युद्ध, सूखे और महंगे मालभाड़े के चलते 2027 तक बढ़ सकती है महंगाई.War, Drought and Rising Freight Costs May Fuel Inflation Through 2027.युद्धेन, अनावृष्ट्या, महता परिवहनव्ययेन च २०२७ तमवर्षपर्यन्तं महङ्गता वर्धितुं शक्नोति।
युद्ध के कारण समुद्री परिवहन में आ रही बाधाओं, अल-नीनो के प्रभाव से सूखे की आशंका और उत्पादन लागत में बढ़ोतरी के चलते दुनियाभर में खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, महंगाई का यह दबाव वर्ष 2027 तक बना रह सकता है।

वैश्विक बाजारों में खाद्य पदार्थों के दाम एक बार फिर तेजी से बढ़ रहे हैं। आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि महंगाई का यह दबाव 2027 तक बना रह सकता है। युद्ध के चलते समुद्री आपूर्ति व्यवस्था में आ रही रुकावटों और अल-नीनो के प्रभाव से पैदा हुई सूखे की स्थिति ने अनाज उत्पादन को प्रभावित किया है। इन दोनों चुनौतियों का सबसे अधिक असर निम्न और मध्यम आय वर्ग वाले देशों के लोगों पर पड़ रहा है,
इंडोनेशिया में चावल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं, वहीं मिस्र में ब्रेड के दामों में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। भारत में मॉनसून की अनियमितता के चलते चीनी, प्याज और दालों जैसी रोजमर्रा की जरूरी वस्तुएं भी महंगी हो रही हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर में वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक बढ़कर 136 अंक पर पहुंच गया, जो पिछले दो वर्षों का सर्वोच्च स्तर है।
आपूर्ति व्यवस्था में कई स्तरों पर बाधाएं और उत्पादन लागत में लगातार वृद्धि.
खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आई तेज वृद्धि के पीछे एक साथ सामने आए कई वैश्विक संकट जिम्मेदार हैं। काला सागर और लाल सागर क्षेत्रों में भू-राजनीतिक तनाव के चलते गेहूं सहित अन्य अनाजों की ढुलाई महंगी और चुनौतीपूर्ण हो गई है। सुरक्षा संबंधी जोखिमों के कारण जहाजों को लंबे वैकल्पिक मार्गों से गुजरना पड़ रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय परिवहन लागत और मालभाड़े की दरों में लगभग 50 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। वहीं, मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण ईंधन और उर्वरकों की कीमतें भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। इसका सीधा असर किसानों की उत्पादन लागत पर पड़ रहा है, जिससे खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव और गहरा गया है।
खाद्य भंडार में कमी और मुद्रा के मूल्य में गिरावट.
पिछले कुछ वर्षों में बेहतर कृषि उत्पादन और वैश्विक स्तर पर अनाज के पर्याप्त भंडार ने खाद्य कीमतों को नियंत्रित रखने में अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि, अब इन भंडारों का सुरक्षा कवच कमजोर पड़ने लगा है। खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों को कच्चे माल की जरूरतें पूरी करने के लिए ऊंची कीमतों वाले अनुबंधों के तहत खरीदारी करनी पड़ रही है। दूसरी ओर, कई देशों की स्थानीय मुद्राओं का मूल्य घटने से महंगाई का दबाव और बढ़ गया है। मुद्रा कमजोर होने के कारण आयातित खाद्य वस्तुओं और परिवहन पर होने वाला खर्च बढ़ जाता है, जिसका सीधा बोझ आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ रहा है।
महंगाई से सामाजिक और आर्थिक संकट गहराने की आशंका.
खाद्य महंगाई के बढ़ते दबाव ने समाज के कमजोर और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। दैनिक मजदूरी पर निर्भर लोगों और कम आय वाले परिवारों को अपना खर्च चलाने के लिए भोजन की मात्रा तक कम करनी पड़ रही है। आशंका है कि आने वाले महीनों में प्रमुख आयातक देश अंतरराष्ट्रीय बाजार से बड़े पैमाने पर खाद्य सामग्री खरीदेंगे, जिससे वैश्विक मांग बढ़ने के साथ कीमतों पर दबाव और तेज हो सकता है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, यदि खाद्य निर्यात पर प्रतिबंध लगाए गए या कृषि उत्पादन में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ, तो हालात और गंभीर हो सकते हैं। इससे सामाजिक असंतोष बढ़ने के साथ दुनिया भर में खाद्य असुरक्षा की समस्या भी गहरा सकती है।
English
Food prices are rising worldwide due to shipping disruptions caused by wars, drought risks associated with El Niño, and increasing input costs. Experts believe that this inflationary pressure on food prices could persist until 2027.
Food prices in global markets are rising sharply once again, and economic experts predict that the crisis could continue until 2027. Disruptions to maritime supply chains caused by wars, along with drought conditions linked to El Niño, have adversely affected grain production. The combined impact is being felt most severely by people in low- and middle-income countries, where a significant portion of household income is spent on food.
Rice prices in Indonesia have climbed to an all-time high, while bread prices in Egypt have risen by 25 percent. In India, erratic monsoon conditions are pushing up the prices of essential commodities such as sugar, onions, and pulses. According to the United Nations Food and Agriculture Organization (FAO), the global Food Price Index reached 136 points in September, marking its highest level in the past two years.
Multiple Supply Chain Disruptions and Rising Production Costs.
The sharp rise in food prices is the result of several global shocks occurring simultaneously. Geopolitical tensions in the Black Sea and Red Sea regions have made the transportation of wheat and other grains more expensive and complicated. Security risks are forcing ships to take longer alternative routes, pushing freight rates on international shipping routes up by nearly 50 percent. Meanwhile, the ongoing conflict in the Middle East has kept fuel and fertilizer prices elevated. This has directly increased farmers’ production costs, adding further pressure on food prices.
Declining Buffer Stocks and Currency Depreciation.
In recent years, strong agricultural output and ample global grain reserves have helped keep food prices under control. However, this protective buffer is now beginning to weaken. Food processing companies are increasingly purchasing raw materials through contracts at higher prices to meet their requirements. Meanwhile, the depreciation of local currencies in several countries has further intensified inflationary pressures. Weaker currencies make imported food products and transportation more expensive, directly increasing the financial burden on consumers.
Risk of Deepening Social and Economic Crisis.
Rising food inflation is putting the livelihoods of society’s most vulnerable groups at risk. Daily wage earners and low-income households are being forced to reduce their food consumption to manage their expenses. In the coming months, major importing countries may begin purchasing large quantities of food from international markets, creating additional pressure on global demand and prices. Economists warn that if export restrictions are imposed or agricultural production fails to improve, the situation could deteriorate further. This may intensify social unrest and deepen food insecurity worldwide.
संस्कृति
युद्धजनितैः समुद्रीयपरिवहनविघ्नैः, एल्-नीनो प्रभावेण उत्पन्नया अनावृष्टिशङ्कया, उत्पादनव्ययस्य वृद्ध्या च विश्वभरि खाद्यवस्तूनां मूल्यानि वर्धन्ते। विशेषज्ञाणां मते खाद्यवस्तुमूल्यानां वृद्धेः एषः दबावः २०२७ तमवर्षपर्यन्तं स्थातुं शक्नोति।
वैश्विकविपण्येषु खाद्यपदार्थानां मूल्यानि पुनः तीव्रगत्या वर्धन्ते। आर्थिकविशेषज्ञानाम् अनुमानानुसारम् एषः सङ्कटः २०२७ तमवर्षपर्यन्तं निरन्तरं भवितुं शक्नोति। युद्धकारणात् समुद्रीयापूर्तिशृङ्खलासु उत्पन्नाः विघ्नाः तथा एल्-नीनो प्रभावसम्बद्धाः अनावृष्टिपरिस्थितयः च धान्योत्पादनं प्रतिकूलतया प्रभावितवन्तः। अस्य संयुक्तप्रभावस्य सर्वाधिकं भारं न्यूनमध्यमायवर्गीयदेशानां जनाः वहन्ति, यतः तेषां कुटुम्बानां आयस्य महत्त्वपूर्णः भागः केवलं खाद्यपदार्थक्रये व्ययितः भवति।
इण्डोनेशियादेशे तण्डुलानां मूल्यानि ऐतिहासिकं उच्चस्तरं प्राप्तानि सन्ति। मिस्रदेशे च पिष्टकस्य मूल्येषु पञ्चविंशतिप्रतिशतं वृद्धिः अभवत्। भारतदेशे अनियमितवृष्टेः प्रभावेण शर्करायाः, पलाण्डूनां, दलहनानां च मूल्यानि वर्धन्ते। संयुक्तराष्ट्रसङ्घस्य खाद्यकृषिसङ्घटनस्य (FAO) प्रतिवेदनानुसारं सितम्बरमासे वैश्विकः खाद्यमूल्यसूचकाङ्कः १३६ अङ्कान् प्राप्तवान्, यः विगतयोः द्वयोः वर्षयोः उच्चतमः स्तरः अस्ति।
आपूर्तिव्यवस्थायाः बहुविधाः बाधाः तथा उत्पादनव्ययस्य निरन्तरं वर्धनम्।
खाद्यपदार्थानां मूल्यानां तीव्रवृद्धेः पृष्ठे एकस्मिन् काले उत्पन्नाः अनेकाः वैश्विकाः सङ्कटाः सन्ति। कृष्णसागरक्षेत्रे तथा रक्तसागरक्षेत्रे विद्यमानानां भू-राजनैतिकतनावानां कारणेन गोधूमादीनां धान्यानां परिवहनं महत्तरं जटिलतरं च जातम्। सुरक्षासम्बद्धानां जोखिमानां कारणात् पोताः दीर्घतरान् वैकल्पिकमार्गान् आश्रयन्ति, येन अन्तर्राष्ट्रीयमार्गेषु मालवाहनव्ययः प्रायः पञ्चाशत्प्रतिशतं वर्धितः अस्ति। अपरतः मध्यपूर्वे प्रचलितस्य सङ्घर्षस्य कारणेन इन्धनस्य उर्वरकाणां च मूल्यानि उच्चस्तरे एव सन्ति। एतेन कृषकाणां उत्पादनव्ययः प्रत्यक्षतया वर्धितः, फलतः खाद्यपदार्थानां मूल्यवृद्धेः दबावः अधिकः अभवत्।
खाद्यान्न-सुरक्षाभाण्डारस्य न्यूनता तथा मुद्रायाः अवमूल्यनम्।
विगतवर्षेषु उत्तमकृष्युत्पादनेन तथा वैश्विकस्तरे धान्यानां पर्याप्तभाण्डारैः खाद्यपदार्थानां मूल्यानि किञ्चित्पर्यन्तं नियन्त्रितानि आसन्। किन्तु अधुना एतत् सुरक्षाकवचं शनैः क्षीणं भवति। खाद्यप्रसंस्करणकम्पन्यः कच्चामालस्य आवश्यकतां पूरयितुं उच्चमूल्ययुक्तेषु अनुबन्धेषु तस्य क्रयं कुर्वन्ति। अन्यतः अनेकदेशानां स्थानीयमुद्राणां मूल्यह्रासेन महङ्गायाः दबावः अधिकः जातः। दुर्बलमुद्रायाः कारणेन आयातितखाद्यवस्तूनां परिवहनस्य च व्ययः वर्धते, येन अन्तिमोपभोक्तॄणां आर्थिकभारः प्रत्यक्षतया वर्धते।
सामाजिक-आर्थिकसङ्कटस्य तीव्रीकरणस्य आशङ्का।
खाद्यपदार्थानां वर्धमाना महङ्गता समाजस्य दुर्बलानां आर्थिकदृष्ट्या पिछडितानां च वर्गाणां जीवनयापनं सङ्कटग्रस्तं कृतवती अस्ति। दैनिकवेतनेन जीवननिर्वाहं कुर्वन्तः श्रमिकाः न्यूनाययुक्ताः परिवाराः च व्ययस्य नियन्त्रणार्थं भोजनस्य मात्रां न्यूनीकर्तुं विवशाः भवन्ति। आगामीषु मासेषु प्रमुखाः आयातकदेशाः अन्तर्राष्ट्रीयविपणिभ्यः बहुमात्रायां खाद्यवस्तूनि क्रेतुं शक्नुवन्ति, येन वैश्विकमागधायां वृद्ध्या सह मूल्यानाम् उपरि दबावः वर्धिष्यते। अर्थशास्त्रज्ञाः चेतयन्ति यत् यदि निर्यातप्रतिबन्धाः आरोपिताः भवन्ति अथवा कृष्युत्पादने अपेक्षितः सुधारः न भवति, तर्हि परिस्थितिः अधिका गम्भीरा भवितुम् अर्हति। एतेन सामाजिकासन्तोषः वर्धितुं शक्नोति तथा विश्वव्यापिनी खाद्याभावस्य समस्या अपि अधिका गभीरा भवितुम् अर्हति।


