बस्तर दशहरा: दंतेश्वरी माई की डोली जगदलपुर के लिए रवाना.Bastar Dussehra: Danteshwari Mai’s Palanquin Departs for Jagdalpur. बस्तर-दशहरा: दन्तेश्वरीमातुः दोलायात्रा जगदलपुरं प्रति प्रस्थिता

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बस्तर दशहरा के तहत मां दंतेश्वरी की पावन डोली जगदलपुर के लिए रवाना हो गई है। इसी बीच, जगदलपुर में फूल रथ का पहिया टूटने और रथ खींचने के लिए जेसीबी के इस्तेमाल को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी फैल गई। ग्रामीणों के आक्रोश के चलते क्षेत्र में तनावपूर्ण स्थिति बन गई।

प्रसिद्ध बस्तर दशहरा महोत्सव के दौरान रविवार को जहां श्रद्धालुओं में धार्मिक उत्साह और आस्था का माहौल रहा, वहीं प्रशासनिक अव्यवस्थाओं के चलते तनाव भी देखने को मिला। जगदलपुर में परंपरागत फूल रथ परिक्रमा के दौरान अचानक रथ का पहिया और मुख्य लकड़ी टूट गई। रथ को दुरुस्त करने के कई प्रयास किए गए, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके बाद प्रशासन ने जेसीबी मशीन की सहायता से रथ को आगे बढ़ाने का प्रयास किया, जिससे मौके पर मौजूद ग्रामीण नाराज हो गए और उन्होंने विरोध जताया।

सीरहासार चौक पर इस घटना को लेकर ग्रामीणों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच तीखी बहस छिड़ गई। मौके पर बढ़ती गहमागहमी के बीच भीड़ के बीच ट्रैफिक डीएसपी अचानक गिर पड़े। इसके बाद हालात पर काबू पाने और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा।

वहीं, करीब 600 वर्षों से चली आ रही ऐतिहासिक परंपरा के तहत रविवार को महाष्टमी के अवसर पर मां दंतेश्वरी की पावन डोली और छत्र को दंतेवाड़ा मंदिर से जगदलपुर के लिए रवाना किया गया। इस दौरान जिया परिवार के सदस्यों और पुजारियों ने पूरी श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ अपने कंधों पर डोली उठाई। धार्मिक विधि-विधान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच यह यात्रा बस्तर दशहरा महोत्सव की आस्था और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है।

बस्तर दशहरा महोत्सव.

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में मनाया जाने वाला विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और अनूठी परंपराओं के लिए जाना जाता है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह लोक महोत्सव देश के सबसे लंबे पर्वों में शामिल है। देश के अन्य हिस्सों में मनाए जाने वाले विजयादशमी उत्सव से इसकी परंपराएं बिल्कुल अलग हैं। बस्तर दशहरा में न तो भगवान श्रीराम की कथा पर आधारित आयोजन होते हैं और न ही रावण के पुतले का दहन किया जाता है। यह उत्सव मुख्य रूप से स्थानीय देवी-देवताओं, आदिवासी आस्था और सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं को समर्पित है।

बस्तर दशहरा का संपूर्ण आयोजन आराध्य देवी मां दंतेश्वरी और स्थानीय जनजातीय देवी-देवताओं की आराधना को समर्पित है। इस महोत्सव में शक्ति उपासना के साथ प्रकृति और संस्कृति के अनूठे संगम की झलक देखने को मिलती है। यह पर्व बस्तर की समृद्ध आदिवासी परंपराओं, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक परंपरा की शुरुआत 15वीं शताब्दी में, लगभग 1408 ईस्वी में, काकतीय वंश के राजा पुरुषोत्तम देव के शासनकाल में मानी जाती है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, जगन्नाथ पुरी की तीर्थयात्रा से लौटने के बाद राजा पुरुषोत्तम देव को ‘रथपति’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था। इस परंपरा को बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

तीर्थयात्रा से लौटने के बाद राजा पुरुषोत्तम देव ने बस्तर में विशाल काष्ठ रथ की परिक्रमा और मां दंतेश्वरी की विधिवत पूजा-अर्चना की परंपरा प्रारंभ की। सदियों से चली आ रही यह धार्मिक परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है। छह सौ वर्षों से अधिक समय से निरंतर जारी यह परंपरा बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक पहचान और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन चुकी है।

बस्तर दशहरा की शुरुआत सावन महीने की हरियाली अमावस्या पर आयोजित ‘पाट जात्रा’ की रस्म से होती है। इस अवसर पर रथ निर्माण में इस्तेमाल होने वाली लकड़ी की विधिवत पूजा की जाती है। इसके बाद आश्विन शुक्ल पक्ष में काछनगादी, जोगी बिठाई, फूल रथ परिक्रमा, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी और मुरिया दरबार जैसी महत्वपूर्ण रस्में निभाई जाती हैं। इन सभी पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ यह अनूठा महोत्सव संपन्न होता है। प्रत्येक रस्म बस्तर की आदिवासी संस्कृति, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक परंपराओं को दर्शाती है।

बस्तर दशहरा के दौरान करीब 80 परगनों से बड़ी संख्या में ग्रामीण और जनजातीय प्रतिनिधि गहरी आस्था के साथ जगदलपुर पहुंचते हैं। इस महोत्सव में श्रद्धालु अपने कंधों और हाथों के सहारे विशालकाय रथ को खींचते हैं। यह परंपरा बस्तर की सामूहिक सहभागिता, जनजातीय एकजुटता और समृद्ध लोक-सांस्कृतिक विरासत की अनूठी मिसाल पेश करती है।

सांस्कृतिक अनुष्ठान.

बस्तर दशहरा महोत्सव का विधिवत शुभारंभ सावन महीने की हरियाली अमावस्या पर ‘पाट जात्रा’ की रस्म के साथ होता है। इस अनुष्ठान में रथ निर्माण के लिए जंगल से लाई गई पहली लकड़ी, जिसे ‘ठुरलू खोटला’ कहा जाता है, की पारंपरिक विधि-विधान से पूजा की जाती है।

इसके बाद महोत्सव की महत्वपूर्ण रस्म ‘काछनगादी’ निभाई जाती है। इस दौरान काछिन देवी से पर्व को बिना किसी बाधा के संपन्न कराने की अनुमति मांगी जाती है। परंपरा के अनुसार, अनुसूचित जाति की एक कुंवारी कन्या को देवी के स्वरूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। वह कांटों से बने झूले पर बैठकर राजा और जनसमुदाय को दशहरा महोत्सव आयोजित करने की अनुमति प्रदान करती है। यह अनुष्ठान बस्तर की प्राचीन धार्मिक मान्यताओं और विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराओं को दर्शाता है।

‘काछनगादी’ की रस्म में अनुमति मिलने के बाद बस्तर दशहरा महोत्सव में ‘जोगी बिठाई’ की परंपरा निभाई जाती है। इस अनुष्ठान के तहत हलबा समुदाय का एक व्यक्ति लगातार नौ दिनों तक अन्न-जल का त्याग कर योग मुद्रा में बैठता है और पूरे बस्तर अंचल की सुख-समृद्धि एवं खुशहाली के लिए प्रार्थना करता है।

इसी दौरान आठ दिनों तक जगदलपुर शहर में विशालकाय लकड़ी के रथ की ‘फूल रथ परिक्रमा’ निकाली जाती है। इस पारंपरिक आयोजन में ग्रामीण पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ रथ को अपने हाथों और कंधों से खींचते हैं। यह दृश्य बस्तर की सामूहिक आस्था और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।

वहीं, आश्विन शुक्ल नवमी के दिन ‘मावली परघाव’ की महत्वपूर्ण रस्म संपन्न होती है। इस अवसर पर दंतेवाड़ा से लाई जाने वाली मां दंतेश्वरी और मावली माता की पावन डोलियों का भव्य स्वागत किया जाता है। श्रद्धालु पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ दोनों देवियों का आदर-सत्कार करते हैं। यह रस्म बस्तर दशहरा की धार्मिक मान्यताओं और गौरवशाली परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बस्तर दशहरा के प्रमुख चरणों में ‘भीतर रैनी’ और ‘बाहर रैनी’ की अनूठी परंपराएं विशेष महत्व रखती हैं। दशहरे के मुख्य दिन की रात ‘भीतर रैनी’ के दौरान ग्रामीण विशालकाय रथ को उठाकर कुम्हाड़ाकोट के जंगलों में ले जाते हैं। इसके अगले दिन ‘बाहर रैनी’ की रस्म निभाई जाती है, जिसमें राजा और ग्रामीण मिलकर रथ की खोज करते हैं। इसके बाद नए अन्न का भोग अर्पित कर रथ को वापस लाया जाता है। ये परंपराएं बस्तर की विशिष्ट लोक-संस्कृति और सामूहिक सहभागिता का प्रतीक हैं।

महोत्सव के अंतिम चरण में ऐतिहासिक ‘मुरिया दरबार’ का आयोजन होता है। मां दंतेश्वरी की छत्रछाया में आयोजित इस दरबार में जनप्रतिनिधि, माझी-चालकी और प्रशासनिक अधिकारी एक साथ बैठते हैं। यहां क्षेत्र की जनसमस्याओं, विकास योजनाओं और भविष्य की व्यवस्थाओं पर चर्चा की जाती है। यह आयोजन स्थानीय समुदाय की भागीदारी और संवाद की परंपरा को दर्शाता है।

इसके बाद ‘कुटुंब जात्रा’ तथा देवी-देवताओं की विदाई से महोत्सव का समापन होता है। इस तरह करीब 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा अपनी धार्मिक आस्था, आदिवासी परंपराओं और सामाजिक एकता का संदेश देकर संपन्न होता है।

English

The sacred palanquin of Maa Danteshwari has departed for Jagdalpur as part of the Bastar Dussehra celebrations. Meanwhile, tensions escalated in Jagdalpur after a wheel of the Phool Rath broke and a JCB machine was used, triggering anger among villagers.

During the renowned Bastar Dussehra festival on Sunday, the atmosphere was filled with religious devotion and enthusiasm, but administrative mismanagement also led to tension. During the traditional Phool Rath procession in Jagdalpur, a wheel and the main wooden component of the chariot suddenly broke. Several attempts were made to repair it, but they proved unsuccessful. The administration then tried to move the chariot with the help of a JCB machine, triggering anger and protests among the villagers present at the site.

A heated argument broke out between villagers and administrative officials at Sirhasar Chowk over the incident. Amid the growing commotion, the Traffic Deputy Superintendent of Police (DSP) suddenly fell in the crowd. Following this, the police resorted to mild use of force to bring the situation under control and manage the gathering.

As part of a historic tradition spanning nearly 600 years, the sacred palanquin and ceremonial umbrella of Maa Danteshwari departed from the temple in Dantewada for Jagdalpur on Sunday, marking the occasion of Ashtami. Members of the Jiya family and priests carried the palanquin on their shoulders with deep devotion and reverence. The procession reflects the enduring faith and rich cultural heritage associated with the Bastar Dussehra festival.

Bastar Dussehra Festival.

The world-famous Bastar Dussehra, celebrated in the Bastar region of Chhattisgarh, is renowned for its unique cultural identity and distinctive traditions. Lasting nearly 75 days, it is among the longest folk festivals in the country. Unlike Vijayadashami celebrations held in other parts of India, Bastar Dussehra does not revolve around the story of Lord Rama, nor does it feature the burning of Ravana’s effigy. Instead, the festival is deeply rooted in the worship of local deities, tribal faith, and centuries-old cultural traditions.

The entire Bastar Dussehra festival is dedicated to the worship of the revered Goddess Maa Danteshwari and the local deities of indigenous tribal communities. Along with the worship of divine power, the festival reflects a unique blend of nature and culture. It plays a significant role in preserving Bastar’s rich tribal traditions, religious faith, and cultural heritage.

The historic tradition of Bastar Dussehra is believed to have originated in the 15th century, around 1408 AD, during the reign of King Purushottam Dev of the Kakatiya dynasty. According to popular beliefs, the king received the title of Rathpati after returning from a pilgrimage to Jagannath Puri. This tradition is regarded as an important part of Bastar’s cultural heritage and religious history.

After returning from his pilgrimage, King Purushottam Dev introduced the tradition of conducting a grand wooden chariot procession and worshipping Maa Danteshwari in Bastar. This centuries-old religious practice continues to be observed with devotion and enthusiasm even today. Having endured for more than 600 years, the tradition has become a symbol of Bastar Dussehra’s historical significance and rich cultural heritage.

Bastar Dussehra begins with the Paat Jatra ritual, held on Hariyali Amavasya during the month of Sawan. During this ceremony, the wood used to construct the ceremonial chariot is worshipped according to traditional customs. The festival then progresses through several important rituals during the Shukla Paksha of Ashwin, including Kachhan Gadi, Jogi Bithai, Phool Rath Parikrama, Mawli Parghav, Bhitar Raini, Bahar Raini, and Muria Darbar. The grand celebration concludes after these traditional ceremonies, each reflecting Bastar’s tribal culture, religious devotion, and centuries-old heritage.

During Bastar Dussehra, hundreds of villagers and tribal representatives from nearly 80 parganas gather in Jagdalpur with deep devotion. They collectively pull the massive ceremonial chariot using their shoulders and hands. This age-old tradition reflects Bastar’s unique community spirit, tribal unity, and rich folk-cultural heritage.

Cultural Rituals.

The Bastar Dussehra festival officially begins with the Paat Jatra ritual on Hariyali Amavasya during the month of Sawan. During this ceremony, the first piece of wood brought from the forest for constructing the ceremonial chariot, known as Thurlu Khotla, is worshipped according to traditional customs.

This is followed by the important Kachhan Gadi ritual, in which permission is sought from Goddess Kachhin for the festival to proceed without obstacles. According to tradition, an unmarried girl from a Scheduled Caste community is ceremonially revered as a manifestation of the goddess. She sits on a swing made of thorns and grants the king and the community permission to conduct the Dussehra celebrations. This distinctive ritual reflects Bastar’s ancient religious beliefs and unique cultural heritage.

Following the permission granted during the Kachhan Gadi ritual, the Jogi Bithai ceremony is observed as part of the Bastar Dussehra festival. In this tradition, a member of the Halba community sits in a yogic posture for nine consecutive days, abstaining from food and water, while praying for the prosperity, well-being, and happiness of the entire Bastar region.

Meanwhile, the massive wooden ceremonial chariot is taken around Jagdalpur city for eight days as part of the Phool Rath Parikrama. Villagers pull the chariot with deep devotion and enthusiasm, reflecting Bastar’s collective faith and centuries-old cultural heritage.

On Ashwin Shukla Navami, the significant Mawli Parghav ceremony is performed. On this occasion, the sacred palanquins of Maa Danteshwari and Mawli Mata, brought from Dantewada, receive a grand and reverential welcome. Devotees honour the goddesses through traditional rituals and ceremonies. This event holds a special place in the religious beliefs and glorious traditions of Bastar Dussehra.

The unique rituals of Bhitar Raini and Bahar Raini hold special significance during the concluding stages of Bastar Dussehra. On the night of Bhitar Raini, villagers carry the massive ceremonial chariot to the forests of Kumhadakot. The following day, during Bahar Raini, the king and the local community jointly search for the chariot and bring it back after offering the first harvest of the season to the deity. These traditions reflect Bastar’s distinctive folk culture and spirit of collective participation.

The historic Muria Darbar is organised during the final phase of the festival. Held under the spiritual protection of Maa Danteshwari, the gathering brings together public representatives, traditional leaders known as Majhi-Chalki, and administrative officials. They discuss local public concerns, development initiatives, and future administrative arrangements. The event highlights community participation and the tradition of collective dialogue.

The festival concludes with Kutumb Jatra and the ceremonial farewell of the deities. Thus, the nearly 75-day-long Bastar Dussehra comes to an end while conveying a message of religious devotion, tribal heritage, and social unity.

संस्कृति

बस्तर-दशहरामहोत्सवस्य अन्तर्गतं माता दन्तेश्वर्याः पवित्रा दोलायात्रा जगदलपुरं प्रति प्रस्थिता। एतस्मिन्नेव काले जगदलपुरे पुष्परथस्य चक्रभङ्गेन तथा च रथस्य संचालनाय जेसीबी-यन्त्रस्य उपयोगेन ग्रामवासिषु रोषः उत्पन्नः। ग्रामवासिनां विरोधकारणात् क्षेत्रे तनावपूर्णा स्थितिः अभवत्।

प्रसिद्धे बस्तर-दशहरा-महोत्सवे रविवासरे एकतः धार्मिकश्रद्धायाः उत्साहपूर्णं वातावरणम् आसीत्, अपरतः प्रशासनिकव्यवस्थायाः अव्यवस्थया तनावपूर्णा स्थितिः उत्पन्ना। जगदलपुरे परम्परानुसारं आयोजितायां पुष्परथपरिक्रमायां रथस्य चक्रं मुख्यं काष्ठभागं च अकस्मात् भग्नम् अभवत्। रथस्य मरम्मतये अनेकाः प्रयासाः कृताः, किन्तु ते सफलाः न अभवन्। ततः प्रशासनपक्षेण जेसीबी-यन्त्रस्य साहाय्येन रथं अग्रे नेतुं प्रयासः कृतः। एतेन तत्र उपस्थितेषु ग्रामवासिषु रोषः उत्पन्नः, ते च विरोधं प्रकटितवन्तः।

सीरहासार-चतुष्पथे अस्य घटनाक्रमस्य विषये ग्रामवासिनां प्रशासनिकाधिकारिणां च मध्ये तीव्रा वाग्वादः अभवत्। तस्मिन् कोलाहलपूर्णे वातावरणे जनसमूहमध्ये यातायात-उपपुलिसाधीक्षकः (डीएसपी) अकस्मात् अपतत्। ततः परिस्थितिं नियन्त्रयितुं जनसमूहं च शान्तं कर्तुं पुलिसकर्मिभिः मृदुबलस्य प्रयोगः कृतः।

प्रायः षड्भिः शतवर्षैः प्रचलिता ऐतिहासिकी परम्परा अनुसृत्य रविवासरे महाष्टम्याः पावनावसरे मातुः दन्तेश्वर्याः पवित्रा दोलिका छत्रं च दन्तेवाडास्थितात् मन्दिरात् जगदलपुरं प्रति प्रेषिते। अस्मिन् अवसरे जिया-परिवारस्य सदस्याः तथा पुरोहिताः परमश्रद्धया भक्तिभावेन च स्वस्कन्धेषु दोलिकाम् अवहन्। एषा धार्मिकयात्रा बस्तर-दशहरा-महोत्सवस्य अटूटां श्रद्धां समृद्धां सांस्कृतिकपरम्परां च प्रकाशयति।

बस्तर-दशहरा-महोत्सवः

छत्तीसगढस्य बस्तरक्षेत्रे आयोज्यमानः विश्वप्रसिद्धः बस्तर-दशहरा-महोत्सवः स्वकीयया विशिष्टया सांस्कृतिकपरिचयेन अनन्याभिः परम्पराभिश्च प्रसिद्धः अस्ति। प्रायः पञ्चसप्ततिदिनानि यावत् प्रचलितः अयं लोकमहोत्सवः देशस्य दीर्घतमेषु उत्सवेषु अन्यतमः अस्ति। भारतस्य अन्येषु प्रदेशेषु आयोज्यमानात् विजयादशमी-महोत्सवात् अस्य परम्पराः सर्वथा भिन्नाः सन्ति। अस्मिन् महोत्सवे न भगवान् श्रीरामस्य कथाम् आश्रित्य कार्यक्रमाः भवन्ति, न च रावणस्य प्रतिमायाः दहनं क्रियते। अयं महोत्सवः मुख्यतया स्थानीयदेवतानां पूजायै, जनजातीयश्रद्धायै, शताब्देभ्यः प्रचलितानां सांस्कृतिकपरम्पराणां संरक्षणाय च समर्पितः अस्ति।

बस्तर-दशहरा-महोत्सवस्य समग्रः आयोजनः आराध्यायाः मातुः दन्तेश्वर्याः तथा स्थानीयानां जनजातीयदेवतानां पूजाराधनाय समर्पितः अस्ति। अस्मिन् महोत्सवे शक्त्युपासनया सह प्रकृतेः संस्कृतेः च अद्वितीयः समन्वयः दृश्यते। अयं महोत्सवः बस्तरस्य समृद्धानां जनजातीयपरम्पराणां, धार्मिकश्रद्धायाः सांस्कृतिकवैभवस्य च संरक्षणे महत्त्वपूर्णां भूमिकां निर्वहति।

बस्तर-दशहरस्य ऐतिहासिकपरम्परायाः आरम्भः पञ्चदशे शताब्दे, प्रायः १४०८ तमे ईस्वीयवर्षे, काकतीयवंशीयस्य राज्ञः पुरुषोत्तमदेवस्य शासनकाले अभवत् इति मन्यते। प्रचलितजनश्रुतीनुसारं जगन्नाथपुरीतीर्थयात्रातः प्रत्यागत्य राजा पुरुषोत्तमदेवः ‘रथपतिः’ इति उपाधिना सम्मानितः अभवत्। एषा परम्परा बस्तरस्य सांस्कृतिकवैभवस्य धार्मिकेतिहासस्य च महत्त्वपूर्णः अंशः मन्यते।

तीर्थयात्रातः प्रत्यागत्य राजा पुरुषोत्तमदेवः बस्तरक्षेत्रे विशालस्य काष्ठरथस्य यात्राम् आयोजयितुं मातुः दन्तेश्वर्याः पूजार्चनां च कर्तुं परम्पराम् आरब्धवान्। शताब्देभ्यः प्रचलिता एषा धार्मिकपरम्परा अद्यापि पूर्णश्रद्धया उत्साहेन च पाल्यते। षड्भ्यः शतवर्षेभ्यः अधिककालात् अनवरतं प्रचलिता एषा परम्परा बस्तर-दशहरस्य ऐतिहासिकमहत्त्वस्य समृद्धसांस्कृतिकवैभवस्य च प्रतीकं जाता।

बस्तर-दशहरा-महोत्सवस्य आरम्भः श्रावणमासस्य हरियाली-अमावस्यायां आयोज्यमानया ‘पाट-जात्रा’ इति धार्मिकक्रियया भवति। अस्यां क्रियायां रथनिर्माणे प्रयुक्तस्य काष्ठस्य विधिवत् पूजनं क्रियते। ततः आश्विनमासस्य शुक्लपक्षे काछनगादी, जोगी-बिठाई, पुष्परथपरिक्रमा, मावली-परघाव, भीतर-रैनी, बाहर-रैनी तथा मुरिया-दरबार इत्यादयः महत्त्वपूर्णाः पारम्परिकाः धार्मिकक्रियाः सम्पाद्यन्ते। एताभिः सर्वाभिः परम्परागतक्रियाभिः अयं विशिष्टः महोत्सवः सम्पन्नः भवति। प्रत्येकं धार्मिकानुष्ठानं बस्तरस्य जनजातीयसंस्कृतिं, धार्मिकश्रद्धां, ऐतिहासिकपरम्परां च प्रतिबिम्बयति।

बस्तर-दशहरा-महोत्सवस्य अवसरे प्रायः अशीतिभ्यः परगनेभ्यः बहवः ग्रामवासिनः जनजातीयप्रतिनिधयश्च गाढश्रद्धया जगदलपुरे समागच्छन्ति। ते स्वस्कन्धैः हस्ताभ्यां च विशालं रथं सामूहिकरूपेण आकर्षन्ति। एषा प्राचीनपरम्परा बस्तरस्य सामूहिकसहभागितायाः, जनजातीयैकतायाः, समृद्धायाः लोकसांस्कृतिकपरम्परायाश्च अद्वितीयं उदाहरणं प्रस्तुतयति।

सांस्कृतिकाः अनुष्ठानाः

बस्तर-दशहरा-महोत्सवस्य विधिवत् शुभारम्भः श्रावणमासस्य हरियाली-अमावस्यायां ‘पाट-जात्रा’ इति धार्मिकानुष्ठानेन भवति। अस्मिन् अनुष्ठाने रथनिर्माणार्थं वनात् आनीतस्य प्रथमस्य काष्ठखण्डस्य, यः ‘ठुरलू खोटला’ इति नाम्ना प्रसिद्धः अस्ति, पारम्परिकविधिना पूजनं क्रियते।

तदनन्तरं महोत्सवस्य महत्त्वपूर्णम् ‘काछनगादी’ इति अनुष्ठानं सम्पाद्यते। अस्मिन् अवसरे पर्व निर्विघ्नतया सम्पन्नं भवेत् इति कामनया काछिनदेव्याः अनुमतिः प्रार्थ्यते। परम्परानुसारम् अनुसूचितजातीयसमुदायस्य एका अविवाहिता कन्या देव्याः स्वरूपेण प्रतिष्ठाप्यते। सा कण्टकैः निर्मिते दोलायां उपविश्य राज्ञे जनसमुदायाय च दशहरा-महोत्सवस्य आयोजनार्थम् अनुमतिं प्रददाति। एतद् विशिष्टम् अनुष्ठानं बस्तरस्य प्राचीनधार्मिकविश्वासान् विशिष्टां सांस्कृतिकपरम्परां च प्रतिबिम्बयति।

‘काछनगादी’ इत्यनुष्ठाने अनुमतिप्राप्ते सति बस्तर-दशहरा-महोत्सवे ‘जोगी-बिठाई’ इति परम्परागतं धार्मिकानुष्ठानं सम्पाद्यते। अस्यां परम्परायां हलबा-समुदायस्य एकः सदस्यः नवदिनानि यावत् अन्नजलत्यागं कृत्वा योगमुद्रायाम् उपविशति। सः सम्पूर्णस्य बस्तर-अञ्चलस्य सुखसमृद्ध्यै कल्याणाय च प्रार्थनां करोति।

एतस्मिन्नेव काले अष्टदिनानि यावत् जगदलपुरनगरे विशालस्य काष्ठरथस्य ‘पुष्परथपरिक्रमा’ आयोज्यते। अस्मिन् पारम्परिके आयोजने ग्रामवासिनः परमश्रद्धया उत्साहेन च स्वहस्तैः स्कन्धैश्च रथम् आकर्षन्ति। एषा परम्परा बस्तरस्य सामूहिकश्रद्धां शताब्देभ्यः प्रचलितां सांस्कृतिकपरम्परां च प्रकाशयति।

आश्विनमासस्य शुक्लपक्षस्य नवम्यां तिथौ महत्त्वपूर्णम् ‘मावली-परघाव’ इत्यनुष्ठानं सम्पन्नं भवति। अस्मिन् अवसरे दन्तेवाडातः आनीयमानयोः मातुः दन्तेश्वर्याः मावलीमातुः च पवित्रयोः दोलिकयोः भव्यः श्रद्धापूर्णश्च स्वागतसमारोहः आयोज्यते। भक्तजनाः पारम्परिकविधिभिः देव्योः पूजां सम्मानं च कुर्वन्ति। एतदनुष्ठानं बस्तर-दशहरा-महोत्सवस्य धार्मिकविश्वासानां गौरवशालिनीनां परम्पराणां च महत्त्वपूर्णः अंशः अस्ति।

बस्तर-दशहरा-महोत्सवस्य प्रमुखेषु चरणेषु ‘भीतर-रैनी’ तथा ‘बाहर-रैनी’ इति विशिष्टे परम्परागतानुष्ठाने विशेषं महत्त्वं वर्तेते। दशहरायाः मुख्यदिवसस्य रात्रौ ‘भीतर-रैनी’ इत्यनुष्ठानकाले ग्रामवासिनः विशालं रथं स्कन्धैः उत्थाप्य कुम्हाडाकोटस्य वनं प्रति नयन्ति। तदनन्तरदिने ‘बाहर-रैनी’ इति परम्परा आयोज्यते। अस्यां क्रियायां राजा ग्रामवासिनश्च मिलित्वा रथस्य अन्वेषणं कुर्वन्ति। ततः नवधान्यस्य नैवेद्यं देव्यै समर्प्य रथं प्रत्यानीयते। एताः परम्पराः बस्तरस्य विशिष्टां लोकसंस्कृतिं सामूहिकसहभागितां च प्रकाशयन्ति।

महोत्सवस्य अन्तिमचरणे ऐतिहासिकः ‘मुरिया-दरबारः’ आयोज्यते। मातुः दन्तेश्वर्याः कृपाछायायाम् आयोजिते अस्मिन् सभासमागमे जनप्रतिनिधयः, माझी-चालकी इति पारम्परिकनेतारः, प्रशासनिकाधिकारिणश्च एकत्र उपविशन्ति। ते क्षेत्रस्य जनसमस्यानां, विकासकार्याणां, भविष्यस्य प्रशासनिकव्यवस्थानां च विषये विचारविनिमयं कुर्वन्ति। अयं समारोहः स्थानीयजनानां सहभागितायाः सामूहिकसंवादस्य च परम्परां दर्शयति।

ततः ‘कुटुम्ब-जात्रा’ इत्यनुष्ठानेन देवतानां च विधिवत् विदायया महोत्सवस्य समापनं भवति। एवं प्रायः पञ्चसप्ततिदिनपर्यन्तं प्रचलितः बस्तर-दशहरा-महोत्सवः धार्मिकश्रद्धायाः, जनजातीयपरम्पराणां, सामाजिकैकतायाश्च सन्देशं प्रसारयन् सम्पन्नः भवति।

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