शिक्षा बजट 1.39 लाख करोड़ और NCERT को 681 करोड़ रुपये मिलने के बाद भी 11वीं-12वीं के छात्र खाली हाथ; ‘मुफ्त शिक्षा’ के दावों पर उठे सवाल।Despite a ₹1.39 lakh crore education budget and ₹681 crore allocation to NCERT, Class 11 and 12 students are left empty-handed, raising questions over ‘free education’ claims.शिक्षाक्षेत्राय १.३९ लक्षकोटिपरिमितं धनं तथा च एनसीईआरटी-संस्थायै ६८१ कोटिरूप्यकाणि प्राप्तानि, तथापि एकादश-द्वादशकक्षाणां छात्राः रिक्तहस्ताः; ‘निःशुल्कशिक्षा’ दाने शङ्का समुत्पन्ना।

बजट 2026-27 के दावों और जमीनी हकीकत में अंतर, मुफ्त शिक्षा के बीच 11वीं-12वीं के छात्रों पर किताबों का भारी खर्च।
- मुख्य बिंदु
- आधिकारिक घोषणा: बजट 2026-27 को ‘युवा शक्ति और कर्तव्य-केंद्रित’ बताते हुए शिक्षा में बड़े सुधारों का दावा किया गया।
- जमीनी स्तर पर चुनौती: सरकारी दावों के विपरीत, कक्षा 11वीं और 12वीं के छात्रों को मुफ्त शिक्षा के अंतर्गत आवश्यक पाठ्यपुस्तकें नहीं मिल पा रही हैं।
- वित्तीय बोझ: उच्च माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों को महंगी किताबें स्वयं खरीदनी पड़ रही हैं, जिससे अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।
शिक्षा बजट आवंटन पर उठे सवाल; नीति निर्माताओं और छात्रों की बुनियादी सुविधाओं के बीच के अंतर पर विश्लेषण।
- वित्तीय असंतुलन: सरकारी बजट के बड़े हिस्से का लाभ प्रशासनिक स्तर पर ही सीमित रहने के आरोप लग रहे हैं।
- छात्रों की स्थिति: जमीनी स्तर पर आम छात्रों को आवश्यक शैक्षणिक संसाधन और बुनियादी सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पा रही हैं।
- बजट का प्रभाव: नीतिगत घोषणाओं के बावजूद वास्तविक लाभार्थियों तक वित्तीय लाभ न पहुंचने से छात्र वर्ग असंतुष्ट है।
शिक्षा बजट 2025 और 2026 का तुलनात्मक विश्लेषण; आंकड़ों में भारी वृद्धि के दावों की समीक्षा।
- मंत्रालय आवंटन: सरकार द्वारा शिक्षा मंत्रालय के बजटीय आवंटन में पिछले वर्ष की तुलना में इस बार काफी बड़ा इजाफा किया गया है।
- आंकड़ों का प्रभाव: बजट रिपोर्ट में पेश किए गए जटिल आंकड़ों और वित्तीय घोषणाओं को लेकर आम नागरिकों के बीच मिली-जुली प्रतिक्रियाएं हैं।
- समीक्षा: विशेषज्ञ इस बात का विश्लेषण कर रहे हैं कि क्या यह बड़ी वित्तीय वृद्धि वास्तव में जमीनी स्तर पर शिक्षा व्यवस्था में सुधार ला पाएगी।
शिक्षा बजट में ऐतिहासिक उछाल; वर्ष 2026-27 के लिए रिकॉर्ड ₹1.39 लाख करोड़ आवंटित, स्कूली शिक्षा को मिला सबसे बड़ा हिस्सा।
- बजट में बड़ी बढ़ोतरी: सरकार ने शिक्षा मंत्रालय का कुल बजट (2026-27) बढ़ाकर रिकॉर्ड ₹1,39,286 करोड़ कर दिया है, जो पिछले वर्ष (2025-26) के ₹1,28,650 करोड़ से 8.27% की ऐतिहासिक वृद्धि को दर्शाता है।
- स्कूली शिक्षा पर विशेष ध्यान: इस कुल आवंटन में से स्कूली शिक्षा विभाग (DoSEL) को कक्षा 1 से 12वीं तक के लिए अब तक का सबसे बड़ा फंड ₹83,562 करोड़ आवंटित किया गया है।
स्कूली शिक्षा के ₹83 हजार करोड़ के बजट पर विपक्ष और विशेषज्ञों का तंज; मुफ्त किताबों के दावों को बताया ‘क्रिएटिव बिजनेस मॉडल‘
बजट और उम्मीदें: स्कूली शिक्षा के लिए आवंटित ₹83,000 करोड़ से अधिक के भारी-भरकम बजट के बाद वरिष्ठ माध्यमिक (11वीं-12वीं) के छात्रों में भौतिकी, रसायन विज्ञान, लेखाशास्त्र और इतिहास जैसी मुख्य विषयों की किताबें मुफ्त मिलने की उम्मीद जगी थी।
नीति पर कटाक्ष: आलोचकों ने सरकार की इस नीति की तुलना एक ऐसे ‘शादी के कार्ड’ से की है जहाँ आमंत्रण तो है, लेकिन भोजन का खर्च मेहमान को खुद उठाना पड़ता है। उनका आरोप है कि विशाल फंड के बावजूद जमीनी स्तर पर छात्रों को महंगी किताबें खुद खरीदनी पड़ रही हैं
नीति पर कटाक्ष: आलोचकों ने सरकार की इस नीति की तुलना एक ऐसे ‘शादी के कार्ड’ से की है जहाँ आमंत्रण तो है, लेकिन भोजन का खर्च मेहमान को खुद उठाना पड़ता है। उनका आरोप है कि विशाल फंड के बावजूद जमीनी स्तर पर छात्रों को महंगी किताबें खुद खरीदनी पड़ रही हैं।
NCERT की छपाई क्षमता में तीन गुना वृद्धि का दावा; सालाना 15 करोड़ किताबें छापने का लक्ष्य, कीमतों में आएगी कमी
उत्पादन क्षमता में विस्तार: सरकार ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की वार्षिक छपाई क्षमता को 5 करोड़ किताबों से बढ़ाकर सीधे 15 करोड़ किताबें करने की घोषणा की है।
किल्लत होगी दूर: इस निर्णय का मुख्य उद्देश्य देश भर के स्कूलों में हर शैक्षणिक सत्र में होने वाली पाठ्यपुस्तकों की भारी कमी और आपूर्ति की समस्या को पूरी तरह समाप्त करना है।
आर्थिक राहत: छपाई क्षमता में इस तीन गुना बढ़ोतरी के बाद बड़े पैमाने पर उत्पादन (Mass Production) होने से किताबों की बाजार कीमतों में भी उल्लेखनीय गिरावट आने की उम्मीद जताई गई है।
NCERT की बढ़ी क्षमता पर प्रतिक्रिया; 11वीं-12वीं के बोर्ड परीक्षार्थियों को मुफ्त किताबों के बजाय “नो प्रॉफिट, नो लॉस” पर बेचने की नीति पर बहस।
उत्पादन में तेजी: राष्ट्रीय स्तर पर पाठ्यपुस्तकों की छपाई और वितरण की प्रशासनिक तैयारियां पूरी हो चुकी हैं।
छात्रों की चिंता: बोर्ड परीक्षाओं के तनाव से जूझ रहे कक्षा 11वीं और 12वीं के छात्रों को इस बढ़ी हुई उत्पादन क्षमता का सीधा वित्तीय लाभ (मुफ्त पुस्तकें) नहीं मिल पा रहा है।
सरकारी रुख: सरकार की घोषित नीति के अनुसार, इन पुस्तकों को बाजार में “नो प्रॉफिट, नो लॉस” (बिना लाभ या हानि) के आधार पर बेचा जाएगा, जिस पर सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है।
NCERT पुस्तकों की छपाई में तेजी; बोर्ड परीक्षार्थियों के लिए मुफ्त पुस्तकों के स्थान पर “नो प्रॉफिट, नो लॉस” नीति लागू।
प्रशासनिक मुस्तैदी: मुद्रणालयों (Printing Presses) में संसाधनों की उपलब्धता के साथ पाठ्यपुस्तकों की बड़े पैमाने पर छपाई का कार्य सुचारू रूप से शुरू हो चुका है।
छात्रों की चिंताएं: बोर्ड परीक्षाओं के दबाव का सामना कर रहे कक्षा 11वीं और 12वीं के छात्रों को इस बढ़ी हुई उत्पादन क्षमता के अंतर्गत मुफ्त पुस्तकें नहीं मिल पा रही हैं।
वितरण नीति: सरकार के आधिकारिक रुख के अनुसार, इन आवश्यक पाठ्यपुस्तकों को बाजार में “नो प्रॉफिट, नो लॉस” (बिना लाभ-हानि) के सिद्धांत पर बेचा जाएगा, जिससे कीमतें नियंत्रित रहने का दावा है
बढ़ती छपाई क्षमता के बीच वितरण नीति पर सवाल; बोर्ड परीक्षार्थियों को मुफ्त पुस्तकों के स्थान पर “नो प्रॉफिट, नो लॉस” पर बेचने का फैसला।
उत्पादन में तेजी: मुद्रण बुनियादी ढांचे और कच्चे माल की उपलब्धता के साथ राष्ट्रीय स्तर पर पाठ्यपुस्तकों की बड़े पैमाने पर छपाई का कार्य सुचारू रूप से शुरू हो चुका है।
छात्रों की चिंताएं: बोर्ड परीक्षाओं के शैक्षणिक और मानसिक दबाव का सामना कर रहे कक्षा 11वीं और 12वीं के छात्रों को इस बढ़ी हुई उत्पादन क्षमता का सीधा वित्तीय लाभ (मुफ्त पुस्तकें) नहीं मिल पा रहा है।
वितरण नीति: सरकार के आधिकारिक रुख के अनुसार, इन आवश्यक पाठ्यपुस्तकों को बाजार में “नो प्रॉफिट, नो लॉस” (बिना लाभ-हानि) के सिद्धांत पर बेचा जाएगा, जिससे कीमतें नियंत्रित रहने का दावा है।
छत्तीसगढ़ के स्वामी आत्मानंद स्कूलों की जमीनी हकीकत; उच्च माध्यमिक छात्रों के लिए पाठ्यपुस्तकों की कमी पर उठे सवाल।
दावे और ढांचागत सुधार: छत्तीसगढ़ सरकार के प्रतिष्ठित ‘स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालयों’ में आधुनिक भवनों और बेहतर बुनियादी ढांचे का बड़े पैमाने पर प्रचार किया गया है।
पुस्तकों का संकट: प्रचार के विपरीत, कक्षा 11वीं और 12वीं के छात्रों को छत्तीसगढ़ पाठ्यपुस्तक निगम की मूल पुस्तकें समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।
आर्थिक असमानता: कक्षा 1 से 10वीं तक मुफ्त पुस्तकों की सुविधा है, लेकिन 11वीं में आते ही यह लाभ बंद हो जाता है। इसके चलते उच्च माध्यमिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को बाजार से महंगी या सेकंड-हैंड पुरानी पुस्तकें खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
सरकारी किताबों की कमी से निजी प्रकाशकों का एकाधिकार; 11वीं-12वीं के छात्रों पर ₹5,000 तक के बुक सेट का अतिरिक्त वित्तीय बोझ।
- कृत्रिम किल्लत के आरोप: नए शैक्षणिक सत्र में कक्षा 11वीं और 12वीं की एनसीईआरटी (NCERT) पुस्तकों की समय पर आपूर्ति न होने से बाजार में किताबों की कमी देखी जा रही है।
- निजी स्कूलों का दबाव: इस कमी का लाभ उठाकर कुछ निजी शिक्षण संस्थान छात्रों को विशिष्ट वेंडरों से ₹3,000 से ₹5,000 मूल्य के महंगे बुक सेट और गाइड खरीदने के लिए बाध्य कर रहे हैं।
- अभिभावकों पर प्रभाव: एक-एक विषय की रेफरेंस बुक्स ₹500 से ₹800 में बेची जा रही हैं, जिससे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर भारी आर्थिक दबाव है। शिक्षा विभाग की निष्क्रियता को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है
भौतिक किताबों की कमी के बीच डिजिटल शिक्षा विकल्पों पर बहस; इंटरनेट कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचा बना चुनौती।
- डिजिटल पहलों पर निर्भरता: देश में पाठ्यपुस्तकों की कमी के समाधान के रूप में प्रशासन द्वारा ‘e-Pathshala’ और ‘PM e-Vidya’ जैसे डिजिटल मंचों से मुफ्त PDF डाउनलोड करने का विकल्प दिया जा रहा है।
- कनेक्टिविटी की समस्या: जमीनी स्तर पर नागरिकों और छात्रों का कहना है कि ग्रामीण व दूरदराज के क्षेत्रों में कमजोर नेटवर्क और इंटरनेट की अनुपलब्धता के कारण डिजिटल माध्यमों से पढ़ाई करना व्यावहारिक नहीं है।
- नीतिगत समीक्षा: सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि भौतिक पुस्तकों के स्थान पर पूरी तरह डिजिटल विकल्पों पर निर्भर होना देश के डिजिटल विभाजन (Digital Divide) को देखते हुए एक बड़ी चुनौती है।
सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा की व्यावहारिकता पर प्रश्नचिह्न; बुनियादी सुविधाओं की कमी से छात्र प्रभावित।
भौगोलिक और तकनीकी बाधाएं:छत्तीसगढ़ के बस्तर और सरगुजा सहित देश के सुदूर ग्रामीण अंचलों में बिजली की अनियमित आपूर्ति और कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी डिजिटल शिक्षा की राह में बड़ी बाधा बनी हुई है।
- छात्रों की व्यावहारिक चुनौतियाँ: विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित संसाधनों और मोबाइल की छोटी स्क्रीन पर भौतिकी, रसायन विज्ञान जैसे मुख्य विषयों के 500 पन्नों के पीडीएफ (PDF) से पढ़ाई करना छात्रों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य (जैसे आंखों का तनाव और सिरदर्द) को प्रभावित कर रहा है।
- नीतिगत समीक्षा की मांग: शिक्षाविदों ने नीति निर्माताओं से आग्रह किया है कि वे केवल डिजिटल आंकड़ों को आधार बनाने के बजाय जमीनी स्तर पर ‘डिजिटल न्याय’ सुनिश्चित करने के लिए व्यावहारिक कदम उठाएं।
निजी शिक्षण संस्थानों के व्यवसायीकरण पर अभिभावकों का आक्रोश; डोनेशन, यूनिफॉर्म और विशिष्ट वेंडिंग नीतियों पर उठे सवाल।
- व्यावसायिक गठजोड़: अभिभावक संघों का आरोप है कि कई निजी स्कूलों ने किताबों की दुकानों और यूनिफॉर्म के दर्जियों के साथ व्यावसायिक एकाधिकार बना रखा है, जिससे लागत कई गुना बढ़ गई है।
- अतिरिक्त वित्तीय बोझ: स्कूलों द्वारा निर्धारित ब्रांडेड वेंडरों से ₹1,500 जैसी महंगी टाई और बेल्ट खरीदने के लिए अभिभावकों पर दबाव बनाया जा रहा है, न खरीदने पर छात्रों को मानसिक रूप से परेशान करने के मामले सामने आए हैं।
- बुनियादी सुविधाओं का अभाव: ‘स्मार्ट क्लास’ और ‘बिल्डिंग फंड’ के नाम पर मोटी रकम वसूलने के बावजूद, कक्षाओं में वेंटिलेशन और पंखों जैसी प्राथमिक सुविधाओं की कमी को लेकर नियमन की मांग तेज हो गई है।
शिक्षा बजट के दावों पर विशेषज्ञों की समीक्षा; ₹1.39 लाख करोड़ के केंद्रीय आवंटन के बाद भी वरिष्ठ माध्यमिक छात्र आर्थिक बोझ तले।
- बजट और जमीनी हकीकत: सरकार द्वारा घोषित ₹1.39 लाख करोड़ के केंद्रीय शिक्षा बजट और राज्य स्तर पर बड़े दावों के बावजूद, कक्षा 11वीं और 12वीं (सीनियर सेकेंडरी) के छात्रों की बुनियादी ज़रूरतें अधूरी हैं।
- पुस्तकों का बाजार: सुदूर क्षेत्रों और सरकारी स्कूलों के छात्र अपनी मुख्य पाठ्यपुस्तकों के लिए पुरानी किताबों के बाजारों पर निर्भर हैं या उन्हें निजी प्रकाशकों से महंगे दामों पर खरीदने के लिए विवश होना पड़ रहा है।
- नीतिगत मूल्यांकन: शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि जब तक बुनियादी संसाधन जमीनी स्तर पर हर छात्र तक नहीं पहुँचते, तब तक इन वित्तीय आंकड़ों को ‘ऐतिहासिक’ या ‘युवा-हितैषी’ कहना व्यावहारिक रूप से सही नहीं होगा।
राजनीतिक रैलियों और विज्ञापनों पर सरकारी खर्च बनाम छात्र कल्याण; मुफ्त शिक्षा और कल्याणकारी प्राथमिकताओं पर सामाजिक कार्यकर्ताओं की समीक्षा।
- बजटीय प्राथमिकताओं पर सवाल: सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों ने सरकारी खजाने से राजनीतिक दौरों, विज्ञापनों और विशाल रैलियों पर होने वाले भारी खर्च पर चिंता व्यक्त की है।
- छात्रों की मांग: बोर्ड परीक्षाओं और उच्च माध्यमिक स्तर (11वीं-12वीं) के छात्रों में यह असंतोष बढ़ रहा है कि देश के भविष्य निर्माण के लिए आवश्यक पाठ्यपुस्तकों पर पर्याप्त सब्सिडी या मुफ्त वितरण की व्यवस्था नहीं है।
(English)
Budget 2026-27 Claims vs Reality: Class 11 and 12 Students Bear Heavy Cost of Books Despites Free Education Promises.
Key Highlights:
- Official Stance: The Union Budget 2026-27 was presented with a focus on ‘Youth Power and Duty’, promising widespread educational benefits.
- Ground Reality: Despite claims of free and accessible education, senior secondary students (Classes 11 & 12) face a shortage of state-provided books.
- Economic Impact: Students are forced to purchase expensive textbooks from private vendors, leading to significant out-of-pocket expenses for families.
Questions Raised Over Education Budget Allocation; Analysis Highlights Gap Between Policy Makers and Student Resources.
- Financial Disparity: Concerns have emerged that a significant portion of the budget allocation is absorbed at administrative levels rather than reaching the grassroots.
- Impact on Students: Despite massive budget figures, average students continue to struggle with a lack of basic educational resources and support.
- Implementation Gap: The disparity between high-level allocations and actual field benefits remains a major challenge for the student community.
Comparative Analysis of Education Budget 2025 vs 2026; Reviewing Claims of Massive Allocation Surges.
- Ministry Allocation: The government has significantly increased the budgetary funding for the Ministry of Education compared to the previous year.
- Public Perception: The complex financial data and statistical growth presented in the budget have drawn varied reactions from the general public.
- Analysis: Experts are closely evaluating whether this sharp rise in figures will translate into actual development on the ground.
Historic Surge in Education Budget: Record ₹1.39 Lakh Crore Allocated for 2026-27; School Education Gets Lion’s Share.
- Massive Funding Increase: The Ministry of Education’s total budget for 2026-27 has been raised to a record ₹1,39,286 crore, marking a historic growth of 8.27% from last year’s allocation of ₹1,28,650 crore.
- Focus on Schooling: Out of this massive corpus, the Department of School Education and Literacy (DoSEL) alone received its highest-ever funding of ₹83,562 crore for Classes 1 to 12.
Satirical Critique on ₹83,000 Crore School Budget: Critics Label Free Education Claims as a ‘Creative Business Model’.
- Budget vs Expectations: Following the massive allocation of over ₹83,000 crore for school education, higher secondary students (Classes 11–12) expected free textbooks for core subjects like Physics, Chemistry, Accounts, and History.
- The Policy Metaphor: Critics have sharply satirized the situation, comparing the budget to a ‘wedding invitation’ where guests are expected to pay for their own food plates. They argue that despite huge reserves, the financial burden of expensive textbooks remains entirely on families.
NCERT Printing Capacity Set for Threefold Jump; Target of 15 Crore Books Annually to Resolve Shortages and Lower Costs.
- Capacity Expansion: The government has officially announced an expansion in NCERT’s annual printing capacity, scaling it up from 5 crore books to 15 crore books per year.
- Ending Scarcity: The primary objective of this move is to eliminate the persistent textbook shortages faced by students across schools at the start of every academic session.
- Economic Relief: With production capacity tripling, economies of scale are expected to significantly reduce printing costs, making textbooks more affordable for families.
Reaction to NCERT’s Scaled Capacity: Debate Over “No Profit, No Loss” Market Policy vs Free Books for Board Students.
- Production Push: Administrative arrangements and printing infrastructure have been fully mobilized to accelerate the publication of textbooks.
- Student Support Gap: Despite facing the intense pressure of board exams, Class 11 and 12 students remain excluded from receiving these textbooks free of charge.
- Official Commercial Policy: The government has maintained that books will be distributed through market channels on a “No Profit, No Loss” model, a stance facing criticism from educational experts.
Debate Over Distribution Policy Amid Rising Printing Capacity: “No Profit, No Loss” Market Model Replaces Free Books for Board Students.
- Operational Readiness: Printing infrastructure has been fully mobilized with adequate raw materials to streamline the mass production of textbooks nationwide.
- Student Exclusions: Despite facing the intense academic and mental pressure of upcoming board exams, senior secondary students (Classes 11 & 12) remain excluded from the free textbook scheme.
- Pricing Mechanism: The government has mandated that these textbooks will be distributed through market channels on a strict “No Profit, No Loss” basis to maintain affordability.
Ground Reality of Chhattisgarh’s Atmanand Schools: Textbook Shortage Faces Criticism in Senior Secondary Classes.
- Infrastructure Claims: Chhattisgarh’s flagship ‘Swami Atmanand Excellence Schools’ have been widely promoted for their modern infrastructure and upgraded school buildings.
- Resource Deficit: Despite high-profile branding, students in Classes 11 and 12 are struggling with a severe shortage of official textbooks from the State Textbook Corporation.
- Policy Disparity: While free education benefits apply from Classes 1 to 10, the sudden withdrawal of support in Class 11 forces senior secondary students to rely on expensive market vendors or older, second-hand books.
Shortage of Government Textbooks Empowers Private Publishers; Class 11 and 12 Students Burdened with Book Sets Worth Up to ₹5,000.
- Supply Deficit: The delayed arrival of official NCERT textbooks for Classes 11 and 12 in the new academic session has led to an artificial shortage in the open market.
- Institutional Pressure: Exploiting this gap, certain private schools are reportedly issuing mandates forcing students to purchase expensive private book sets and reference guides priced between ₹3,000 and ₹5,000 from designated vendors.
- Financial Strain: With individual reference books costing anywhere from ₹500 to ₹800, low and middle-income families are facing severe economic strain, raising serious questions over the regulatory oversight of the education department.
Debate Over Digital Education Alternatives Amid Physical Book Shortages; Internet Connectivity and Infrastructure Remain Major Challenges.
- Reliance on Digital Platforms: To counter the shortage of physical textbooks, authorities are highlighting digital initiatives like ‘e-Pathshala’ and ‘PM e-Vidya’, encouraging students to download free PDFs.
- The Connectivity Barrier: Grassroots feedback indicates that poor network infrastructure and a lack of reliable internet access in rural areas make online learning highly impractical for many students.
- Policy Critique: Education experts argue that substituting printed books with digital formats overlooks the stark digital divide, leaving underprivileged students at a disadvantage.
Digital Divide Challenges Rural Education: Connectivity Issues and Infrastructure Gaps Fuel Practicality Concerns.
- Geographical and Technical Barriers: In remote rural regions, including Chhattisgarh’s Bastar and Sarguja, erratic electricity and unreliable internet connections severely hinder access to digital learning platforms.
- Academic and Health Strain: Experts point out that expecting students to master 500-page complex textbooks (like Physics and Chemistry) on small, often damaged mobile screens leads to severe academic disadvantages and health issues, including eye strain and chronic headaches.
- Call for Policy Realism: Social workers and educators urge the government to move beyond purely statistical targets and focus on ‘digital justice’ by creating practical, accessible infrastructure for underprivileged students.
Public Outcry Over Commercialization in Private Schools; High Donations, Uniform Monopolies, and Lack of Infrastructure Questioned.
- Commercial Cartelization: Parent associations allege that numerous private educational institutions have established exclusive tie-ups with specific book vendors and uniform tailors, artificially inflating costs.
- Arbitrary Mandates: Families face severe financial strain due to compulsory purchases, such as uniforms, ties, and belts priced up to ₹1,500 from designated suppliers, with reports of students facing entry restrictions for non-compliance.
- Infrastructure Disparity: Despite collecting hefty amounts under ‘Smart Class Fees’ and ‘Building Funds’, many schools fail to provide basic classroom amenities like functional fans, sparking calls for stricter regulatory oversight.
Experts Review Education Budget Claims; Senior Secondary Students Face Financial Burden Despite ₹1.39 Lakh Crore Allocation.
- Budget vs Ground Reality: Despite the Union Government’s massive ₹1.39 lakh crore education budget and parallel state-level claims, basic needs of Class 11 and 12 students remain unmet.
- The Textbook Market: Senior secondary students are heavily reliant on second-hand markets for core textbooks or are forced to buy expensive materials from private publishers.
- Policy Assessment: Educationists and social activists argue that branding these allocations as ‘historic’ or ‘youth-friendly’ is counter-intuitive until essential learning resources reach the actual grassroots level.
Government Spending on Political Rallies and Ads vs Student Welfare; Activists Review Welfare Priorities and Free Education.
- Budgetary Priorities Questioned: Social activists and education experts have raised concerns over the substantial allocation of state funds toward political campaigns, advertisements, and official tours.
- Demands from Students: There is growing unrest among higher secondary students (Classes 11 and 12) regarding the lack of adequate subsidies or free distribution for vital textbooks.
- Review of Electoral Promises: Citizen forums argue that core issues impacting student welfare should be address realistically on the ground rather than being confined to cyclical election manifestos.
(संस्कृत)
आयव्ययकपक्षः (बजट) यथार्थता च: निःशुल्कशिक्षायाः प्रदानेऽपि एकादश-द्वादशकक्षाणां छात्राः पुस्तकमूल्यभारेण पीडिताः
- शासकीयघोषणा: वर्ष २०२६-२७ तमस्य राष्ट्रियायव्ययके ‘युवाशक्तिः कर्तव्यं च’ इति ध्येयं स्वीकृत्य शिक्षाक्षेत्रे महत्परिवर्तनस्य प्रलोभनं दत्तम्।
- वास्तविकस्थितिः: सर्वकारस्य निःशुल्कशिक्षादावाणां विपरीतम्, उच्चतरमाध्यमिककक्षाणां (११-१२) छात्रेभ्यः पाठ्यपुस्तकानि सुलभानि न सन्ति।
- आर्थिकभारः: छात्राः आपणतः महार्घाणि पुस्तकानि क्रेतुं विवशाः सन्ति, येन अभिभावकानां धनव्ययः वर्धते।
शिक्षा-आयव्ययकस्य (बजट) आवंटने संशयः; नीतिनिर्मातॄणां सुखसाधनानां तथा छात्राणां प्राथमिक-आवश्यकतानां मध्ये भेदः।
- वित्तीय-असंतुलनम्: सर्वकारीय-आयव्ययकस्य मुख्यभागः प्रशासनिकस्तरे एव सीमितः अस्ति इति आरोपः अस्ति।
- छात्राणां दुर्दशा: महत्-धनराशौ सत्यामपि, सामान्यछात्राः आधारभूत-शैक्षणिकसाधनानि प्राप्तुं असमर्थाः सन्ति।
- नीति-प्रभावः: उच्चस्तरीय-घोषणानां तथा वास्तविक-लाभार्थिनां मध्ये विद्यमानः भेदः छात्रवर्गे असन्तोषं जनयति।
शिक्षा-आयव्ययकस्य (२०२५-२०२६) तुलनात्मकमध्ययनम्; वित्तीय-आवंटने वर्धनस्य समीक्षा।
- मन्त्रालय-आवंटनम्: सर्वकारेण पूर्ववर्षस्य तुलनायां अस्मिन् वर्षे शिक्षामन्त्रालयाय अत्यधिकं धनं स्वीकृतम्।
- संख्यात्मक-प्रभावः: आयव्ययके प्रदर्शिताः जटिलाः आङ्कडाः वित्तीयघोषणाश्च सामान्यजनेषु मिश्रितप्रतिक्रियाः जनयन्ति।
- समीक्षा: विद्वांसः अस्य विश्लेषणं कुर्वन्ति यत् एषा वित्तीयवृद्धिः वास्तविकरूपेण शिक्षाक्षेत्रे कञ्चित् सुधारं आनेष्यति वा न वा।
शिक्षा-आयव्ययके ऐतिहासिकवर्धनम्; वर्ष २०२६-२७ कृते रिकॉर्ड ₹१.३९ लक्षकोटिरूप्यकाणि प्राप्तानि, विद्यालयीयशिक्षायाः विशालतमः भागः।
- आयव्ययकवृद्धिः: सर्वकारेण वर्ष २०२६-२७ कृते शिक्षामन्त्रालयाय कुलधनं वर्धयित्वा ₹१,३९,२८६ कोटिरूप्यकाणि कृतम्, यत् पूर्ववर्षस्य (२०२५-२६) ₹१,२८,६५० कोटिरूप्यकाणां तुलनायां ८.२७% प्रतिशतं ऐतिहासिकवृद्धिं सूचयति।
- विद्यालयीयशिक्षायां ध्यानम्: अस्मात् विशालात् धनराशौ केवलं विद्यालयीयशिक्षाविभागाय (कक्षा १ तः १२ पर्यन्तम्) इदानीं यावत् सर्वोत्कृष्टा निधिः ₹८३,५६२ कोटिरूप्यकाणि प्रदत्ता अस्ति।
विद्यालयीयशिक्षायाः ₹८३ सहस्रकोटि-परिमित-आयव्ययके तीक्ष्णकटाक्षः; निःशुल्कपुस्तकानां दावान् ‘रचनात्मक-व्यापार-प्रतिरूपम्’ इति कथितम्।
- आयव्ययकः अपेक्षा च: विद्यालयीयशिक्षाकृते ₹८३,००० कोटितः अधिकधनस्य आवंटनेन उच्चतरमाध्यमिककक्षाणां (११-१२) छात्रेषु भौतिकविज्ञान-रसायनविज्ञान-लेखाशास्त्र-इतिहासादिमुख्यानां पुस्तकानां निःशुल्कप्राप्तेः आशा आसीत्।
- नीतिविवरणे उपहासः: आलोचकैः अस्य सर्वकारस्य नीतेः तुलना तादृशेन ‘विवाहनिमन्त्रणपत्रेण’ कृता यत्र आमन्त्रणं तु भवति किन्तु भोजनस्य मूल्यं अतिथयः स्वयं यच्छन्ति। विशालायां निधौ सत्यामपि छात्राः महार्घाणि पुस्तकानि क्रेतुं विवशाः सन्ति।
एनसीईआरटी-संस्थायाः मुद्रणक्षमतायां त्रैगुण्यवर्धनम्; पुस्तकानां न्यूनतां दूरीकर्तुं प्रतिवर्षं १५ कोटिपुस्तकानां मुद्रणलक्ष्यम्।
- क्षमताविस्तारः: सर्वकारेण राष्ट्रीयशैक्षणिकअनुसन्धानप्रशिक्षणपरिषदः (NCERT) वार्षिकमुद्रणक्षमता ५ कोटिपुस्तकतः वर्धयित्वा साक्षात् १५ कोटिपुस्तकानि प्रतिवर्षं कर्तुं उद्घोषितम्।
- अभावस्य निवारणम्: अस्य निर्णयस्य मुख्यमुद्देश्यं देशस्य विद्यालयेषु प्रतिवर्षं जायमानं पाठ्यपुस्तकानां तीव्रसङ्कटं सुलभतया समाधातुं अस्ति।
- मूल्यन्यूनता: मुद्रणक्षमतायाः त्रैगुण्यवर्धनेन बृहत्परिमाणे उत्पादनं भविष्यति, येन आपणेषु पुस्तकानां मूल्येषु अपि महती न्यूनता आगमिष्यति इति आशा अस्ति।
एनसीईआरटी-क्षमतावर्धने विमर्शः; बोर्ड-परीक्षार्थिभ्यः निःशुल्कपुस्तकानां स्थाने “न लाभः न हानिः” इति नीत्या विक्रयणम्।
- उत्पादन-प्रक्रिया: पाठ्यपुस्तकानां मुद्रणाय वितरणाय च सर्वकारस्य प्रशासनिकव्यवस्था पूर्णवेगेन प्रचलति।
- छात्राणां मानसिकभारः: बोर्ड-परीक्षायाः तनावग्रस्ताः एकादश-द्वादशकक्षाणां छात्राः अस्य मुद्रण-महायज्ञस्य साक्षात् लाभं (निःशुल्कपुस्तकानि) न प्राप्नुवन्ति।
- सर्वकारस्य नीतिः: शासकीयघोषणायाः अनुसारं एतानि पुस्तकानि आपणेषु “न लाभः न हानिः” इति आधारेण एव विक्रेष्यन्ते, येन समीक्षकाः असन्तुष्टाः सन्ति।
मुद्रणक्षमतावर्धने वितरणनीत्यां विमर्शः; बोर्ड-परीक्षार्थिभ्यः निःशुल्कपुस्तकानां स्थाने “न लाभः न हानिः” इति नियमेन विक्रयणम्।
- उत्पादन-प्रक्रिया: पाठ्यपुस्तकानां वृहत्परिमाणे मुद्रणाय मुद्रणालयैः सह आवश्यकाः सामग्र्यः सज्जीकृताः, राष्ट्रियस्तरे च उत्पादनप्रक्रिया वेगेन आरब्धा।
- छात्राणां मानसिकभारः: बोर्ड-परीक्षायाः तीव्रतनावग्रस्ताः एकादश-द्वादशकक्षाणां छात्राः अस्य मुद्रणकार्यस्य साक्षात् आर्थिकलाभं (निःशुल्कपुस्तकानि) न प्राप्नुवन्ति।
- सर्वकारस्य निर्णयः: शासकीयनीत्यनुसारं एतानि पुस्तकानि आपणेषु “न लाभः न हानिः” इति नियमेन एव विक्रेष्यन्ते, येन मूल्यं नियन्त्रितं स्यात्
छत्तीसगढ़राज्यस्य ‘आत्मानन्द’ विद्यालयानां यथार्थता; उच्चतरमाध्यमिककक्षासु पाठ्यपुस्तकानां अभावः।
- प्रशासनिकप्रचारः: छत्तीसगढ़सर्वकारस्य ‘स्वामी आत्मानन्द उत्कृष्टविद्यालयेषु’ आधुनिकभवनानां तथा नूतनसुविधानां विशाले स्तरे प्रचारः कृतः आसीत्।
- पुस्तकाभावसङ्कटम्: उच्चप्रचाराणां विपरीतम्, एकादश-द्वादशकक्षाणां छात्राः सर्वकारीय-पाठ्यपुस्तकनिगमस्य मूलपुस्तकानि प्राप्तुं न शक्नुवन्ति।
- नीतिभेदः आर्थिकभारः च: प्रथमकक्षाततः दशकक्षापर्यन्तं निःशुल्कपुस्तकानां व्यवस्था अस्ति, किन्तु एकादशकक्षायां प्रवेशमात्रेण एषः लाभः समाप्तः भवति। अतः उच्चतरवर्गस्य छात्राः आपणतः महार्घाणि अथवा पुरातनानि पाठ्यपुस्तकानि क्रेतुं विवशाः सन्ति।
शासकीयपुस्तकानां अभावेन निजीप्रकाशकानां एकाधिकारः; उच्चतरमाध्यमिकछात्राणाम् उपरि ₹५,००० पर्यन्तं अतिरिक्तवित्तीयभारः।
- पुस्तकाभावसङ्कटम्: नूतने शैक्षणिकसत्रे एकादश-द्वादशकक्षाणां कृते एनसीईआरटी (NCERT) पुस्तकानां समये अभावात् आपणेषु कृत्रिमसङ्कटं दृश्यते।
- विद्यालयीयप्रशासनस्य दबावः: अस्य लाभं स्वीकृत्य केचन निजीविद्यालयाः छात्रान् निश्चितविक्रेतृतः ₹३,००० तः ₹५,००० पर्यन्तं महार्घाणि पुस्तकानि क्रेतुं विवशं कुर्वन्ति।
- अभिभावकानां आर्थिकपीडा: प्रतिविषयस्य सन्दर्भपुस्तकानां मूल्यं ₹५०० तः ₹८०० पर्यन्तं वर्तते, येन निर्धनाः मध्यमवर्गीयाः च परिवाराः आर्थिककष्टं अनुभवन्ति; शिक्षाविभागस्य मौनेन समाजसेविनः चिन्तिताः सन्ति।
पुस्तकाभावसङ्कटे डिजिटल-शिक्षाविकल्पेषु विमर्शः; अन्तर्जाल-सम्पर्कस्य अभावः मुख्या चुनौती।
- डिजिटल-माध्यमानां उपयोगः: देशे पाठ्यपुस्तकानां न्यूनतां दूरीकर्तुं सर्वकारेण ‘e-Pathshala’ तथा ‘PM e-Vidya’ इति डिजिटल-मञ्चेभ्यः निःशुल्कं पीडीएफ (PDF) डाउनलोड् कर्तुं विकल्पः प्रदत्तः।
- सम्पर्कस्य समस्या: ग्रामीणक्षेत्रेषु दुर्बल-नेटवर्क-कारणतः अन्तर्जालस्य (Internet) असौलभ्यात् च छात्राः डिजिटल-माध्यमेन पठितुं काठिन्यं अनुभवन्ति।
- नीतिसमीक्षा: शिक्षाविद्भिः उक्तं यत् देशस्य डिजिटल-असामान्यतां विचिन्त्य केवलं अन्तर्जाल-विकल्पेषु आश्रितत्वं सामान्यछात्राणां कृते न्यायपूर्णं नास्ति।
सुदूर-ग्रामीणक्षेत्रेषु डिजिटल-शिक्षायाः यथार्थता; आधारभूत-सुविधानां अभावेन छात्राणां शैक्षणिकसङ्कटम्।
- भौगोलिक्यः प्राविधिक्यः च बाधाः: छत्तीसगढ़राज्यस्य बस्तर-सरगुजादि-सुदूरक्षेत्रेषु विद्युतः असंतुलितप्रवाहः तथा अन्तर्जालस्य (Internet) दौर्बल्यं डिजिटल-शिक्षायाः मार्गे मुख्यविघ्नं वर्तते।
- छात्राणां स्वास्थ्य-शैक्षणिकहानिः: लघु-चलद्भाष-यन्त्रस्य (Mobile Screen) साहाय्येन भौतिक-रसायनशास्त्रादीनां पञ्चशतमित-पृष्ठात्मक-पाठ्यपुस्तकानां पीडीएफ (PDF) माध्यमेन पठनं छात्राणां स्वास्थ्ये (नेत्रपीडा, शिरोवेदना च) विपरीतप्रभावं जनयति।
- नीतिपरिवर्तनस्य आवश्यकता: शिक्षाविद्भिः उक्तं यत् सर्वकारेण केवलं संख्यात्मक-आङ्कडानां पूर्तये कार्यं न कृत्वा वास्तविकरूपेण निर्धनछात्राणां कृते व्यावहारिकं ‘डिजिटल-न्यायम्’ सुनिश्चितं करणीयम्।
निजीविद्यालयानां अत्यधिकं व्यवसायीकरणम्; प्रवेशधनं (डोनेशन), गणवेशः तथा सुखसाधनानां नाम्ना आर्थिकशोषणस्य समीक्षा।
- वाणिज्यिक-गठबन्धनम्: अभिभावकसङ्घानां आरोपः अस्ति यत् केचन निजीविद्यालयाः पुस्तकविक्रेतृभिः वस्त्रनिर्मातृभिः च सह गुप्तसन्धिं कृत्वा पाठ्यसामग्रीणां मूल्यं वर्धयन्ति।
- अतिरिक्त-वित्तीयभारः: निश्चितविक्रेतृतः एव ₹१,५०० मूल्यस्य कण्ठबन्धं (टाई) कटिबन्धं (बेल्ट) च क्रेतुं छात्रेषु दबावः क्रियते, अन्यथा तेषां प्रवेशः निषिध्यते।
- आधारभूतसुविधानां शून्यता: ‘स्मार्ट-क्लास’ तथा ‘भवन-कोष’ नाम्ना अत्यधिकधनग्रहणे सत्यपि वर्गेषु व्यजनानां (पंखे) प्रकाशस्य च उचितव्यवस्था नास्ति, येन नियमनस्य आवश्यकता वर्तते।
शिक्षा-आयव्ययकस्य (बजट) दावानां समीक्षा; ₹१.३९ लक्षकोटि-आवंटने सत्यपि उच्चतर माध्यमिकछात्राणां उपरि आर्थिकभारः।
- आयव्ययको यथार्थता च: सर्वकारेण उद्घोषिते ₹१.३९ लक्षकोटिपरिमिते राष्ट्रियशिक्षा-आयव्ययके प्रांतीयदावेषु च सत्यपि एकादश-द्वादशकक्षाणां छात्राणां प्राथमिकावश्यकताः अपूर्णाः सन्ति।
- पाठ्यपुस्तकानां सङ्कटम्: उच्चतरमाध्यमिकवर्गाणां छात्राः मूलपुस्तकानां कृते पुरातन-आपणेषु आश्रिताः सन्ति अथवा निजीप्रकाशकेभ्यः महार्घेण मूल्येन क्रेतुं विवशाः भवन्ति।
- नीतिगतं मूल्याङ्कनम्: शिक्षाविद्भिः उक्तं यत् यावत् आधारेभूतानि शैक्षणिकसाधनानि वास्तविकरूपेण प्रत्येकं छात्रं न प्राप्नुवन्ति, तावत् एतां धनराशं ‘ऐतिहासिकं’ वा ‘युवा-हितैषिणं’ वा वक्तुं न न्याय्यम्।
राजनीतिकअभियानेषु सर्वकारीयव्ययः बनाम छात्रकल्याणम्; कल्याणकारी-प्राथमिकतासु सामाजिकसमीक्षा।
- आयव्यय प्राथमिकतासु संशयः: समाजसेविभिः शिक्षाविद्भिः च राजनैतिकप्रचाराणां, विज्ञापनानां च कृते सर्वकारीयकोषतः क्रियमाणस्य विशालधनव्ययस्य विषये चिन्ता प्रकटीकृता।
- छात्राणाम् असन्तोषः: उच्चतरमाध्यमिककक्षाणां (११-१२) छात्रेषु एषः असन्तोषः वर्धते यत् देशस्य विकासाय आवश्यकाणां पाठ्यपुस्तकानां कृते सर्वकारेण उचितं साहाय्यं (न्यूनमूल्यं वा निःशुल्कं) न दीयते।
- चुनावी-प्रतिज्ञानां समीक्षा: नागरिकमञ्चैः प्रतिपादितं यत् छात्रकल्याणसम्बद्धाः आधारेभूताः विषयाः केवलं निर्वाचनकालस्य घोषणासु न सीमिताः भवेयुः, अपितु तेषां व्यावहारिकं क्रियान्वयनं आवश्यकम्।


