पेंशन प्रकरण में रुपये मांगने की शिकायत पर हुई थी कार्रवाई, बिना पक्ष सुने कर्मचारी को हटाने पर कोर्ट ने जताई नाराजगी.Action Taken Over Alleged Bribe Demand in Pension Case; Court Objects to Employee’s Removal Without Hearing. निवृत्तिवेतनप्रकरणे धनयाचनस्य आरोपेण कार्यवाही, पक्षप्रस्तुतीकरणस्य अवसरं विना कर्मचारिणः निष्कासने न्यायालयस्य आपत्तिः

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कोरबा निवासी सीताराम पटेल को पेंशन प्रकरण में रुपये मांगने के आरोप के चलते सेवा से हटाए जाने के मामले में हाई कोर्ट से राहत मिली है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी को उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों और जांच समिति की दोष सिद्ध करने वाली रिपोर्ट के आधार पर सेवा से हटाया जाता है, तो उससे पहले विधिवत विभागीय जांच करना और कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना अनिवार्य है। निर्धारित प्रक्रिया और सुनवाई का अवसर दिए बिना कर्मचारी की सेवा समाप्त करना उचित नहीं है।

पेंशन प्रकरण में रुपये मांगने की शिकायत से मचा विवाद.

कोरबा के काशीनगर निवासी सीताराम पटेल जीवनदीप समिति के तहत कार्यरत थे। उनके खिलाफ सेवानिवृत्त महिला पर्यवेक्षक सुनीता लाल के पेंशन संबंधी दस्तावेज तैयार करने के बदले रुपये मांगने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई गई थी। हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि शिकायतकर्ता ने स्वयं ही रुपये मांगने के आरोप से इनकार किया था।

आरोपों को सही मानकर कर्मचारी पर की गई दंडात्मक कार्रवाई

सीताराम पटेल के अधिवक्ता ने अदालत में तर्क दिया कि उनकी सेवा समाप्ति का आदेश महज सामान्य प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि आरोपों को प्रमाणित मानते हुए की गई दंडात्मक कार्रवाई है। ऐसे में नियमानुसार विभागीय जांच कराना और कर्मचारी को अपना पक्ष रखने के लिए सुनवाई का उचित अवसर देना आवश्यक था। दूसरी ओर, शासन की ओर से दलील दी गई कि जांच समिति ने आरोपों को सही पाया था और सेवा समाप्ति का आदेश सामान्य प्रकृति का था।

आरोपों पर दंडात्मक कार्रवाई से पहले विभागीय जांच अनिवार्य.

हाई कोर्ट ने मामले से जुड़े आदेश और उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद पाया कि सीताराम पटेल की सेवा समाप्ति का निर्णय शिकायत और जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया था। ऐसे में इसे सामान्य सेवा समाप्ति की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने स्वाति प्रियदर्शिनी बनाम मध्यप्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले और छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि संविदा पर कार्यरत कर्मचारी के विरुद्ध भी यदि आरोपों के आधार पर दंडात्मक कार्रवाई की जाती है, तो उससे पहले नियमानुसार जांच करना और उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना अनिवार्य है।

हाई कोर्ट ने नियमानुसार विभागीय जांच कर कार्रवाई करने की दी छूट.

हाई कोर्ट ने सीताराम पटेल की सेवा समाप्ति के आदेश को निरस्त करते हुए उनकी याचिका स्वीकार कर ली है। हालांकि, न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों को कानून के प्रावधानों के तहत विधिवत विभागीय जांच करने और उसके आधार पर आगे की कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी है। वहीं, सेवा समाप्ति का आदेश रद्द होने के परिणामस्वरूप सीताराम को मिलने वाले लाभ नियमानुसार प्रदान किए जाएंगे।

English

Sitaram Patel, a resident of Korba, has received relief from the High Court in a case involving his removal from service over allegations of demanding money in connection with a pension matter. The court observed that when an employee’s removal is based on allegations against him and a committee report holding him guilty, a proper departmental inquiry must be conducted and the employee must be given a fair opportunity to present his defence. The court emphasized that an employee’s service cannot be terminated without following due procedure and providing an opportunity to be heard.

Complaint Alleging Money Demand in Pension Case.

Sitaram Patel, a resident of Kashinagar in Korba, was employed under the Jeevandeep Samiti. A complaint was filed against him alleging that he had demanded money in exchange for preparing pension-related documents for retired female supervisor Sunita Lal. However, the petitioner’s counsel argued before the court that the complainant herself had denied the allegation of a demand for money.

Disciplinary Action Taken by Treating the Allegations as Proven.

Sitaram Patel’s counsel argued before the court that the order terminating his service was not merely a routine administrative decision but a punitive measure based on the allegations being treated as proven. Therefore, a proper departmental inquiry and a reasonable opportunity for the employee to present his defence were necessary. On the other hand, the government submitted that the inquiry committee had found the allegations to be substantiated and maintained that the termination order was routine in nature.

Departmental Inquiry Mandatory Before Disciplinary Action Based on Allegations.

After examining the order and the available documents, the High Court found that Sitaram Patel’s termination was based on the complaint and the inquiry committee’s report. Therefore, the action could not be treated as a routine termination of service. Referring to the Supreme Court’s ruling in Swati Priyadarshini v. State of Madhya Pradesh and an earlier judgment of the Chhattisgarh High Court, the court observed that even in the case of a contractual employee, a formal inquiry must be conducted and a reasonable opportunity to be heard must be provided before passing a punitive order based on allegations.

High Court Allows Action After a Proper Departmental Inquiry.

The High Court allowed Sitaram Patel’s petition and quashed the order terminating his service. However, the court granted the concerned authorities the liberty to conduct a proper departmental inquiry in accordance with the law and take further action based on its findings. The consequential benefits arising from the quashing of the termination order will be extended to Sitaram as per the applicable rules.

संस्कृत

निवृत्तिवेतनसम्बद्धे प्रकरणे धनयाचनस्य आरोपेण सेवातः निष्कासितः कोरबानिवासी सीतारामपटेलः उच्चन्यायालयात् राहतिं प्राप्तवान्। न्यायालयेन स्पष्टं कृतं यत् यदि कस्यचित् कर्मचारिणः निष्कासनम् तस्य विरुद्धम् आरोपानाम् आधारेण तथा दोषसिद्धिं सूचयन्त्याः अन्वेषणसमित्याः प्रतिवेदनस्य आधारेण क्रियते, तर्हि ततः पूर्वं विधिवत् विभागीयान्वेषणं करणीयम्। कर्मचारिणे स्वपक्षं प्रस्तुतुं समुचितः अवसरः अपि दातव्यः। एतयोः प्रक्रिययोः पालनं विना कर्मचारिणः सेवासमाप्तिः न करणीया इति न्यायालयेन प्रतिपादितम्।

निवृत्तिवेतनप्रकरणे धनयाचनस्य अभियोगः

कोरबानगरस्य काशीनगरनिवासी सीतारामपटेलः जीवनदीपसमितेः अन्तर्गतं कार्यरतः आसीत्। सेवानिवृत्तायाः महिला-पर्यवेक्षिकायाः सुनीतालालस्याः निवृत्तिवेतनसम्बद्धानि दस्तावेजानि सज्जीकर्तुं धनयाचनस्य आरोपं कृत्वा तस्य विरुद्धं शिकायत् कृता आसीत्। किन्तु याचिकाकर्तुः पक्षतः न्यायालये कथितं यत् शिकायतकर्त्री स्वयमेव धनयाचनसम्बद्धम् आरोपं निराकृतवती आसीत्।

आरोपान् सिद्धान् मत्वा कर्मचारिणः विरुद्धं दण्डात्मककार्यवाही.

सीतारामपटेलस्य अधिवक्त्रा न्यायालये तर्कः प्रस्तुतः यत् तस्य सेवासमाप्तेः आदेशः केवलं सामान्यः प्रशासनिकनिर्णयः नासीत्, अपितु आरोपान् सिद्धान् मत्वा कृता दण्डात्मककार्यवाही आसीत्। अतः नियमानुसारं विभागीयान्वेषणं करणीयम् आसीत् तथा च कर्मचारिणे स्वपक्षं प्रस्तुतुं समुचितः श्रवणावसरः दातव्यः आसीत्। अपरपक्षे, शासनपक्षतः कथितं यत् अन्वेषणसमित्या आरोपाः सत्याः इति निर्धारिताः आसन् तथा सेवासमाप्तेः आदेशः सामान्यप्रकृतेः आसीत्।

आरोपाधारितदण्डात्मककार्यवाहीपूर्वं विभागीयान्वेषणम् अनिवार्यम्

उच्चन्यायालयेन आदेशस्य उपलब्धदस्तावेजानां च परीक्षणानन्तरं ज्ञातं यत् सीतारामपटेलस्य सेवासमाप्तेः निर्णयः शिकायतायाः अन्वेषणसमित्याः प्रतिवेदनस्य च आधारेण कृतः आसीत्। अतः एतत् सामान्यसेवासमाप्तिरूपेण न परिगणयितुं शक्यते। न्यायालयेन स्वाति प्रियदर्शिनी विरुद्ध मध्यप्रदेशराज्यम् इति प्रकरणे सर्वोच्चन्यायालयस्य निर्णयस्य तथा छत्तीसगढस्य उच्चन्यायालयस्य पूर्वनिर्णयस्य उल्लेखं कृत्वा स्पष्टं कृतं यत् संविदाधारितकर्मचारिणः विरुद्धम् अपि आरोपाधारितः दण्डात्मकादेशः पारयितुं पूर्वं विधिवत् अन्वेषणं करणीयम् तथा च तस्मै स्वपक्षं प्रस्तुतुं समुचितः श्रवणावसरः दातव्यः।

विधिवत् विभागीयान्वेषणं कृत्वा कार्यवाहीकर्तुं उच्चन्यायालयेन अनुमतिः प्रदत्ता.

उच्चन्यायालयेन सीतारामपटेलस्य सेवासमाप्तेः आदेशः निरस्तीकृत्य तस्य याचिका स्वीकृता। तथापि न्यायालयेन सम्बन्धिताधिकारिभ्यः विधेः प्रावधानानुसारं विधिवत् विभागीयान्वेषणं कृत्वा तदाधारेण अग्रे कार्यवाही कर्तुं स्वातन्त्र्यं प्रदत्तम्। सेवासमाप्तेः आदेशस्य निरस्तीकरणेन सीतारामपटेलाय प्राप्तव्याः आनुषङ्गिकलाभाः नियमानुसारं प्रदास्यन्ते।

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