जगदलपुर में आकार ले रहा भव्य चतुर्मुख शिवालय, 30 हजार वर्गफीट में दक्षिण भारतीय शैली की झलक। Grand Four-Faced Shiva Temple Taking Shape in Jagdalpur, Spread Across 30,000 Sq Ft in South Indian Architectural Style। जगदलपुरे त्रिंशत्सहस्र-वर्गफुट-विस्तीर्णः भव्यः चतुर्मुखशिवालयः निर्मीयते, दक्षिणभारतीय-वास्तुशैल्या अलङ्कृतः।
जगदलपुर के गंगामुंडा तालाब के पास करीब 30 हजार वर्गफीट क्षेत्र में भव्य श्री गंगा कैलाशनाथ चतुर्मुख शिवालय आकार ले रहा है। मंदिर की रूपरेखा तिरुपति के वास्तु विशेषज्ञ तैयार कर रहे हैं, जिसमें दक्षिण भारतीय मंदिर स्थापत्य की विशिष्ट झलक देखने को मिलेगी। निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है और वर्ष 2027 की महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा किए जाने का लक्ष्य रखा गया है। इस धार्मिक स्थल के विकसित होने से बस्तर में धार्मिक एवं पर्यटन गतिविधियों को नई गति मिलने की उम्मीद है।

जगदलपुर। गंगामुंडा तालाब के पास बन रहा श्री गंगा कैलाशनाथ चतुर्मुख शिवालय अब अपने निर्माण के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है। लगभग 30 हजार वर्गफीट में तैयार हो रहे इस भव्य मंदिर की वास्तुकला में द्रविड़ शैली की स्पष्ट झलक दिखाई देगी। धार्मिक आस्था, दक्षिण भारतीय स्थापत्य और बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का यह संगम मंदिर को खास स्वरूप प्रदान कर रहा है। निर्माण पूरा होने के बाद यह स्थल बस्तर के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्रों में अपनी जगह बना सकता है और देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं व पर्यटकों के लिए नया आकर्षण बन सकता है।
बस्तर डिस्ट्रिक आंध्र एसोसिएशन के अध्यक्ष एम. जयंत नायडू के अनुसार, श्री गंगा कैलाशनाथ चतुर्मुख शिवालय में प्राण-प्रतिष्ठा समारोह वर्ष 2027 की महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित करने का लक्ष्य रखा गया है। वर्तमान में मंदिर का निर्माण कार्य ट्रस्ट की निगरानी में लगातार जारी है। शिवालय की भव्यता और विशिष्ट पहचान को ध्यान में रखते हुए इसके निर्माण में दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली की बारीकियों को प्रमुखता दी जा रही है।
तिरुपति के वास्तु विशेषज्ञों ने तैयार की मंदिर की भव्य रूपरेखा
मंदिर की वास्तु योजना तिरुपति के जाने-माने वास्तु विशेषज्ञ बाल भास्कर ने तैयार की है। जानकारी के मुताबिक, वे अब तक करीब 216 मंदिरों की डिजाइन और रूपरेखा तैयार कर चुके हैं। प्रस्तावित शिवालय में दक्षिण भारतीय स्थापत्य परंपरा की विशिष्ट छाप देखने को मिलेगी। मंदिर की नक्काशी, शिल्प और सजावटी कार्य को भव्य एवं आकर्षक बनाने के लिए अनुभवी कारीगरों को जिम्मेदारी सौंपी गई है।
सात अन्य मंदिरों का निर्माण भी प्रगति पर
मंदिर परिसर को बहुदेवालय स्वरूप देने के लिए विभिन्न देवी-देवताओं के मंदिरों का निर्माण भी साथ-साथ किया जा रहा है। प्रथम तल के गर्भगृह में चतुर्मुख शिवलिंग की स्थापना प्रस्तावित है, जबकि भूतल पर संभाग का पहला नवग्रह मंदिर आकार ले रहा है। परिसर में बजरंगबली मंदिर के साथ यज्ञशाला और ध्यान केंद्र भी विकसित किए जा रहे हैं। प्रथम तल पर दुर्गा, सरस्वती, अन्नपूर्णा, गणेश, कार्तिकेय, राम दरबार और सूर्यदेव के सात अलग-अलग मंदिर बनाए जा रहे हैं। मुख्य प्रवेश क्षेत्र में हनुमानजी और प्रवेश द्वार पर मां दंतेश्वरी की प्रतिमा स्थापित की जाएगी। इन सभी निर्माणों के पूरा होने के बाद यह परिसर धार्मिक आस्था, पूजा-अर्चना और आध्यात्मिक साधना का प्रमुख केंद्र बनने की उम्मीद है।
महाबलीपुरम से पहुंचीं मंदिर के लिए देवी-देवताओं की भव्य प्रतिमाएं
मंदिर की विशिष्टता इसकी भव्य प्रतिमाओं और शिल्प सज्जा में भी नजर आएगी। परिसर में स्थापित की जाने वाली सभी प्रतिमाएं महाबलीपुरम से लाई जा चुकी हैं। वहीं, आंध्र प्रदेश के काकीनाडा से पहुंचे करीब 40 कुशल शिल्पकार पत्थरों पर नक्काशी सहित अन्य कलात्मक कार्यों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। मंदिर की दीवारों और विभिन्न हिस्सों पर दक्षिण भारतीय शिल्प परंपरा की बारीक और आकर्षक कलाकृतियां देखने को मिलेंगी।
मंदिर निर्माण में स्थानीय लोगों का भी बढ़-चढ़कर सहयोग
मंदिर के निर्माण में आंध्र समाज के साथ स्थानीय नागरिकों और प्रदेश के विभिन्न शहरों से आने वाले श्रद्धालुओं का भी निरंतर सहयोग मिल रहा है। निर्माण पूर्ण होने के बाद श्री गंगा कैलाशनाथ चतुर्मुख शिवालय बस्तर की धार्मिक विरासत और सांस्कृतिक पहचान को नई मजबूती देने वाला केंद्र बन सकता है। मां दंतेश्वरी मंदिर और श्री बालाजी मंदिर के बाद यह शिवालय भी बस्तर के प्रमुख आस्था स्थलों में अपनी पहचान बनाने की ओर बढ़ रहा है।
English
A grand Shri Ganga Kailashnath Chaturmukh Shiva Temple is rapidly taking shape near Gangamunda Pond in Jagdalpur, spread across nearly 30,000 square feet. Designed by architectural experts from Tirupati, the temple will showcase distinctive elements of South Indian temple architecture. Construction is progressing swiftly, with the consecration ceremony planned for Mahashivratri in 2027. The temple is expected to emerge as a major religious attraction and give a significant boost to tourism in the Bastar region.
Jagdalpur. The grand Shri Ganga Kailashnath Chaturmukh Shiva Temple, being built near Gangamunda Pond, has entered the final phase of construction. Spread across nearly 30,000 square feet, the temple is being developed in the distinctive Dravidian architectural style. The project brings together spiritual devotion, traditional temple architecture and Bastar’s rich cultural heritage. Once completed, the temple is expected to become an important spiritual destination in Bastar and attract devotees and tourists from across the country.
M. Jayant Naidu, president of the Bastar District Andhra Association, said the consecration ceremony for the Shri Ganga Kailashnath Chaturmukh Shiva Temple is targeted for Mahashivratri in 2027. Construction is currently progressing under the supervision of the temple trust. Special attention is being given to South Indian architectural traditions to give the temple a grand and distinctive appearance.
Temple’s Grand Design Prepared by Architectural Experts from Tirupati
The architectural plan for the temple has been designed by renowned Tirupati-based architect Bal Bhaskar. According to the information provided, he has so far prepared the designs and layouts for around 216 temples. The proposed shrine will showcase distinctive elements of South Indian architectural traditions. Skilled craftsmen have been engaged to give the temple’s carvings, sculptures and ornamental details an elaborate and visually appealing finish.
Construction of Seven More Temples Also Underway
The temple complex is being developed as a multi-shrine spiritual destination, with dedicated temples for several Hindu deities. A four-faced Shiva Lingam will be installed in the sanctum on the first floor, while the ground floor is being developed with the division’s first Navagraha temple. A Bajrangbali temple, Yagyashala and meditation centre are also part of the complex. Seven additional shrines dedicated to Durga, Saraswati, Annapurna, Ganesha, Kartikeya, Ram Darbar and Surya Dev are being constructed on the first floor. An idol of Lord Hanuman will be placed at the main entrance, while an idol of Maa Danteshwari will welcome devotees at the entry gate. Once completed, the entire complex is expected to emerge as a major centre of faith, worship and spiritual experience.
Idols of Various Deities Arrive from Mahabalipuram for the Temple
One of the temple’s key highlights will be its magnificent idols and intricate craftsmanship. All the idols to be installed in the temple complex have already arrived from Mahabalipuram. Meanwhile, around 40 skilled artisans from Kakinada in Andhra Pradesh are working on stone carvings and other decorative elements, giving the temple its final artistic touches. The walls and various sections of the temple will showcase the fine details and distinctive features of South Indian sculptural traditions.
Local Residents Also Extend Active Support for the Temple Project
The temple project is receiving continued support not only from the Andhra community but also from local residents and devotees from different cities across the state. Once completed, the Shri Ganga Kailashnath Chaturmukh Shiva Temple is expected to add a new dimension to Bastar’s religious heritage and cultural identity. Following the renowned Maa Danteshwari Temple and Shri Balaji Temple, the shrine is steadily emerging as another significant spiritual destination in the region.
संस्कृत
जगदलपुर-नगरे गङ्गामुण्डा-तडागस्य समीपे प्रायः त्रिंशत्सहस्र-वर्गफुट-विस्तीर्णे क्षेत्रे भव्यस्य श्रीगङ्गाकैलाशनाथ-चतुर्मुख-शिवालयस्य निर्माणकार्यं द्रुतगत्या प्रचलति। तिरुपति-नगरस्य वास्तुविशेषज्ञैः अस्य देवालयस्य रूपरेखा निर्मीयते, यस्मिन् दक्षिणभारतीय-मन्दिर-वास्तुकलायाः विशिष्टं स्वरूपं दृश्यते। वर्षे २०२७ महाशिवरात्रेः पावने पर्वणि अस्मिन् देवालये प्राणप्रतिष्ठां कर्तुं लक्ष्यं निर्धारितम् अस्ति। अस्य धार्मिकस्थलस्य निर्माणेन बस्तर-क्षेत्रस्य धार्मिक-पर्यटनस्य विकासाय नूतना गतिः प्राप्तुं शक्यते।
जगदलपुरम्। गङ्गामुण्डा-तडागस्य समीपे निर्मीयमाणः श्रीगङ्गाकैलाशनाथ-चतुर्मुख-शिवालयः इदानीं निर्माणस्य अन्तिमचरणं प्राप्तः अस्ति। प्रायः त्रिंशत्सहस्र-वर्गफुट-विस्तीर्णे क्षेत्रे निर्मीयमाणस्य अस्य भव्यदेवालयस्य वास्तुशैल्यां द्रविड़-स्थापत्यस्य विशिष्टं स्वरूपं दृश्यते। धार्मिकश्रद्धा, प्राचीनवास्तुकला तथा बस्तरस्य सांस्कृतिकवैभवस्य अद्भुतः समन्वयः अस्मिन् देवालये दृश्यते। निर्माणकार्यस्य पूर्णतायां अयं देवालयः बस्तरस्य प्रमुखेषु आध्यात्मिककेन्द्रेषु स्थानं प्राप्स्यति तथा च देशस्य विभिन्नेभ्यः भागेभ्यः आगच्छतां श्रद्धालूनां पर्यटकानां च प्रमुखम् आकर्षणं भविष्यति।
बस्तर-जनपद-आन्ध्र-संघस्य अध्यक्षः एम्. जयन्त-नायडुः अवदत् यत् श्रीगङ्गाकैलाशनाथ-चतुर्मुख-शिवालये प्राणप्रतिष्ठा-समारोहः वर्षे २०२७ महाशिवरात्रि-पर्वणि आयोजयितुं लक्ष्यं निर्धारितम् अस्ति। सम्प्रति शिवालयस्य निर्माणकार्यं न्यासस्य निरीक्षणे निरन्तरं प्रचलति। देवालयस्य भव्यं विशिष्टं च स्वरूपं निर्मातुं दक्षिणभारतीय-स्थापत्यकलायाः सूक्ष्मतत्त्वेषु विशेषं ध्यानं दीयते।
तिरुपति-वास्तुविशेषज्ञैः देवालयस्य भव्यं मानचित्रं निर्मितम्।
अस्य देवालयस्य वास्तुयोजना तिरुपति-नगरस्य प्रसिद्धेन वास्तुविशेषज्ञेन बालभास्करेण निर्मिता अस्ति। प्राप्तविवरणानुसारं तेन अद्यावधि प्रायः २१६ देवालयानां रूपरेखाः सज्जीकृताः सन्ति। प्रस्ताविते शिवालये दक्षिणभारतीय-स्थापत्यपरम्परायाः विशिष्टं प्रतिबिम्बं द्रष्टुं शक्यते। देवालयस्य नक्काशी-शिल्पकलायाः अलङ्करणस्य च मनोहरं भव्यं च स्वरूपं निर्मातुं कुशलाः शिल्पकाराः नियोजिताः सन्ति।
सप्तानां अन्येषां देवालयानामपि निर्माणकार्यं प्रचलति।
देवालय-परिसरं विविधदेवतानां मन्दिरैः समन्वितं आध्यात्मिककेन्द्ररूपेण विकसितं क्रियते। प्रथमस्तरस्य गर्भगृहे चतुर्मुख-शिवलिङ्गस्य प्रतिष्ठापनं करिष्यते। भूमितले सम्भागस्य प्रथमं नवग्रह-मन्दिरं निर्मीयते। तेन सह बजरङ्गबलेः मन्दिरं, यज्ञशाला तथा ध्यानकेन्द्रमपि निर्मीयन्ते। प्रथमस्तरे दुर्गा, सरस्वती, अन्नपूर्णा, गणेश, कार्तिकेय, रामदरबार तथा सूर्यदेवस्य सप्त मन्दिराणि निर्मीयन्ते। मुख्यप्रवेशद्वारे हनुमतः प्रतिमा तथा प्रवेशद्वारे भगवत्याः दन्तेश्वर्याः प्रतिमा स्थापयिष्यते। समग्रनिर्माणस्य पूर्णतायां अयं परिसरः धार्मिकश्रद्धायाः, उपासनायाः आध्यात्मिकसाधनायाश्च प्रमुखं केन्द्रं भविष्यति।
महाबलीपुरमात् देवालयाय देवतानां भव्याः प्रतिमाः प्राप्ताः।
देवालयस्य प्रमुखं वैशिष्ट्यं तत्र स्थाप्यमानाः भव्याः देवप्रतिमाः सूक्ष्मा च शिल्पकला भविष्यति। देवालये स्थापनीयाः सर्वाः प्रतिमाः महाबलीपुरमात् आनीताः सन्ति। आन्ध्रप्रदेशस्य काकीनाडातः आगताः प्रायः चत्वारिंशत् कुशलाः शिल्पकाराः प्रस्तरेषु नक्काशीकार्यं तथा अन्यानि कलात्मकानि कार्याणि अन्तिमरूपं दातुं संलग्नाः सन्ति। देवालयस्य भित्तिषु विविधेषु च भागेषु दक्षिणभारतीय-शिल्पपरम्परायाः सूक्ष्मं मनोहरं च स्वरूपं द्रष्टुं शक्यते।
देवालय-निर्माणे स्थानीयजनानामपि सक्रियं सहयोगं प्राप्यते।
देवालयस्य निर्माणकार्ये आन्ध्रसमाजस्य सह स्थानीयजनानां तथा प्रदेशस्य विभिन्ननगरेभ्यः आगच्छतां श्रद्धालूनां च निरन्तरं सहयोगः प्राप्यते। निर्माणकार्यस्य पूर्णतायां श्रीगङ्गाकैलाशनाथ-चतुर्मुख-शिवालयः बस्तरस्य धार्मिकपरम्परायाः सांस्कृतिकवैशिष्ट्यस्य च समृद्धये महत्त्वपूर्णं केन्द्रं भविष्यति। प्रसिद्धयोः मातृदन्तेश्वरी-मन्दिरस्य श्रीबालाजी-मन्दिरस्य च अनन्तरम् अयम् शिवालयोऽपि बस्तरस्य प्रमुखेषु धार्मिकस्थलेषु स्थानं प्राप्तुं अग्रसरति।


