छत्तीसगढ़ में हाथी के बच्चे के जन्म पर अनोखा उत्सव, सात गांवों ने मनाई छठी; 1500 लोगों ने ग्रहण किया भंडारा.Unique Celebration in Chhattisgarh: Seven Villages Celebrate a Baby Elephant’s Birth, 1,500 People Attend Community Feast. छत्तीसगढे गजशावकस्य जन्मोत्सवः, सप्तग्रामवासिभिः ‘षष्ठी’ समारोहः आयोजितः; सहस्रपञ्चशतजनाः भोजने सम्मिलिताः

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छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के करतला वन परिक्षेत्र अंतर्गत साजापानी गांव में नन्हे हाथी के जन्म की खुशी अनोखे अंदाज में मनाई गई। काशीरानी मंदिर के पास स्थित वन क्षेत्र में जन्मे हाथी के शावक की छठी छह दिन बाद गांव के मंदिर परिसर में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुई।

इस विशेष अवसर पर पूजा-अर्चना, धार्मिक अनुष्ठान, भजन-कीर्तन और विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। समारोह में साजापानी सहित आसपास के सात गांवों के डेढ़ हजार से अधिक ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। पूरे क्षेत्र में धार्मिक आस्था और उल्लास का माहौल देखने को मिला।

कार्यक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधियों के अलावा वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी भी शामिल हुए। नन्हे हाथी के जन्म की खुशी में आयोजित इस अनूठे समारोह ने ग्रामीणों के प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति प्रेम को भी दर्शाया।

ग्रामीणों की बड़ी भागीदारी ने इस आयोजन को एक भव्य सामूहिक उत्सव में बदल दिया। हाथियों की आवाजाही से प्रभावित रहने वाले वनांचल में यह कार्यक्रम सामाजिक सद्भाव, आपसी सहयोग और ग्रामीण एकता को मजबूत करने का माध्यम भी बना।

काशीरानी नवयुवक सेवा समिति के अध्यक्ष बोधन चौहान ने बताया कि छठी संस्कार आयोजित करने का उद्देश्य केवल धार्मिक परंपरा को निभाना नहीं है, बल्कि हाथी प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों को एकजुट कर उनके बीच मेल-मिलाप और भाईचारे को बढ़ावा देना भी है। उन्होंने कहा कि हाथी हमारे वनांचल और प्राकृतिक पर्यावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, इसलिए उनके प्रति संवेदनशीलता और सह-अस्तित्व की भावना बनाए रखना जरूरी है।

मानव और वन्यजीवों के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखना वनांचल के जीवन का अहम हिस्सा है। ऐसे क्षेत्रों में ग्रामीणों के लिए जरूरी है कि वे हाथियों की आवाजाही के बीच सतर्कता बरतें और वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाएं।

ग्रामीणों के मुताबिक, हाथियों के गांव के आसपास विचरण करने के बावजूद अब तक उनके गांव में किसी प्रकार की क्षति नहीं हुई है। इसी सकारात्मक अनुभव और खुशी की भावना के साथ ग्रामीणों ने नन्हे हाथी के जन्म को उत्सव के रूप में मनाया। इस अनूठी पहल के जरिए वन्यजीवों के संरक्षण, प्रकृति के प्रति सम्मान और मनुष्य-वन्यजीव सह-अस्तित्व का संदेश दिया गया।

भजन-कीर्तन और रामायण गायन में श्रद्धा व उत्साह के साथ शामिल हुए ग्रामीण.

वन्यजीवों के प्रति ग्रामीणों का अपनत्व बना मिसाल.

कार्यक्रम में विशेष रूप से शामिल कोरबा वन मंडल के एसडीओ मणिकांत वर्मा ने ग्रामीणों के इस अनूठे प्रयास की सराहना की। उन्होंने कहा कि वन्यजीवों के प्रति लोगों का प्रेम, संवेदनशीलता और सद्भाव देखकर प्रसन्नता होती है। आमतौर पर हाथियों की आवाजाही से प्रभावित इलाकों में ग्रामीणों के बीच डर और नाराजगी देखने को मिलती है, लेकिन साजापानी और आसपास के गांवों के लोगों ने नवजात हाथी की छठी मनाकर सकारात्मक सोच की मिसाल पेश की है।

वर्मा ने कहा कि वन्यजीवों की सुरक्षा करना केवल वन विभाग का दायित्व नहीं है, बल्कि स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी इसमें अहम भूमिका निभाती है। ग्रामीणों के सहयोग से मनुष्य और हाथियों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया जा सकता है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वन विभाग वन्यजीवों के संरक्षण के साथ ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए भी लगातार काम करता रहेगा। इसके लिए ग्रामीणों और वन विभाग के कर्मचारियों के बीच बेहतर समन्वय और आपसी सहयोग बनाए रखना आवश्यक है।

नन्हे शावक के साथ जंगल में विचरण करता हाथियों का झुंड.

कोरबा जिले के साजापानी गांव के आसपास के जंगलों में हाथियों के दल की आवाजाही लगातार जारी है। झुंड में नवजात हाथी के शामिल होने के बाद भी दल वन क्षेत्र में विचरण कर रहा है। वन विभाग हाथियों की गतिविधियों पर लगातार निगरानी बनाए हुए है, ताकि ग्रामीणों और वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

वन विभाग ने ग्रामीणों से अपील की है कि वे हाथियों की आवाजाही वाले क्षेत्रों से सुरक्षित दूरी बनाए रखें। हाथियों के नजदीक जाने, उन्हें परेशान करने या उनके साथ किसी तरह की छेड़छाड़ करने से बचें। साथ ही, हाथियों की मौजूदगी की जानकारी मिलने पर सतर्कता बरतें और संबंधित वन अमले को सूचित करें।

नवजात हाथी के जन्म की खुशी में आयोजित छठी संस्कार का सामूहिक आयोजन वन्यजीवों के प्रति ग्रामीणों के स्नेह और संवेदनशीलता का प्रतीक बना। इस पहल ने मनुष्य और वन्यजीवों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने तथा प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रहने का संदेश भी दिया।

English

Sajapani village in the Kartala forest range of Chhattisgarh’s Korba district witnessed a unique celebration following the birth of a baby elephant. Six days after the calf was born in the forest area near Kashirani Temple, villagers organised a traditional Chhathi ceremony at the village temple premises.

The event featured religious rituals, prayers, devotional singing and a community feast. More than 1,500 villagers from Sajapani and six neighbouring villages participated in the celebration, creating an atmosphere of devotion and joy.

Local public representatives, along with forest department officers and staff, were also present. The unique celebration reflected the villagers’ affection for nature and their appreciation of wildlife.

The large turnout of villagers transformed the ceremony into a vibrant community celebration. In this forest region, where residents are frequently affected by elephant movement, the event also served as a platform to strengthen social harmony, mutual interaction and unity among villagers.

Bodhan Chauhan, president of the Kashirani Nav Yuvak Seva Samiti, said the purpose of organising the Chhathi ceremony was not limited to preserving religious traditions. It was also intended to bring together people from elephant-affected villages and encourage stronger social bonds.

He emphasised that elephants are an integral part of the forest landscape and natural environment, highlighting the importance of coexistence between humans and wildlife.

Maintaining harmony between humans and wildlife is essential in forest-dominated regions. Residents need to remain cautious while living alongside elephants and develop a sensitive and responsible attitude towards wildlife.

According to villagers, although elephants frequently roam around their village, no damage has been reported in the village so far. With this positive experience and a sense of happiness, the villagers celebrated the birth of the baby elephant as a special occasion.

The initiative conveyed a broader message about wildlife conservation, respect for nature and the importance of peaceful coexistence between humans and wild animals.

Villagers Participate Enthusiastically in Devotional Songs and Ramayana Recitation.

Villagers’ Affection for Wildlife Sets an Inspiring Example.

Manikant Verma, Sub-Divisional Officer (SDO) of the Korba Forest Division, who attended the event, appreciated the villagers’ unique initiative. He said it was encouraging to witness such affection, sensitivity and goodwill towards wildlife.

He noted that people living in areas frequently affected by elephant movement often experience fear and resentment. However, residents of Sajapani and neighbouring villages demonstrated a positive approach by celebrating the traditional Chhathi ceremony following the birth of a baby elephant.

Verma emphasised that wildlife conservation is not solely the responsibility of the Forest Department; active participation from local communities is equally important. Cooperation from villagers can help improve coexistence between humans and elephants.

He assured that the Forest Department would continue working to protect wildlife while ensuring the safety of local residents. He also stressed the need for effective coordination and cooperation between villagers and forest personnel.

Elephant Herd Roams the Forest with Its Young Calf.

Elephants continue to roam the forest areas surrounding Sajapani village in Korba district. Following the birth of a newborn calf, the herd remains active in the forest, with the young elephant accompanying the group. The Forest Department is closely monitoring the herd’s movements to ensure the safety of both local residents and wildlife.

Forest officials have urged villagers to maintain a safe distance from areas frequented by elephants, avoid approaching or disturbing them, and remain alert whenever elephant movement is reported. Residents are also encouraged to inform forest personnel about elephant sightings.

The community celebration organised to mark the newborn elephant’s traditional Chhathi ceremony reflected the villagers’ affection and sensitivity towards wildlife. The initiative also conveyed a message of peaceful coexistence between humans and animals and the importance of living in harmony with nature.

संस्कृति

छत्तीसगढराज्यस्य कोरबाजनपदे करतला-वनक्षेत्रान्तर्गतस्य साजापानीग्रामस्य जनाः नवजातस्य गजशावकस्य जन्मनः आनन्देन विशेषं उत्सवम् आयोजितवन्तः। काशीरानीमन्दिरस्य समीपस्थे वनप्रदेशे जातस्य गजशावकस्य षष्ठे दिने ग्राममन्दिरस्य प्राङ्गणे पारम्परिकरीत्या षष्ठीसंस्कारः सम्पन्नः।

अस्मिन् अवसरे पूजनम्, धार्मिकानुष्ठानानि, भक्तिगीतानि, भजनकीर्तनानि च आयोजितानि। साजापानीग्रामसहितं समीपस्थानां सप्तग्रामाणां पञ्चदशशताधिकाः ग्रामीणाः उत्साहेन भागम् अगृह्णन्।

कार्यक्रमे स्थानीयजनप्रतिनिधयः तथा वनविभागस्य अधिकारिणः कर्मचारीणश्च उपस्थिताः आसन्। नवजातगजशावकस्य जन्मनिमित्तम् आयोजितः अयं विशिष्टः समारोहः प्रकृतेः वन्यजीवानां च प्रति ग्रामीणानां स्नेहं प्रदर्शितवान्।

ग्रामीणानां बहुसंख्यया उपस्थित्या अयं कार्यक्रमः सामूहिकोत्सवरूपेण परिणतः। गजानां सञ्चारकारणात् प्रभाविते वनाञ्चलक्षेत्रे आयोजितः अयं समारोहः ग्रामीणानां परस्परसम्बन्धं, सामाजिकसौहार्दं, एकतां च वर्धयितुं महत्त्वपूर्णं माध्यमम् अभवत्।

काशीरानी नवयुवक सेवा समितेः अध्यक्षः बोधन चौहानः अवदत् यत् षष्ठीसंस्कारस्य आयोजनस्य उद्देश्यं केवलं धार्मिकपरम्परायाः पालनं न, अपितु गजप्रभावितक्षेत्रस्य ग्रामीणान् एकस्मिन् मञ्चे समानीय परस्परं स्नेहं सहयोगं च वर्धयितुमपि अस्ति।

तेन उक्तं यत् गजाः अस्माकं वनप्रदेशस्य प्राकृतिकपर्यावरणस्य च अभिन्नाः अङ्गाः सन्ति। अतः मानवैः वन्यजीवैः सह सहअस्तित्वस्य भावना संरक्षणीया।

मानववन्यजीवयोः मध्ये सामञ्जस्यस्य स्थापना वनाञ्चलक्षेत्रस्य जीवनस्य महत्त्वपूर्णः भागः अस्ति। अतः ग्रामीणैः गजानां सञ्चारसमये सावधानता पालनीया तथा वन्यजीवान् प्रति संवेदनशीलभावना धारणीया।

ग्रामीणानां कथनानुसारं गजाः ग्रामस्य समीपे विचरन्ति, तथापि अद्यावधि ग्रामे किमपि नुकसानं न जातम्। अस्य सकारात्मकानुभवस्य आनन्दस्य च भावनया ग्रामीणाः नवजातगजशावकस्य जन्मोत्सवं हर्षेण आचरितवन्तः।

अनेन विशिष्टेन आयोजनेन वन्यजीवसंरक्षणस्य, प्रकृतेः सम्मानस्य, मानववन्यजीवयोः सहअस्तित्वस्य च सन्देशः प्रसारितः।

भक्तिगीत-कीर्तने रामायणगाने च उत्साहेन भागं गृह्णन्तः ग्रामीणाः

वन्यजीवेषु ग्रामीणानां स्नेहः प्रशंसनीयः।

कार्यक्रमे विशेषरूपेण उपस्थितः कोरबा-वनमण्डलस्य उपखण्डीयवनाधिकारी मणिकान्तवर्मा ग्रामीणानां विशिष्टप्रयासस्य प्रशंसाम् अकरोत्। सः अवदत् यत् वन्यजीवान् प्रति जनानां स्नेहं, संवेदनशीलतां, सद्भावं च दृष्ट्वा आनन्दः भवति।

सः उक्तवान् यत् गजानां विचरणेन प्रभावितेषु क्षेत्रेषु सामान्यतः ग्रामीणानां मनसि भयस्य असन्तोषस्य च भावना उत्पद्यते। किन्तु साजापानीग्रामस्य समीपवर्तिग्रामाणां च जनाः नवजातगजशावकस्य षष्ठीसंस्कारम् आयोज्य सकारात्मकचिन्तनस्य प्रशंसनीयम् उदाहरणम् प्रस्तुतवन्तः।

वर्मणा उक्तं यत् वन्यजीवानां संरक्षणं केवलं वनविभागस्य दायित्वं नास्ति, अपितु स्थानीयजनानां सहभागितापि अत्यन्तम् आवश्यकी अस्ति। ग्रामीणानां सहयोगेन मानवगजानां च मध्ये उत्तमं सहअस्तित्वं स्थापयितुं शक्यते।

सः आश्वासनम् अददात् यत् वनविभागः वन्यजीवानां संरक्षणाय ग्रामीणानां सुरक्षायै च निरन्तरं प्रयत्नशीलः भविष्यति। अस्य उद्देश्यस्य सिद्ध्यर्थं ग्रामीणानां वनविभागीयकर्मचारिणां च मध्ये समन्वयः परस्परसहयोगश्च आवश्यकौ स्तः।

शिशुगजेन सह वनप्रदेशे विचरन् गजानां समूहः

छत्तीसगढराज्यस्य कोरबाजनपदे साजापानीग्रामस्य समीपस्थेषु वनक्षेत्रेषु गजानां समूहस्य सञ्चारः निरन्तरं प्रचलति। नवजातगजशावकस्य जन्मानन्तरम् अपि सः शावकः स्वसमूहेन सह वनप्रदेशे विचरति। ग्रामीणानां वन्यजीवानां च सुरक्षां सुनिश्चितुं वनविभागः गजानां गतिविधिषु निरन्तरं दृष्टिं स्थापयति।

वनविभागः ग्रामीणान् आह्वयति यत् ते गजानां सञ्चारक्षेत्रेभ्यः सुरक्षितं दूरत्वं रक्षेयुः। गजानां समीपं गमनं, तान् पीडयितुं वा उत्तेजयितुं वा प्रयत्नः न करणीयः। गजानां उपस्थितेः सूचना प्राप्ते सति सावधानतया व्यवहरेयुः तथा वनविभागीयकर्मचारिणः सूचयेयुः।

नवजातगजशावकस्य जन्मनः आनन्देन आयोजितः षष्ठीसंस्कारसमारोहः वन्यजीवान् प्रति ग्रामीणानां स्नेहस्य संवेदनशीलतायाश्च प्रतीकः अभवत्। अनेन आयोजनेन मानववन्यजीवयोः सहअस्तित्वस्य तथा प्रकृत्या सह सामञ्जस्यपूर्णं जीवनं यापयितुं प्रेरणादायकः सन्देशः अपि प्रसारितः।

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