली थी। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि जिला मजिस्ट्रेट को मांसाहारी भोजन की बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं है।
न्यायमूर्ति ठकोर ने अपने आदेश में कहा था कि इस तरह की पाबंदी रेस्तरां संचालकों के व्यवसाय करने के अधिकार को प्रभावित करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक अधिकारी किसी गतिविधि को नियंत्रित और विनियमित कर सकते हैं, लेकिन उसे पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकते। विनियमन का उद्देश्य किसी गतिविधि के संचालन को व्यवस्थित करना है, न कि उसका अस्तित्व ही खत्म कर देना।
अदालत ने धार्मिक भावनाओं की रक्षा के आधार पर लगाए गए प्रतिबंध के तर्क को भी स्वीकार नहीं किया था। न्यायमूर्ति ने टिप्पणी की थी कि क्या खाना है और क्या नहीं, यह व्यक्ति की निजी पसंद का विषय है।
English
Ban on Non-Vegetarian Food Near Somnath Temple to Continue, Gujarat High Court Division Bench Stays Single-Judge Order
A division bench of the Gujarat High Court on Friday reinstated the ban on the preparation, sale and storage of non-vegetarian food around Somnath Temple. The bench, comprising Acting Chief Justice (ACJ) Manash Ranjan Pathak and Justice Nirjar S. Desai, stayed the single judge’s order that had lifted the restrictions. The interim order came just hours after the single judge delivered the verdict. The court passed the order while hearing an appeal filed by the state government immediately after the earlier decision.
State Government Moves High Court in Appeal Immediately After Single Judge’s Verdict.
Single judge Justice Nisha M. Thakore delivered her verdict at around 3 PM on Friday. Interestingly, the state government filed an appeal against the decision even before the order was uploaded to the Gujarat High Court’s official website. The division bench took up the matter at around 5:30 PM and heard the appeal within just two and a half hours of the original verdict.
Earlier, the District Magistrate had issued a preliminary notification on July 10, inviting objections and suggestions regarding a proposed ban on the sale, storage and preparation of meat, fish and non-vegetarian dishes. The proposed restrictions covered shops, restaurants, hotels and roadside stalls in designated areas surrounding the Somnath Temple.
Subsequently, a final notification was issued on August 10, officially enforcing the restrictions across seven designated zones, including the area within a 500-metre radius of the Somnath Temple.
Restaurant Owners’ Petition and Key Observations by the Single Judge.
Restaurant owners in the area had approached the Gujarat High Court challenging the notification imposing restrictions on non-vegetarian food around the Somnath Temple. On October 30, Single Judge Justice Nisha M. Thakore allowed their petition. In her verdict, she observed that the District Magistrate did not have the authority to impose a blanket ban on the sale of non-vegetarian food.
Justice Thakore held that such a restriction interfered with the restaurant owners’ right to carry on their businesses. She observed that authorities can regulate activities but cannot completely eliminate them. The power to regulate means ensuring that an activity continues under appropriate rules, rather than bringing it to an end altogether.
The court also rejected the argument that the ban was necessary to protect religious sentiments, observing that the choice of food is a matter of individual preference.
संस्कृति
सोमनाथमन्दिरस्य परितः मांसाहारभोजनविक्रये प्रतिबन्धः यथावत्, गुजरातोच्चन्यायालयस्य खण्डपीठेन एकलपीठस्य आदेशः स्थगितः
गुजरातराज्यस्य प्रसिद्धस्य सोमनाथमन्दिरस्य समीपे मांसाहारभोजनस्य विक्रये प्रतिबन्धः निरन्तरं प्रवर्तिष्यते। गुजरात-उच्चन्यायालयस्य खण्डपीठेन एकलन्यायाधीशस्य तस्मिन् आदेशे स्थगनं कृतम्, यस्मिन् मांसाहारभोजनस्य विक्रयप्रतिबन्धः निरस्तः आसीत्। अस्मिन् नूतने आदेशे मन्दिरस्य समीपे मांसाहारविक्रये पूर्ववत् प्रतिबन्धः स्थास्यति।
गुजरात-उच्चन्यायालयस्य खण्डपीठेन शुक्रवासरे सोमनाथमन्दिरस्य परितः मांसाहारभोजनस्य निर्माणे, विक्रये तथा सञ्चये च पूर्वप्रवर्तितः प्रतिबन्धः पुनः स्थापितः। कार्यवाहकः मुख्यन्यायाधीशः मनश रञ्जन पाठकः तथा न्यायमूर्तिः निर्जर एस. देसाई च अस्यां पीठिकायां सदस्यौ आस्ताम्। पीठेन एकलन्यायाधीशस्य प्रतिबन्धनिरसनसम्बद्धे आदेशे अन्तरिमस्थगनं प्रदत्तम्। एकलन्यायाधीशस्य निर्णयानन्तरं कतिपयेषु घण्टेषु एव एषः आदेशः पारितः। राज्यसर्वकारेण पूर्वनिर्णयस्य विरुद्धं प्रस्तुतायाः अपीलस्य श्रवणानन्तरं न्यायालयेन एषः अन्तरिमादेशः प्रदत्तः।
एकलन्यायाधीशस्य निर्णयानन्तरं राज्यसर्वकारेण तत्क्षणमेव उच्चन्यायालये अपीलिका प्रस्तुता।
एकलन्यायाधीशा न्यायमूर्तिः निशा एम. ठकोरः शुक्रवासरे अपराह्णे प्रायः त्रिवादने स्वनिर्णयं श्रावितवती। तदा निर्णयस्य प्रतिलिपिः उच्चन्यायालयस्य आधिकारिकजालपुटे अपि प्रकाशितं नाभवत्, तस्मात् पूर्वमेव राज्यसर्वकारेण तस्य विरुद्धम् अपीलिका प्रस्तुता। ततः सायं प्रायः सार्धपञ्चवादने खण्डपीठेन अस्य प्रकरणस्य श्रवणं कृतम्। एवं निर्णयप्रकाशनानन्तरं केवलं सार्धद्विहोराभ्यन्तरे एव अपीलिकायाः श्रवणं सम्पन्नम्।
अस्याः घटनायाः पूर्वं जिलादण्डाधिकारिणा जुलैमासस्य दशम्यां तिथौ प्रारम्भिक-अधिसूचना प्रकाशिता आसीत्। अस्यां अधिसूचनायां सोमनाथमन्दिरस्य समीपस्थेषु निर्दिष्टक्षेत्रेषु आपणेषु, भोजनालयेषु, विश्रामगृहेषु तथा मार्गपार्श्वस्थितेषु विक्रयस्थलेषु मांसस्य, मत्स्यस्य तथा मांसाहारव्यञ्जनानां विक्रयणस्य, सञ्चयस्य, निर्माणस्य च प्रस्तावितप्रतिबन्धविषये जनानां आपत्तयः सुझावाश्च आमन्त्रिताः आसन्।
अनन्तरं अगस्तमासस्य दशम्यां तिथौ अन्तिम-अधिसूचना प्रकाशिता, येन प्रतिबन्धः आधिकारिकरूपेण प्रवर्तितः। सोमनाथमन्दिरस्य ५०० मीटरपरिधिः सहितेषु सप्तसु निर्दिष्टक्षेत्रेषु एषः प्रतिबन्धः लागूः कृतः।
भोजनालयसञ्चालकानां याचिका तथा एकलन्यायाधीशस्य महत्त्वपूर्णाः टिप्पण्यः
सोमनाथमन्दिरस्य समीपे मांसाहारभोजनस्य विक्रये प्रतिबन्धं विधाय निर्गतायाः अधिसूचनायाः विरुद्धं क्षेत्रस्य भोजनालयसञ्चालकाः गुजरात-उच्चन्यायालयस्य शरणं गतवन्तः आसन्। तेषां याचिकायाः श्रवणं कृत्वा एकलन्यायाधीशा न्यायमूर्तिः निशा एम. ठकोरः अक्टोबरमासस्य त्रिंशत्तमे दिने याचिकाम् अङ्गीकृतवती। स्वनिर्णये सा अवदत् यत् जिलादण्डाधिकारिणः मांसाहारभोजनस्य विक्रये पूर्णप्रतिबन्धं स्थापयितुं अधिकारः नास्ति।
न्यायमूर्तिः ठकोरः अवदत् यत् एतादृशः प्रतिबन्धः भोजनालयसञ्चालकानां व्यवसायं कर्तुं अधिकारं बाधते। तया टिप्पणी कृता यत् प्रशासनिकाः अधिकारिणः विविधाः गतिविधयः नियन्त्रयितुं शक्नुवन्ति, किन्तु ताः पूर्णतया समाप्तुं न शक्नुवन्ति। नियमनस्य अधिकारस्य अर्थः गतिविधीनां सुव्यवस्थितं सञ्चालनं सुनिश्चितं कर्तुम् अस्ति, न तु तासां पूर्णतः समाप्तिः।
न्यायालयेन धार्मिकभावनानां रक्षणस्य तर्कः अपि न स्वीकृतः। न्यायमूर्तिः अवदत् यत् किम् खादनीयम्, किम् न खादनीयम् इति निर्णयः व्यक्तेः व्यक्तिगतपसन्दस्य विषयः अस्ति।


