शरिया कोर्ट को तलाक का अधिकार नहीं, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला। Sharia Court Cannot Grant Divorce, Chhattisgarh High Court Issues Key Ruling. शरियत् न्यायालयस्य तलाक्-निर्णयाधिकारः नास्ति, छत्तीसगढ़ उच्चन्यायालयस्य महत्त्वपूर्णः निर्णयः।

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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अहम फैसला देते हुए कहा कि कोई भी निजी धार्मिक संस्था या शरिया कोर्ट न्यायालय की तरह कार्य करते हुए तलाक का कानूनी निर्णय नहीं दे सकता। कोर्ट ने इदारा-ए-शरिया, रायपुर के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें एक महिला को तलाकशुदा घोषित किया गया था। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी निजी धार्मिक संस्थाओं द्वारा दिए गए फैसलों को न्यायालय के आदेश का दर्जा नहीं दिया जा सकता और वे कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते।

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मुस्लिम महिला के वैवाहिक अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि कोई भी निजी धार्मिक संस्था या खुद को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन कानून के तहत स्थापित न्यायालय का अधिकार हासिल नहीं कर सकता। ऐसी संस्थाओं को किसी महिला के वैवाहिक दर्जे पर न्यायिक फैसला देने या विवाह विच्छेद की कानूनी घोषणा करने का अधिकार नहीं है। हाई कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक स्थिति से जुड़े कानूनी निर्धारण का अधिकार केवल विधि द्वारा मान्यता प्राप्त न्यायिक संस्थाओं को है।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने रायपुर के इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट की ओर से 18 जनवरी 2022 को जारी तलाक संबंधी आदेश को कानूनी प्रभाव से रहित करार दिया है। इस आदेश में याचिकाकर्ता महिला को उसके पति से तलाकशुदा घोषित किया गया था। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि इदारा-ए-शरिया का आदेश किसी वैधानिक न्यायिक प्रक्रिया के तहत जारी नहीं हुआ है। इसलिए इसके आधार पर न तो विवाह कानूनी रूप से समाप्त माना जा सकता है और न ही किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार, वैवाहिक स्थिति या दायित्व में कोई परिवर्तन किया जा सकता है।

टिकरापारा निवासी 38 वर्षीय निरोश अब्बासी का वर्ष 2015 में पहले पति का निधन हो गया था। इसके बाद 18 जुलाई 2020 को उन्होंने मोहम्मद आबिद खान से विवाह किया। विवाह के बाद बच्चों के नए परिवार में समायोजन को लेकर दोनों के बीच विवाद की स्थिति बनी। याचिकाकर्ता के मुताबिक, इसी विवाद के बाद उन्हें तलाक देने की प्रक्रिया शुरू की गई।पति का दावा है कि उन्होंने तलाक-ए-हसन की घोषणा तीन अलग-अलग चरणों में संचार के माध्यम से की थी। उनके अनुसार, पहली घोषणा 31 अगस्त 2021, दूसरी 30 सितंबर 2021 और तीसरी 30 अक्टूबर 2021 को की गई थी। यही तलाक संबंधी प्रक्रिया बाद में न्यायिक विवाद का आधार बनी।

उत्पीड़न के आरोप में एफआईआर दर्ज।

याचिकाकर्ता महिला ने अपने पति और ससुराल पक्ष के लोगों पर उत्पीड़न, क्रूरता और दुर्व्यवहार के आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। मामले को सुलझाने के लिए वन स्टाप सखी सेंटर में काउंसिलिंग भी कराई गई, लेकिन दंपती के बीच विवाद का समाधान नहीं हो सका। इसके बाद महिला ने 7 अक्टूबर 2021 को पुलिस अधीक्षक के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की। शिकायत के आधार पर महिला थाना रायपुर में 1 नवंबर 2021 को एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए और 34 के तहत मामला कायम कर जांच शुरू की।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बनाया गया कानूनी आधार।

हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विश्व लोचन मदन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि दारुल कजा या फतवा जारी करने वाली निजी संस्थाओं को कानून के तहत स्थापित न्यायालय का दर्जा हासिल नहीं है। ऐसे संस्थानों द्वारा दिए गए निर्णय कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते और न ही उन्हें न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से लागू कराया जा सकता है।इसी कानूनी सिद्धांत को आधार बनाते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि इदारा-ए-शरिया किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति का न्यायिक निर्धारण नहीं कर सकता। धार्मिक संस्था अपने मत या धार्मिक राय व्यक्त कर सकती है, लेकिन ऐसी राय से किसी व्यक्ति के वैधानिक अधिकारों या कानूनी स्थिति में बदलाव नहीं किया जा सकता।

तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता पर हाई कोर्ट ने रखी स्थिति।

हाई कोर्ट ने तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता से जुड़े सवाल पर कोई अंतिम निर्णय देने से परहेज किया। कोर्ट ने साफ किया कि उसके आदेश का दर्ज एफआईआर या पक्षकारों के पास उपलब्ध अन्य कानूनी उपायों पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। आपराधिक प्रकरणों और अन्य वैधानिक अधिकारों का फैसला संबंधित सक्षम प्राधिकारी कानून के प्रावधानों के अनुसार करेंगे।मामले में हाई कोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट द्वारा 18 जनवरी 2022 को जारी आदेश को कानूनी अधिकार से रहित घोषित कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उक्त आदेश के आधार पर पक्षकारों की वैधानिक स्थिति या अधिकारों में कोई बदलाव नहीं माना जा सकता।

(English)

The Chhattisgarh High Court has delivered a significant ruling, holding that no private religious organization or Sharia court can function as a judicial authority and issue a legally valid divorce decision. The court quashed an order passed by Idara-e-Sharia, Raipur, which had declared a woman divorced. The High Court clarified that decisions issued by such private religious bodies cannot be treated as court orders and have no legally binding effect.

Bilaspur: The Chhattisgarh High Court, while hearing an important case concerning the matrimonial rights of a Muslim woman, clarified that no private religious institution or organization claiming to be a Sharia court can enjoy the status of a court established by law. Such bodies cannot legally determine a woman’s matrimonial status or issue a judicial declaration dissolving a marriage. The High Court emphasized that legal determinations concerning marital status can only be made by judicial authorities recognized under law.

The Chhattisgarh High Court has held that the divorce order issued by the Idara-e-Sharia Islamic Court in Raipur on January 18, 2022, has no legal effect. The order had declared the petitioner woman divorced from her husband. Justice Amitendra Kishore Prasad, while delivering the judgment, observed that the order was not issued under any statutory judicial framework. Therefore, it cannot legally dissolve a marriage or alter the legal rights, status, or obligations of either party.

Nirosh Abbasi, a 38-year-old resident of Tikrapara, lost her first husband in 2015. She subsequently married Mohammad Abid Khan on July 18, 2020. After the marriage, differences reportedly arose between the couple over the adjustment of the children within the new family. According to the petitioner, the dispute was followed by the initiation of proceedings to divorce her.The husband claimed that he had pronounced Talaq-e-Hasan in three separate stages through communication. According to his statement, the declarations were made on August 31, September 30, and October 30, 2021. The divorce-related process later became the basis of the legal dispute.

FIR Registered Over Harassment Complaint.

The petitioner woman had complained against her husband and in-laws, alleging harassment, cruelty and ill-treatment. Counselling was also conducted at the One Stop Sakhi Centre in an attempt to resolve the dispute, but the matter remained unresolved. Subsequently, she submitted a complaint before the Superintendent of Police on October 7, 2021. Based on the complaint, Raipur Women’s Police Station registered an FIR on November 1, 2021, under Sections 498-A and 34 of the Indian Penal Code and initiated an investigation.

Supreme Court Ruling Became the Legal Basis.

The High Court, referring to the Supreme Court’s judgment in Vishwa Lochan Madan v. Union of India, observed that Darul Qaza and private bodies issuing fatwas do not have the status of courts established under law. Their decisions are not legally binding and cannot be enforced through judicial process.Applying the same legal principle, the High Court held that Idara-e-Sharia cannot judicially determine the matrimonial status of an individual. While a religious body may express its religious opinion, such an opinion cannot be binding on a person’s statutory rights or legal status.

High Court Comments on Constitutional Validity of Talaq-e-Hasan.

The High Court refrained from deciding the question of the constitutional validity of Talaq-e-Hasan. It clarified that its order would not adversely affect the FIR or any other legal remedies available to the parties. Criminal proceedings and other statutory rights will be determined by the competent authorities in accordance with law.The court partly allowed the petition and declared the order issued by the Idara-e-Sharia Islamic Court on January 18, 2022, to be without legal authority. It further clarified that the said order cannot bring about any change in the legal status or statutory rights of the parties.

(संस्कृत)

छत्तीसगढ़ उच्चन्यायालयेन महत्त्वपूर्णे निर्णयेन स्पष्टं कृतं यत् कापि निजी धार्मिकसंस्था अथवा शरियत्-न्यायालयः न्यायालयस्य इव कार्यं कृत्वा विधिसम्मतं तलाक्-निर्णयं दातुं न शक्नोति। न्यायालयेन रायपुरस्थितस्य इदारा-ए-शरियायाः सः आदेशः निरस्तः कृतः, यस्मिन् एका महिला तलाकशुदा इति घोषिताऽऽसीत्। उच्चन्यायालयेन स्पष्टं कृतं यत् एतादृशीनां निजी-धार्मिक-संस्थानां निर्णयाः न्यायालयीय-आदेशस्य स्थानं न प्राप्नुवन्ति तथा ते विधितः बाध्यकारी न भवन्ति।

बिलासपुरम्: छत्तीसगढ़ उच्चन्यायालयेन मुस्लिम-महिलायाः वैवाहिकाधिकारसम्बद्धे महत्त्वपूर्णे प्रकरणे स्पष्टं कृतं यत् कापि निजी-धार्मिक-संस्था अथवा स्वयम् शरियत्-न्यायालयम् इति कथयत् संगठनं विधिना स्थापितस्य न्यायालयस्य दर्जां प्राप्तुं न शक्नोति। एतादृशीनां संस्थानां महिलायाः वैवाहिकस्थितेः न्यायिकनिर्धारणं कर्तुं वा विवाहविच्छेदस्य वैधानिकघोषणां कर्तुं अधिकारः नास्ति। उच्चन्यायालयेन स्पष्टं कृतं यत् वैवाहिकस्थितिसम्बद्धं वैधानिकनिर्धारणं केवलं विधिना मान्यताप्राप्तैः न्यायिकसंस्थाभिः एव कर्तुं शक्यते।

छत्तीसगढ़ उच्चन्यायालयेन रायपुरस्थितेन इदारा-ए-शरियाया इस्लामी-न्यायालयेन 18 जनवरी 2022 दिनाङ्के प्रदत्तः तलाक्-सम्बद्धः आदेशः वैधानिकप्रभावरहितः इति घोषितः। तस्मिन् आदेशे याचिकाकर्त्री महिला स्वपत्युः तलाकप्राप्ता इति घोषिताऽऽसीत्। न्यायमूर्तिना अमितेन्द्र-किशोर-प्रसादेन निर्णयं प्रददता उक्तं यत् इदारा-ए-शरियायाः आदेशः कस्यापि वैधानिक-न्यायिक-व्यवस्थायाः अन्तर्गतं न निर्गतः। अतः तेन न विवाहस्य वैधानिकविच्छेदः भवितुं शक्नोति, न च कस्यचित् पक्षस्य वैधानिकाधिकारः, वैवाहिकस्थितिः अथवा दायित्वं परिवर्तयितुं शक्यते।

टिकरापारा-निवासिनी अष्टत्रिंशत्-वर्षीया निरोश अब्बासी इत्यस्याः प्रथम-पत्युः मृत्युः 2015 तमे वर्षे अभवत्। ततः 18 जुलाई 2020 दिनाङ्के तस्याः विवाहः मोहम्मद आबिद खान इत्यनेन सह अभवत्। विवाहानन्तरं बालकानां नवपरिवारे समायोजनविषये दम्पत्योः मध्ये मतभेदः उत्पन्नः। याचिकाकर्त्र्याः कथनानुसारं तस्मिन् विवादे सति तस्यै तलाक्-प्रदानस्य प्रक्रिया प्रारब्धा।पतिना दावितं यत् तेन तलाक्-ए-हसन इति तलाक्-घोषणा त्रिषु पृथक् चरणेषु सञ्चारमाध्यमेन कृता। तस्य कथनानुसारं प्रथमघोषणा 31 अगस्त 2021, द्वितीयघोषणा 30 सितम्बर 2021 तथा तृतीयघोषणा 30 अक्टूबर 2021 दिनाङ्के अभवत्। अनन्तरं एषा तलाक्-सम्बद्धा प्रक्रिया न्यायिकविवादस्य कारणम् अभवत्।

उत्पीडनस्य अभियोगे प्राथमिकी पञ्जीकृता।

याचिकाकर्त्री महिलया स्वपत्युः ससुरालपक्षीयानां च विरुद्धं उत्पीडनस्य, क्रूरतायाः दुर्व्यवहारस्य च आरोपैः शिकायत् कृता। विवादस्य समाधानाय वन-स्टॉप-सखी-केन्द्रे परामर्शः अपि आयोजितः, किन्तु दम्पत्योः विवादस्य समाधानं न अभवत्। ततः 7 अक्टूबर 2021 दिनाङ्के तया पुलिस-अधीक्षकस्य समक्षं शिकायत् प्रस्तुताऽभवत्। तस्याः शिकायतायाः आधारेण रायपुर-महिला-पुलिस-स्थाने 1 नवम्बर 2021 दिनाङ्के प्राथमिकी पञ्जीकृता। भारतीय-दण्ड-संहितायाः 498-ए तथा 34 धाराणाम् अन्तर्गतं प्रकरणं पञ्जीकृत्य अन्वेषणं प्रारब्धम्।

सर्वोच्चन्यायालयस्य निर्णयः विधिकाधारः अभवत्।

उच्चन्यायालयेन सर्वोच्चन्यायालयस्य विश्व लोचन मदन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया इति प्रकरणस्य निर्णयस्य उल्लेखं कृत्वा उक्तं यत् दारुल-क़ज़ा अथवा फतवा-प्रदायकाः निजी-संस्थाः विधिना स्थापितस्य न्यायालयस्य दर्जां न प्राप्नुवन्ति। एतादृश-संस्थानां निर्णयाः वैधानिकरूपेण बाध्यकराः न भवन्ति तथा न्यायिक-प्रक्रियया तेषां क्रियान्वयनं कर्तुं न शक्यते।अस्यैव विधिक-सिद्धान्तस्य आधारेण उच्चन्यायालयेन उक्तं यत् इदारा-ए-शरिया कस्यचित् व्यक्तेः वैवाहिकस्थितेः न्यायिकनिर्धारणं कर्तुं न शक्नोति। धार्मिकसंस्था स्वकीयां धार्मिकां रायं प्रकटयितुं शक्नोति, किन्तु तस्याः रायाः कारणेन कस्यचित् व्यक्तेः वैधानिकाधिकारः अथवा कानूनी-स्थितिः बाधितुं वा परिवर्तयितुं वा न शक्यते।

तलाक्-ए-हसनस्य संवैधानिकवैधतायां उच्चन्यायालयस्य टिप्पणी।

उच्चन्यायालयेन तलाक्-ए-हसनस्य संवैधानिकवैधतासम्बद्धे प्रश्नेषु अन्तिमनिर्णयः दातुं विरामः कृतः। न्यायालयेन स्पष्टं कृतं यत् तस्य आदेशस्य प्रभावः प्राथमिकीं प्रति अथवा पक्षकाराणां अन्येषु वैधानिक-उपायेषु प्रतिकूलः न भविष्यति। आपराधिक-प्रकरणानां तथा अन्येषां वैधानिकाधिकाराणां निर्धारणं सम्बन्धितैः सक्षम-प्राधिकरणैः विध्यनुसारं करिष्यते।न्यायालयेन याचिका आंशिकरूपेण स्वीकृत्य इदारा-ए-शरिया-इस्लामी-न्यायालयेन 18 जनवरी 2022 दिनाङ्के प्रदत्तः आदेशः वैधानिकाधिकाररहितः इति घोषितः। न्यायालयेन पुनः स्पष्टं कृतं यत् तस्मिन् आदेशे आधारेण पक्षकाराणां वैधानिकस्थितौ अथवा अधिकारयोः परिवर्तनं न भवितुं शक्नोति।

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