गन्ने की खेती में ट्रेंच और बड कटर विधि से बढ़ेगा उत्पादन, कम लागत में किसानों की बढ़ सकती है कमाई.Trench and Bud Cutter Techniques Can Boost Sugarcane Production, Increasing Farmers’ Earnings. इक्षुकृषौ ट्रेञ्च्-बड्-कटर्-विध्योः प्रयोगेन उत्पादनं वर्धते, कृषकाणां लाभः अपि वर्धिष्यते।

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गन्ने की खेती किसानों के लिए लगातार लाभकारी विकल्प बनती जा रही है। बेहतर आमदनी की संभावना को देखते हुए किसान बड़े स्तर पर गन्ने का उत्पादन कर रहे हैं। आधुनिक कृषि तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर किसान खेती की लागत कम करने के साथ-साथ उत्पादन और मुनाफा दोनों बढ़ा सकते हैं। आइए जानते हैं, गन्ने की खेती में आधुनिक उपकरणों और नई तकनीकों का इस्तेमाल किस तरह किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

कृषि क्षेत्र में तेजी से हो रहे तकनीकी बदलावों के बीच गन्ना किसानों के लिए पारंपरिक खेती के तरीकों में बदलाव कर आधुनिक तकनीकों को अपनाना महत्वपूर्ण होता जा रहा है। गन्ना सुपरवाइजर भोलानाथ तिवारी ने विशेष बातचीत में बताया कि वैज्ञानिक पद्धतियों, उन्नत कृषि तकनीकों और आधुनिक उपकरणों के इस्तेमाल से किसान खेती की लागत को नियंत्रित करने के साथ गन्ने की उत्पादकता और आमदनी में भी बढ़ोतरी कर सकते हैं।

पारंपरिक गन्ना खेती में किसान अक्सर पूरे गन्ने या उसके बड़े टुकड़ों को बीज के रूप में खेत में लगाते थे। इससे गन्ने की मात्रा अधिक खर्च होने के साथ-साथ अंकुरण भी अपेक्षाकृत कम रहता था। गन्ना सुपरवाइजर भोलानाथ तिवारी के मुताबिक, इस समस्या को कम करने के लिए किसान बड कटर तकनीक अपना सकते हैं। इस तकनीक में गन्ने की एक-एक आंख यानी बड को अलग करके खेत में रोपा जाता है। इससे बीज की बचत होती है और पौधों का जमाव बेहतर होने के साथ फसल की वृद्धि, गुणवत्ता और फैलाव में भी सुधार देखा जा सकता है।

कम लागत में ज्यादा उत्पादन, गन्ने की बड कटर तकनीक से होगी बीज की बचत.

बड विधि से गन्ने की बुआई करने पर कम मात्रा में बीज का इस्तेमाल कर ज्यादा क्षेत्र में फसल तैयार की जा सकती है। जानकारी के अनुसार, एक बीघा खेत के लिए करीब 2,500 बड पर्याप्त माने जाते हैं, जबकि इस क्षेत्र में बुआई का कुल खर्च लगभग 10,000 से 15,000 रुपये तक हो सकता है। इसके अलावा नर्सरी और ट्रे तकनीक अपनाने से पौध तैयार करने में समय की बचत होती है। इस विधि का एक प्रमुख व्यावहारिक लाभ यह है कि मौसम या खेत की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद किसान पहले से पौध तैयार कर सकते हैं। खेत में पानी भरने या सूखे जैसी स्थिति होने पर भी ट्रे में पहले से बड लगाकर पौध तैयार रखी जा सकती है, जिससे अनुकूल समय मिलते ही खेत में रोपाई की जा सके।

बड विधि से किसानों को मिल जाता है 15 दिन से एक महीने तक का अतिरिक्त समय.

ट्रे में 15 दिन से लेकर एक महीने तक बड के अंकुरण और पौध की शुरुआती वृद्धि के बाद, खेत तैयार होते ही पौध को सीधे रोपित किया जा सकता है। इस तकनीक से गन्ने की प्रत्येक गांठ और बड का अधिकतम उपयोग संभव होता है। इससे बीज सामग्री की बर्बादी कम होती है और गन्ने के किसी भी उपयोगी हिस्से को बेकार जाने से बचाया जा सकता है।

जैविक खेती को बढ़ावा देने पर जोर, शोध केंद्रों की मदद से किसानों को मिलेगा तकनीकी सहयोग.

सुपरवाइजर भोलानाथ तिवारी ने बताया कि गन्ने की खेती में रासायनिक खाद और दवाओं के इस्तेमाल को कम करने तथा वैज्ञानिकों द्वारा विकसित जैविक विकल्पों को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। उन्नत किस्म के बीजों की खरीद को लेकर उन्होंने बड़े स्तर पर खेती करने वाले किसानों को सलाह दी कि वे सीधे सरकारी शोध केंद्रों और कृषि विभाग से संपर्क करें। विभाग और शोध संस्थान किसानों को गुणवत्तापूर्ण एवं प्रमाणित बीज उपलब्ध कराने के लिए सहयोग कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि गन्ने की खेती में ट्रेंच विधि, बड कटर तकनीक, ट्रे नर्सरी और जैविक खाद को एक साथ अपनाने से खेती में लगने वाले समय और लागत को कम करने में मदद मिल सकती है। इन आधुनिक एवं वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर किसान अपनी खेती को अधिक व्यवस्थित बनाते हुए उत्पादन और आय में सुधार की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

English

Sugarcane cultivation is increasingly emerging as a profitable option for farmers. With the potential for better returns, more farmers are taking up sugarcane production on a larger scale. By adopting scientific farming practices, modern techniques and advanced agricultural equipment, farmers can reduce cultivation costs while improving productivity and profitability. Let us understand how modern methods and tools can help farmers achieve better returns from sugarcane cultivation.

Amid rapid technological changes in the agricultural sector, adopting modern techniques instead of relying solely on traditional methods has become increasingly important for sugarcane farmers. In an exclusive interaction, sugarcane supervisor Bholanath Tiwari explained how scientific practices, advanced farming techniques and modern equipment can help farmers control cultivation costs while improving sugarcane productivity and increasing their income.

Under traditional sugarcane cultivation, farmers often planted whole sugarcane stalks or large pieces as seed material. This could result in higher seed consumption and comparatively lower germination. According to sugarcane supervisor Bholanath Tiwari, farmers can adopt the bud cutter technique to address these issues. In this method, individual buds or eyes are separated from the sugarcane stalk and planted in the field. The technique helps save seed material and can lead to better crop establishment, growth, quality and spread.

Higher Production at Lower Cost, Bud Cutter Technique Helps Save Sugarcane Seed.

The bud method allows farmers to cultivate a larger area using a relatively smaller quantity of sugarcane seed material. According to the information provided, around 2,500 buds are considered sufficient for one bigha of land, with the total sowing cost estimated at approximately ₹10,000 to ₹15,000 for that area. Nursery and tray-based techniques can further help save time during crop preparation. One of the key practical advantages of the bud method is that farmers can prepare seedlings in advance even when weather or field conditions are unfavorable. If the field is waterlogged or facing drought conditions, buds can be planted in trays beforehand and the prepared seedlings can later be transplanted when conditions become suitable.

Bud Method Gives Farmers an Additional 15 Days to One Month for Crop Preparation.

After 15 days to one month of germination and initial plant growth in trays, the seedlings can be directly transplanted as soon as the field is ready. This technique enables better utilization of each sugarcane node and bud, helping reduce wastage of planting material. As a result, almost every usable part of the sugarcane stalk can be put to productive use.

Focus on Promoting Organic Farming, Research Centres to Provide Technical Support to Farmers.

Sugarcane supervisor Bholanath Tiwari said that efforts are being focused on reducing the use of chemical fertilizers and pesticides and encouraging farmers to adopt organic alternatives developed through scientific research. Regarding improved varieties of sugarcane seed, he advised farmers engaged in large-scale cultivation to directly contact government research centres and the agriculture department. These institutions are working to provide farmers with quality and authentic planting material.

He further explained that combining the trench method, bud cutter technique, tray nursery and organic fertilizers in sugarcane cultivation can help farmers save both time and cultivation costs. By adopting these modern and scientific practices, farmers can manage their crops more efficiently and work toward improving productivity and income.

संस्कृत

इक्षुकृषिः कृषकाणां कृते निरन्तरं लाभप्रदा विकल्परूपेण विकसितं भवति। उत्तमलाभस्य सम्भावनां दृष्ट्वा कृषकाः बृहद्प्रमाणेन इक्षोः उत्पादनं कुर्वन्ति। वैज्ञानिककृषिपद्धतीनां आधुनिकप्रविधीनां च प्रयोगेन कृषकाः कृषिव्ययं न्यूनीकर्तुं शक्नुवन्ति तथा च उत्पादनं लाभं च वर्धयितुं शक्नुवन्ति। आगच्छन्तु, जानीमः यत् आधुनिकविधीनां कृषियन्त्राणां च प्रयोगेन इक्षुकृषिः कथं अधिकलाभप्रदा भवितुं शक्नोति।

कृषिक्षेत्रे तीव्रतया जायमानानां प्राविधिकपरिवर्तनानां मध्ये इक्षुकृषकैः पारम्परिकपद्धतीनां स्थाने आधुनिकप्रविधीनां प्रयोगः महत्त्वपूर्णः अभवत्। इक्षुपर्यवेक्षकः भोलानाथः तिवारी विशेषवार्तालापे अवदत् यत् वैज्ञानिकपद्धतीनां, उन्नतकृषिप्रविधीनां आधुनिककृषियन्त्राणां च प्रयोगेन कृषकाः कृषिव्ययं नियन्त्रयितुं शक्नुवन्ति। तेन सह इक्षोः उत्पादनं वर्धयित्वा स्वकीयम् आयं च वर्धयितुं शक्नुवन्ति।

पारम्परिके इक्षुकृषिप्रकारे कृषकाः प्रायः सम्पूर्णम् इक्षुदण्डं वा तस्य बृहद्-खण्डान् बीजरूपेण क्षेत्रे रोपयन्ति स्म। अनेन बीजसामग्री अधिकं व्ययितं भवति तथा अङ्कुरणमपि न्यूनं भवति। इक्षुपर्यवेक्षकस्य भोलानाथस्य तिवारी-महोदयस्य अनुसारं कृषकैः अस्य समस्यायाः निवारणाय बड्-कटर्-प्रविधिः स्वीकरणीया। अस्यां विधौ इक्षुदण्डात् एकैकं नेत्रं अर्थात् बड् पृथक् कृत्वा क्षेत्रे रोप्यते। अनेन बीजसामग्रीरक्षणं भवति तथा च पादपानां सम्यक् स्थापनं, वृद्धिः, गुणवत्ता प्रसारश्च उत्तमः भवितुं शक्नोति।

न्यूनव्ययेन अधिकोत्पादनम्, इक्षुकृषौ बड्-कटर्-प्रविध्या बीजस्य संरक्षणम्.

बड्-विधिना इक्षोः वपनं कृत्वा न्यूनमात्रया बीजेन अधिके क्षेत्रे कृषिः कर्तुं शक्यते। प्राप्तविवरणानुसारम् एकस्मिन् बीघाक्षेत्रे प्रायः २५०० बड् पर्याप्ताः भवन्ति। अस्मिन् क्षेत्रे वपनस्य सम्पूर्णः व्ययः प्रायः दशसहस्रात् पञ्चदशसहस्ररूप्यकाणि यावत् भवितुं शक्नोति। नर्सरी-ट्रे-प्रविध्योः प्रयोगेन समयस्य अपि संरक्षणं भवति। अस्याः विधेः प्रमुखः व्यावहारिकः लाभः अस्ति यत् प्रतिकूले मौसमे क्षेत्रस्थितौ वा कृषकाः पूर्वमेव पौधानि सज्जीकर्तुं शक्नुवन्ति। क्षेत्रे जलपूरणं भवेत् अथवा अनावृष्टिः भवेत्, तर्हि कृषकाः पूर्वमेव ट्रे-पात्रेषु बड् रोपयित्वा पौधानि सज्जीकर्तुं शक्नुवन्ति। अनुकूलसमये तानि पौधानि क्षेत्रे रोपयितुं शक्यन्ते।

बड्-विधिना कृषकेभ्यः पञ्चदशदिनतः एकमासपर्यन्तं अतिरिक्तः समयः प्राप्यते.

ट्रे-पात्रेषु पञ्चदशदिनतः एकमासपर्यन्तं बड्-अङ्कुरणं पौधवृद्धिश्च भवति। ततः क्षेत्रे सज्जे सति तानि पौधानि प्रत्यक्षं क्षेत्रे रोपयितुं शक्यन्ते। अनेन इक्षोः प्रत्येकस्य ग्रन्थेः तथा बड्-भागस्य अधिकतमः उपयोगः भवति। रोपणसामग्र्याः अपव्ययः न्यूनीभवति तथा इक्षोः उपयोग्यः कश्चिदपि भागः व्यर्थं न गच्छति।

जैविककृषेः प्रोत्साहनाय बलम्, अनुसंधानकेन्द्रैः कृषकेभ्यः प्राविधिकसहयोगः प्रदास्यते.

इक्षुपर्यवेक्षकः भोलानाथः तिवारी अवदत् यत् इक्षुकृषौ रासायनिकानां उर्वरकाणां औषधानां च प्रयोगं न्यूनीकर्तुं वैज्ञानिकैः विकसितानां जैविकविकल्पानां प्रयोगाय च बलं दीयते। उन्नतकिस्मस्य बीजस्य विषये सः बृहद्प्रमाणेन कृषिं कुर्वतः कृषकान् परामर्शं दत्तवान् यत् ते प्रत्यक्षं शासकीय-अनुसन्धानकेन्द्रैः कृषिविभागेन च सह सम्पर्कं कुर्वन्तु। कृषिविभागः अनुसन्धानकेन्द्राणि च कृषकेभ्यः गुणवत्तापूर्णं प्रमाणितं च बीजं प्रदातुं निरन्तरं सहयोगं कुर्वन्ति।

सः अपि अवदत् यत् इक्षुकृषौ ट्रेञ्च्-विधेः, बड्-कटर्-प्रविधेः, ट्रे-नर्सरी-विधेः जैविक-उर्वरकस्य च समन्वितः प्रयोगः कृषकाणां समयं व्ययं च न्यूनीकर्तुं सहायकरः भवितुं शक्नोति। एतासां आधुनिकवैज्ञानिकपद्धतीनां प्रयोगेन कृषकाः कृषिकार्यं अधिकं सुव्यवस्थितं कृत्वा उत्पादनस्य आयस्य च वृद्धिं साधयितुं शक्नुवन्ति।

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