कमर छठ: संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए मनाया जाता है पर्व।Kamar chhath: A festival for children’s long life, happiness and prosperity.कमरषष्ठी: सन्तानस्य दीर्घायुः सुखसमृद्धेः च कामनया आचर्यते पर्व।
भाद्रपद कृष्ण षष्ठी को मनाया जाने वाला यह पर्व हलषष्ठी, हरछठ, ललही छठ और कमर छठ के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन भगवान बलराम की पूजा की जाती है।

जानिए पर्व के प्रमुख कारण और मान्यताएं।
- भगवान बलराम का जन्मोत्सव: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हुआ था। उनका प्रमुख अस्त्र हल माना जाता है। इसी मान्यता के चलते कमर छठ के दिन भगवान बलराम और हल की विशेष पूजा की जाती है।
- संतान की मंगलकामना: कमर छठ पर माताएं संतान के अच्छे स्वास्थ्य, लंबी उम्र और सुखी जीवन की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं। मान्यता है कि यह व्रत बच्चों को संकटों से बचाने और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए किया जाता है।
- कमर पर छुआने की परंपरा: इस दिन पूजा के दौरान प्रतीकात्मक रूप से बनाई गई हरछठ (छरबेरी की शाखा) को हल्दी के पानी में भिगोकर संतान की कमर पर छुआया जाता है, जिससे इसे ‘कमरछठ’ भी कहा जाने लगा।
कमर छठ व्रत के प्रमुख नियम।
- बिना हल जोते अन्न का सेवन: कमर छठ व्रत में हल से जोती गई भूमि से प्राप्त अनाज और सब्जियों का सेवन नहीं किया जाता। इस दिन विशेष रूप से बिना जोते प्राकृतिक रूप से उगे पसहर (तिन्नी) चावल का उपयोग करने की परंपरा है।
- भैंस के दूध-दही का प्रयोग: कमर छठ व्रत में गाय के दूध और घी का सेवन वर्जित माना जाता है। इस दिन भैंस के दूध, दही और घी का ही उपयोग करने की परंपरा है।
कमर छठ पूजा के बाद सुनाई जाती है व्रत कथा।
पूजा के बाद सुनती हैं कमर छठ की कथा कमर छठ के अवसर पर महिलाएं विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने के बाद एक स्थान पर एकत्र होती हैं और श्रद्धापूर्वक कमर छठ व्रत की कथा सुनती हैं। कथा श्रवण के बाद हलषष्ठी माता की आरती की जाती है। धार्मिक मान्यताओं और लोकपरंपराओं के अनुसार, इस पर्व का संबंध संतान के सुख, स्वास्थ्य, दीर्घायु और उनकी रक्षा से माना जाता है। माताएं अपनी संतानों के उज्ज्वल भविष्य और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना के साथ इस व्रत का पालन करती हैं।
छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति में कमर छठ का विशेष स्थान।
कमर छठ छत्तीसगढ़ की धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोकसंस्कृति और पारंपरिक परंपराओं का भी अहम हिस्सा है। इस अवसर पर महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना करती हैं, व्रत कथा का श्रवण करती हैं और अपनी संतानों की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य व उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं। गांवों से लेकर शहरों तक इस पर्व को लेकर श्रद्धा और उत्साह का माहौल देखने को मिलता है।
कमर छठ पूजा की विधि।
कमर छठ का व्रत पुत्रवती महिलाएं श्रद्धा के साथ करती हैं। मान्यता के अनुसार, यह व्रत पुत्रों की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और मंगलमय जीवन की कामना के लिए रखा जाता है। पूजन के दौरान प्रत्येक पुत्र के लिए छह छोटे मिट्टी या चीनी के पात्र तैयार किए जाते हैं, जिनमें पांच या सात प्रकार के भुने हुए अनाज अथवा मेवे भरने की परंपरा है।
कमर छठ की पूजा में जारी, पलाश और नारी की शाखाओं को भूमि या मिट्टी से भरे गमले में स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। व्रत के समापन पर महिलाएं पड़िया वाली भैंस के दूध से तैयार दही और महुआ के सूखे फूल पलाश के पत्ते पर ग्रहण कर व्रत का पारण करती हैं। यह परंपरा कमर छठ की लोक आस्था और विशिष्ट पूजा-विधि को दर्शाती है।
कमर छठ पूजा में इन बातों का रखें विशेष ध्यान।
हलषष्ठी के अवसर पर माताएं अपनी संतानों की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना के लिए व्रत रखती हैं। पूजा की शुरुआत घर की दीवार पर गेरू, मिट्टी या भैंस के गोबर से छठ माता का चित्र बनाने से होती है। इसके बाद भगवान गणेश और माता गौरा की विधि-विधान से पूजा की जाती है तथा पहले से तैयार ऐपन से पूजा स्थल और देवी-देवताओं का श्रृंगार किया जाता है।
पूजा के लिए घर में ही जमीन को लीपकर एक छोटा-सा तालाब तैयार किया जाता है। इसमें झरबेरी, पलाश और कांसी के पौधे स्थापित किए जाते हैं। महिलाएं इसी पूजा स्थल के समीप बैठकर श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करती हैं और हलषष्ठी व्रत की कथा का श्रवण करती हैं। यह परंपरा पर्व की लोकआस्था और पारंपरिक पूजा-विधि को दर्शाती है।
जानिए पर्व की धार्मिक मान्यता।
हरछठ से जुड़ी एक लोककथा के अनुसार, प्राचीन समय में एक ग्वालिन के प्रसव का समय निकट था। प्रसव पीड़ा के बीच भी उसे दूध-दही बेचने की चिंता सताने लगी। उसे भय था कि यदि इसी दौरान प्रसव हो गया तो उसका दूध-दही बिना बिके ही पड़ा रह जाएगा। इसी सोच के कारण वह अपनी स्थिति की परवाह किए बिना दूध-दही बेचने में लगी रही।
इसी चिंता के चलते ग्वालिन दूध-दही से भरे घड़े सिर पर रखकर उन्हें बेचने के लिए निकल पड़ी। हालांकि, कुछ दूरी तय करने के बाद अचानक उसे तेज प्रसव पीड़ा होने लगी। वह पास ही झरबेरी की झाड़ियों की ओट में चली गई, जहां उसने एक शिशु को जन्म दिया।
दूध-दही बेचने की लालसा में ग्वालिन अपने नवजात शिशु को वहीं छोड़कर आसपास के गांवों की ओर निकल पड़ी। संयोगवश उस दिन हल षष्ठी का पर्व था, जब गांव में लोग धार्मिक परंपरा के अनुसार केवल भैंस के दूध का ही उपयोग करते थे। ग्वालिन ने गाय और भैंस के मिश्रित दूध को केवल भैंस का दूध बताकर ग्रामीणों को बेच दिया और अपना पूरा दूध खपा दिया।
इधर, जिस झरबेरी की झाड़ी के नीचे ग्वालिन अपने नवजात शिशु को छोड़कर गई थी, उसके पास ही एक किसान खेत में हल चला रहा था। इसी दौरान अचानक उसके बैल बिदक गए और हल का फाल बच्चे के शरीर में जा लगा। घटना देखकर किसान बेहद व्यथित हो उठा, लेकिन उसने घबराने के बजाय साहस और धैर्य बनाए रखा।
किसान ने हिम्मत जुटाते हुए झरबेरी के कांटों की मदद से बच्चे के घायल पेट को जोड़ने का प्रयास किया। इसके बाद वह बच्चे को वहीं छोड़कर वहां से चला गया।
कुछ समय बाद जब ग्वालिन दूध-दही बेचकर वापस लौटी, तो अपने बच्चे की गंभीर हालत देखकर वह स्तब्ध रह गई। घटना को देखते ही उसे अपनी गलती का एहसास हो गया। वह मन ही मन पछताने लगी कि यदि उसने गाय और भैंस के मिश्रित दूध को भैंस का दूध बताकर झूठ नहीं बोला होता, तो गांव की महिलाओं की धार्मिक मान्यता प्रभावित नहीं होती और उसके बच्चे को भी ऐसी पीड़ा नहीं झेलनी पड़ती।
इसके बाद उस महिला ने अपने किए पर पश्चाताप करते हुए पूरी घटना गांव की महिलाओं और ग्रामीणों को बता दी। उसकी सच्चाई और प्रायश्चित की भावना को देखते हुए महिलाओं ने स्वधर्म की रक्षा करते हुए उसे क्षमा कर दिया। साथ ही, उन्होंने उसे आशीर्वाद देकर भविष्य में धर्म और मर्यादा का पालन करने की सीख दी।
स्त्रियों का आशीर्वाद मिलने के बाद वह महिला दोबारा झरबेरी के पेड़ के नीचे पहुंची। वहां पहुंचकर उसने देखा कि उसका मृत बच्चा जीवित हो चुका था। इस चमत्कार को देखकर वह भावुक हो उठी और उसी क्षण जीवनभर कभी झूठ न बोलने का संकल्प लिया।
(English)
Celebrated on the sixth day of Krishna Paksha in Bhadrapada, the festival is known as Hal Shashthi, Harchhath, Lalhi Chhath and Kamar Chhath. Lord Balram is worshipped on this day.
Know the Main Reasons and Beliefs Behind the Festival.
- Birth Anniversary of Lord Balram: According to religious beliefs, Lord Balram, the elder brother of Lord Krishna, was born on the sixth day of the Krishna Paksha. As the plough is considered his principal weapon, devotees worship Lord Balram and the plough on Kamar Chhath.
- Prayers for Children’s Well-being: On Kamar Chhath, mothers observe a waterless fast for the good health, long life and happiness of their children. The fast is traditionally believed to seek protection from difficulties and a bright future for the children.
- The tradition of touching the waist: On this day, during the ritual, the symbolic Harc hhath (a branch of the wild berry bush/Chharberi) is soaked in turmeric water and touched to the child’s waist. Because of this practice, the festival also came to be known as ‘Kamar chhath’ (Waist-Chhath).
Key Rules of Kamar Chhath Vrat.
- Consumption of Unploughed Grains: During Kamar Chhath Vrat, devotees traditionally avoid grains and vegetables grown on ploughed land. Pasahar (Tinni) rice, which is believed to grow naturally without ploughing, is specially used on this day.
- Use of Buffalo Milk and Curd: During Kamar Chhath Vrat, consuming cow’s milk and ghee is traditionally considered prohibited. Devotees use buffalo milk, curd and ghee on this day.
Kamar Chhath Vrat Katha Is Recited After the Puja.
On the occasion of Kamar Chhath, women gather together after performing the traditional rituals and worship. They listen to the Kamar Chhath Vrat Katha with devotion, followed by the aarti of Hal Shashthi Mata. According to religious beliefs and folk traditions, the festival is associated with the well-being, good health, long life and protection of children. Mothers observe the vrat with prayers for their children’s bright future, happiness and prosperity.
Kamar Chhath Holds a Special Place in Chhattisgarh’s Folk Culture.
Kamar Chhath is not only a festival of religious faith but is also deeply connected with the folk culture and traditional customs of Chhattisgarh. On this occasion, women gather for collective worship, listen to the vrat katha and pray for the health, prosperity and bright future of their children. The festival is celebrated with great enthusiasm and devotion in both rural and urban areas.
Kamar Chhath Puja Rituals.
Women who have sons observe the Kamar Chhath fast with devotion. According to traditional beliefs, the vrat is observed for the long life, happiness, prosperity and well-being of their sons. During the ritual, six small clay or sugar containers are prepared for each son and are traditionally filled with five or seven types of roasted grains or dry fruits.
As part of the Kamar Chhath rituals, branches of Jaari, Palash and Naari are traditionally placed in the ground or in a pot filled with soil and worshipped according to customary practices. At the conclusion of the fast, women traditionally consume curd prepared from the milk of a buffalo with a calf, along with dried Mahua flowers, served on Palash leaves. The ritual reflects the distinctive folk traditions and religious faith associated with Kamar Chhath.
Key Things to Keep in Mind During Kamar Chhath Puja.
On Hal Shashthi, mothers observe a fast praying for the long life, well-being, prosperity and protection of their children. The ritual begins with drawing an image of Chhath Mata on a wall using geru (ochre), clay or buffalo.
For the ritual, a small pond is prepared at home by plastering and smoothing the ground. Plants or branches associated with the tradition, including Jharberi, Palash and Kans, are placed around it. Women sit near the sacred setup, perform the puja and listen to the Hal Shashthi Vrat Katha. The ritual reflects the festival’s deep connection with folk faith and traditional customs.
Know the Religious Significance of the Festival.
According to another folklore associated with Har Chhath, there once lived a milkmaid whose delivery was approaching. Despite being troubled by labor pains, she remained worried about selling milk and curd. She feared that if she went into labor at that moment, her milk and curd would remain unsold. Driven by this concern, she continued focusing on selling dairy products despite her condition.
Driven by this concern, the milkmaid set out to sell her milk and curd, carrying pots filled with dairy products on her head. However, after walking a short distance, she suddenly experienced intense labor pains. She took shelter behind a jharberi bush, where she gave birth to a baby.
Driven by her desire to sell the milk and curd, the milkmaid left her newborn baby behind and went to nearby villages. Coincidentally, it was the day of the Hal Shashti festival, when villagers traditionally used only buffalo milk. The woman falsely claimed that the mixed cow-and-buffalo milk was pure buffalo milk and sold the entire quantity to the villagers.
Meanwhile, near the jharberi bush where the milkmaid had left her newborn baby, a farmer was ploughing his field. Suddenly, his bullocks became startled, causing the ploughshare to strike the child. The farmer was deeply distressed upon seeing the incident, but instead of panicking, he remained courageous and patient.
Gathering courage, the farmer used thorns from the jharberi bush to bring together the child’s injured abdomen. After doing so, he left the child at the spot and went away.
After selling the milk and curd, the milkmaid returned to the spot and was shocked to see her child’s condition. She immediately realized the consequences of her wrongdoing and deeply regretted her actions. She thought that if she had not falsely sold the mixed cow-and-buffalo milk as buffalo milk, the religious practices of the village women would not have been affected, and her child would not have suffered such a fate.
After this, the woman, repenting for her actions, narrated the entire incident to the village women and villagers. Seeing her honesty and spirit of atonement, the women forgave her while upholding their own righteousness (Dharma). Along with this, they blessed her and advised her to follow the path of righteousness and moral conduct in the future.
After receiving the blessings of the women, that woman reached the wild berry bush once again. Upon arriving there, she saw that her dead child had come back to life. Witnessing this miracle, she became deeply emotional and at that very moment, took a vow never to speak a lie in her lifetime.
(संस्कृत)
भाद्रपदमासस्य कृष्णपक्षे षष्ठीतिथौ आचर्यमाणं पर्व हलषष्ठी, हरछठ, ललही छठ तथा कमरषष्ठी इति नामभिः प्रसिद्धम् अस्ति। अस्मिन् दिने भगवान् बलरामः पूज्यते।
कमरषष्ठी: पर्वस्य प्रमुखकारणानि मान्यताश्च ज्ञायताम्।
- भगवतः बलरामस्य जन्मोत्सवः: धार्मिकमान्यतानुसारं भगवान् श्रीकृष्णस्य ज्येष्ठभ्राता बलरामः भाद्रपदमासस्य कृष्णपक्षस्य षष्ठ्यां तिथौ जातः इति मन्यते। तस्य प्रमुखमायुधं हलम् अस्ति। अतः कमरषष्ठीपर्वणि भगवान् बलरामस्य हलस्य च विशेषपूजा क्रियते।
- सन्तानस्य मङ्गलकामना: कमरषष्ठीपर्वणि मातरः सन्तानानां स्वास्थ्यस्य दीर्घायुषः सुखमयजीवनस्य च कामनया निर्जलव्रतं धारयन्ति। परम्परानुसारं एतद् व्रतं सन्तानानां सङ्कटात् रक्षणाय उज्ज्वलभविष्यस्य च कामनया आचर्यते।
- कटि-संस्पर्शनस्य परम्परा: अस्मिन् दिने पूजायाः अवसरे प्रतीकात्मकरूपेण निर्मिता ‘हरछठ’ (बदरी-वृक्षस्य शाखा) हरिद्रा-जलेन सिक्त्वा सन्तानस्य कटौ संस्पृश्यते, येन कारणेन अयम् उत्सवः ‘कटिषष्ठी’ (कमरछठ) इति नाम्ना अपि ख्यातः जातः।
कमरषष्ठीव्रतस्य प्रमुखाः नियमाः।
- अलाङ्गलभूमिजान्नस्य सेवनम्: कमरषष्ठीव्रते हलद्वारा कृष्टभूमौ उत्पन्नानि धान्यानि शाकानि च न सेवनीयानि इति परम्परा अस्ति। अस्मिन् दिने प्राकृतिकरूपेण अकृष्टभूमौ उत्पन्नस्य पसहर-तण्डुलस्य विशेषतः प्रयोगः क्रियते।
- महिषीदुग्ध-दधि-घृतस्य प्रयोगः: कमरषष्ठीव्रते गोदुग्धस्य घृतस्य च सेवनं वर्जितं मन्यते। अस्मिन् दिने केवलं महिषीदुग्धं दधि घृतं च उपयुज्यते इति परम्परा अस्ति।
कमरषष्ठीपूजनानन्तरं व्रतकथा श्राव्यते।
कमरषष्ठीपर्वणि महिलाः विधिविधानपूर्वकं पूजां कृत्वा एकत्रिताः भवन्ति तथा श्रद्धया कमरषष्ठीव्रतकथां शृण्वन्ति। कथाश्रवणानन्तरं हलषष्ठीमातुः आरती अपि क्रियते। धार्मिकमान्यतानुसारं लोकपरम्परासु च अस्य पर्वणः सम्बन्धः सन्तानानां कल्याणेन, स्वास्थ्येन, दीर्घायुषा रक्षणेन च मन्यते। मातरः सन्तानानां उज्ज्वलभविष्यस्य सुखसमृद्धेः च कामनया श्रद्धापूर्वकम् अस्य व्रतस्य पालनं कुर्वन्ति।
छत्तीसगढस्य लोकसंस्कृतौ कमरषष्ठ्याः विशेषं महत्त्वम्।
कमरषष्ठी केवलं धार्मिकश्रद्धायाः पर्व नास्ति, अपितु छत्तीसगढस्य लोकसंस्कृतेः पारम्परिकरीतीनां च महत्त्वपूर्णः भागः अस्ति। अस्मिन् अवसरे महिलाः सामूहिकरूपेण पूजाम् आचरन्ति, व्रतकथां शृण्वन्ति तथा सन्तानानां स्वास्थ्यस्य सुखसमृद्धेः उज्ज्वलभविष्यस्य च कामनां कुर्वन्ति। ग्रामेषु नगरेषु च अस्य पर्वणः विषये विशेषः उत्साहः श्रद्धा च दृश्यते।
कमरषष्ठीपूजनस्य विधिः।
पुत्रवत्यः महिलाः श्रद्धया कमरषष्ठीव्रतं कुर्वन्ति। पारम्परिकमान्यतानुसारं पुत्राणां दीर्घायुषः सुखसमृद्धेः कल्याणस्य च कामनया एतद् व्रतम् आचर्यते। पूजनसमये प्रत्येकस्य पुत्रस्य कृते षट् लघुमृण्मयपात्राणि अथवा शर्करापात्राणि स्थाप्यन्ते। तेषु पञ्च वा सप्त प्रकारकाणि भर्जितधान्यानि अथवा शुष्कफलानि स्थापयन्ति इति परम्परा अस्ति।
कमरषष्ठीपूजने जारी-वृक्षस्य, पलाशवृक्षस्य, नारीलतायाश्च शाखाः भूमौ अथवा मृण्मयघटे मृदा पूरिते स्थापयित्वा विधिवत् पूज्यन्ते। व्रतस्य समापनसमये महिलाः वत्सवतीमहिषीदुग्धेन निर्मितं दधि तथा शुष्कानि महुआपुष्पाणि पलाशपत्रे स्थापयित्वा भुञ्जते। एषा परम्परा कमरषष्ठीपर्वणः विशिष्टां लोकश्रद्धां पूजाविधानं च प्रदर्शयति।
कमरषष्ठीपूजने एतेषु विषयेषु विशेषं ध्यानं दद्यात्।
हलषष्ठीपर्वणि मातरः सन्तानानां दीर्घायुः, कल्याणं, सुखसमृद्धिं रक्षणं च कामयित्वा व्रतम् आचरन्ति। पूजायाः प्रारम्भे गृहे भित्तौ गेरुमृत्तिकया, मृत्तिकया अथवा महिषीगोमयेन छठमातुः चित्रं निर्मीयते। ततः भगवान् गणेशः माता गौरी च विधिवत् पूज्येते। पूर्वसज्जितेन ऐपनचित्रेण पूजास्थलस्य अलङ्करणं क्रियते।
पूजार्थं गृहे भूमिं लेपयित्वा लघुजलाशयः निर्मीयते। तत्र झरबेरी, पलाश तथा कांसी इत्यादीनां वनस्पतीनां स्थापनं क्रियते। महिलाः तस्य पूजास्थलस्य समीपे उपविश्य श्रद्धया पूजां कुर्वन्ति तथा हलषष्ठीव्रतकथां शृण्वन्ति। एषा परम्परा अस्य पर्वणः लोकश्रद्धां पारम्परिकपूजाविधानं च प्रतिबिम्बयति।
हरषष्ठीव्रतकथा: पर्वस्य धार्मिकमहत्त्वं ज्ञायताम्।
हरषष्ठी-व्रते सम्बद्धायाः अन्यस्याः लोककथायाः अनुसारं प्राचीनकाले एका गोपालिका प्रसवसमयं समीपं प्राप्नोत्। प्रसववेदनया पीडिता अपि सा दुग्ध-दधिविक्रयस्य चिन्तां कुर्वती आसीत्। तस्याः मनसि भयमासीत् यत् यदि तस्मिन्नेव समये प्रसवः भवेत्, तर्हि तस्याः दुग्धं दधि च अविक्रितमेव तिष्ठेत्। अतः स्वस्य अवस्थां न गणयित्वा सा दुग्ध-दधिविक्रये एव प्रवृत्ता अभवत्।
एतया चिन्तया सा गोपालिका दुग्ध-दधिपूर्णान् घटान् शिरसि धृत्वा विक्रयार्थं प्रस्थिता। किन्तु किञ्चिद्दूरं गत्वा तस्याः सहसा तीव्रा प्रसववेदना अभवत्। ततः सा समीपस्थस्याः झरबेरी-लतायाः ओटं गत्वा तत्रैव शिशुम् अजनयत्।
दुग्ध-दधिविक्रयस्य लोभेन सा गोपालिका स्वं नवजातं शिशुं तत्रैव त्यक्त्वा समीपस्थेषु ग्रामेषु प्रस्थिता। संयोगेन तस्मिन् दिने हलषष्ठी-पर्व आसीत्, यस्मिन् ग्रामवासिनः धार्मिकपरम्परानुसारं केवलं महिष्याः दुग्धमेव उपयुञ्जते स्म। सा स्त्री गोदुग्ध-महिषदुग्धयोः मिश्रितं दुग्धं केवलं महिषदुग्धमिति मिथ्या कथयित्वा ग्रामवासिभ्यः सर्वं दुग्धं विक्रीतवती।
अथ तस्याः झरबेरी-वृक्षस्य समीपे, यस्य अधः गोपालिकया नवजातः शिशुः त्यक्तः आसीत्, एकः कृषकः क्षेत्रे हलं चालयति स्म। तस्मिन् समये सहसा तस्य वृषभौ उद्विग्नौ अभवताम्, येन हलस्य फालः शिशोः शरीरे प्रविष्टः अभवत्। एतां घटनां दृष्ट्वा कृषकः अतीव दुःखितः अभवत्, तथापि सः धैर्यं साहसं च न त्यक्तवान्।
कृषकः धैर्यं धारयित्वा झरबेरी-कण्टकैः शिशोः विदीर्णं उदरं संयोजयितुं प्रयत्नं कृतवान्। ततः सः शिशुं तत्रैव त्यक्त्वा ततः प्रस्थितवान्।
किञ्चित्कालानन्तरं दुग्ध-दधि विक्रीय सा गोपालिका तत्र प्रत्यागता। स्वस्य शिशोः दयनीयां दशां दृष्ट्वा सा स्तब्धा अभवत् तथा स्वस्य दोषस्य फलमिति अवगतवती। सा मनसि पश्चात्तापं कुर्वती अचिन्तयत्—यदि अहं गो-महिष्ययोः मिश्रितं दुग्धं केवलं महिष्याः दुग्धमिति मिथ्या न विक्रीतवती अभविष्यं, तर्हि ग्रामस्य स्त्रीणां धार्मिकाचारः न दूषितः अभविष्यत्, मम शिशोः च एषा दारुणा दशा न अभविष्यत्।
ततः सा स्त्री स्वकृतस्य कर्मणः पश्चात्तापं कुर्वती सम्पूर्णां घटनां ग्रामस्य स्त्रीभ्यः ग्रामवासिभ्यश्च निवेदितवती। तस्याः सत्यवादितां पश्चात्तापभावनां च दृष्ट्वा स्त्रियः स्वधर्मस्य रक्षणं कुर्वत्यः तस्यै क्षमां प्रदत्तवत्यः। अपि च, ताः तस्यै आशीर्वादं दत्त्वा भविष्ये धर्मस्य मर्यादायाश्च पालनं कर्तुं उपदेशं दत्तवत्यः।
स्त्रीभ्यः आशीर्वादं प्राप्त्वा सा महिला पुनः झरबेरी-वृक्षस्य अधः गता। तत्र गत्वा सा अपश्यत् यत् तस्याः मृतः शिशुः पुनर्जीवितः अभवत्। एतं चमत्कारं दृष्ट्वा सा भावविह्वला अभवत् तथा तस्मिन्नेव क्षणे जीवनपर्यन्तं कदापि असत्यं न वदिष्यामीति दृढं संकल्पं कृतवती।


