नेपाल बाढ़ आपदा पर भारत का बड़ा बयान, जलवायु संकट के लिए विकसित देशों को ठहराया जिम्मेदार।India’s Strong Statement on Nepal Flood Disaster, Blames Developed Nations for Climate Crisis. नेपालस्य बाढापदायां भारतस्य महत्त्वपूर्णं वक्तव्यम्, जलवायुसंकटस्य कृते विकसितराष्ट्राणि उत्तरदायीनि इति कथितम्।

नेपाल में भीषण बाढ़ के बाद जलवायु मुआवजे की मांग को लेकर बहस तेज हो गई है। इसी बीच भारत ने जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी और समाधान को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को कहा कि जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के लिए साझा चुनौती है, लेकिन इसके समाधान की प्राथमिक जिम्मेदारी उन विकसित देशों की बनती है, जो ऐतिहासिक रूप से वैश्विक स्तर पर बड़े उत्सर्जनकर्ताओं में रहे हैं।
यह प्रतिक्रिया नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल के उस बयान के बाद सामने आई, जिसमें उन्होंने अमेरिका, चीन और भारत को दुनिया के प्रमुख ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों में शामिल बताया था। खनाल ने जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए जलवायु क्षतिपूर्ति की आवश्यकता का भी उल्लेख किया था।
नेपाल के रुख पर भारत का जवाब, जलवायु कार्रवाई में CBDR सिद्धांत पर दिया जोर
भारत का कहना है कि औद्योगिक विकास के दौरान ऐतिहासिक रूप से सबसे अधिक उत्सर्जन करने वाले विकसित देशों को जलवायु कार्रवाई में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। इसके तहत उन्हें विकासशील और जलवायु-संवेदनशील देशों को वित्तीय मदद उपलब्ध कराने के साथ-साथ हरित तकनीक के हस्तांतरण में भी नेतृत्व करना चाहिए।
26 अगस्त को नेपाल में आई भीषण प्राकृतिक आपदा के बाद भारत ने पड़ोसी और मित्र देश की जिम्मेदारी निभाते हुए राहत एवं बचाव अभियान में व्यापक सहयोग दिया है। भारत की ओर से बड़ी मात्रा में राहत सामग्री के साथ सुरंग बचाव विशेषज्ञों की टीम भी नेपाल भेजी गई है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि जरूरत पड़ने पर भारत आगे भी नेपाल को हरसंभव सहायता उपलब्ध कराने के लिए तैयार है।
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने भारतीय सहायता की सराहना करते हुए संसद में सार्वजनिक रूप से भारत के प्रति आभार व्यक्त किया। संयुक्त राष्ट्र महासभा के आगामी सत्र से पहले यह पूरा घटनाक्रम दक्षिण एशिया में जलवायु न्याय और विकसित देशों की जिम्मेदारी को लेकर एक नई बहस को हवा दे रहा है।
आपदा से कुल कितना हुआ नुकसान?
नेपाल की राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) के शुरुआती आकलन में बाढ़ से हुए नुकसान की गंभीर तस्वीर सामने आई है। अनुमान के मुताबिक, संपत्तियों, घरों, सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचों को कम से कम 2.56 अरब डॉलर यानी करीब 387.5 अरब नेपाली रुपये का नुकसान हुआ है। वहीं, आपदा के बाद शुरुआती चार महीनों में जरूरी सेवाओं की बहाली और अस्थायी पुनर्वास के लिए लगभग 5.26 करोड़ डॉलर यानी 7.95 अरब नेपाली रुपये की तत्काल आवश्यकता पड़ने का अनुमान है।
नेपाल क्यों उठा रहा है जलवायु मुआवजे का मुद्दा?
नेपाल इस संकट को “जलवायु न्याय (Climate Justice)” और “जलवायु क्षतिपूर्ति (Loss and Damage Compensation)” के दृष्टिकोण से देख रहा है। इसके पीछे नेपाल के प्रमुख तर्क निम्न हैं:
- अत्यधिक संवेदनशीलता लेकिन नगण्य उत्सर्जन: नेपाल जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित और संवेदनशील देशों में से एक है, जबकि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में इसका योगदान नगण्य (0.1% से भी कम) है।
- ऐतिहासिक उत्तरदायित्व : नेपाल का मानना है कि इस तरह की अत्यधिक और बेमौसम आपदाएँ (जैसे ग्लेशियर पिघलना और अचानक आई भीषण बाढ़) ग्लोबल वार्मिंग का परिणाम हैं। इसके लिए दुनिया की प्रमुख औद्योगिक अर्थव्यवस्थाएँ और बड़े उत्सर्जक देश ऐतिहासिक रूप से जिम्मेदार हैं।
- सहायता नहीं, न्याय की मांग: नेपाल इसे सिर्फ मानवीय सहायता (Aid) के रूप में नहीं, बल्कि उन देशों का नैतिक और अंतर्राष्ट्रीय दायित्व (Compensation) मानता है जिनके भारी प्रदूषण का खामियाजा गरीब व पहाड़ी देशों को भुगतना पड़ रहा है।
(English)
The debate over climate compensation has intensified following the devastating floods and natural disaster in Nepal. Against this backdrop, India has clarified its position on responsibility for climate change and its resolution. Ministry of External Affairs spokesperson Randhir Jaiswal said on Friday that climate change is a shared global challenge, but the primary responsibility for addressing it lies with developed nations that have historically been among the world’s largest emitters.
India’s response came after Nepal’s Foreign Minister Shishir Khanal stated that the United States, China and India are among the world’s largest greenhouse gas emitters. He also highlighted the need for climate compensation to address the losses and damage caused by climate change.
However, Nepal’s Foreign Minister Shishir Khanal later clarified his remarks, stating that he was not seeking direct compensation from any particular country. He also expressed deep gratitude for India’s swift assistance during the crisis and appreciated the country’s support.
India Responds to Nepal’s Stand, Stresses CBDR Principle in Climate Action
India maintains that developed countries, which have historically contributed the most emissions during the era of industrialisation, should take the lead in global climate action. They should support developing and climate-vulnerable nations through financial assistance and the transfer of green technologies.
Following the devastating natural disaster that struck Nepal on August 26, India has stepped forward as a supportive neighbour and friend, providing extensive assistance for relief and rescue operations. India has sent large quantities of relief supplies along with a team of tunnel-rescue specialists to Nepal. The Ministry of External Affairs has confirmed that India remains ready to extend all possible assistance if further support is required.
Nepal’s Prime Minister Balendra Shah has publicly expressed gratitude to India in Parliament for its assistance. Ahead of the upcoming session of the United Nations General Assembly, the development is fueling a fresh debate in South Asia over global climate justice and the responsibilities of developed nations.
How Much Was the Total Damage?
Nepal’s National Disaster Risk Reduction and Management Authority (NDRRMA) has released a preliminary assessment highlighting the scale of the destruction caused by the floods. The disaster is estimated to have caused at least $2.56 billion (around NPR 387.5 billion) in damage to properties, homes, roads and critical infrastructure. In addition, an estimated $52.6 million (NPR 7.95 billion) will be required during the first four months to restore essential services and provide temporary rehabilitation.
Why Is Nepal Seeking Climate Compensation?
Nepal is viewing this crisis from the perspective of “Climate Justice” and “Loss and Damage Compensation”. The key arguments put forward by Nepal behind this are as follows:
- High Vulnerability but Negligible Emissions: Nepal is one of the countries most affected and vulnerable to climate change, while its contribution to global greenhouse gas emissions is negligible (less than 0.1%).
- Historical Responsibility: Nepal believes that such extreme and unseasonal disasters (such as glacier melting and sudden severe floods) are a result of global warming. The world’s major industrial economies and large emitting countries are historically responsible for this.
- Not Aid, but a Demand for Justice: Nepal does not view this merely as humanitarian assistance (Aid), but as a moral and international obligation (Compensation) of those countries whose heavy pollution is causing poor and mountainous countries to bear the consequences.
(संस्कृत)
नेपालदेशे अभूतपूर्वायां बाढापदायां प्राकृतिकविपत्तौ च उत्पन्नायां जलवायुपरिवर्तनस्य क्षतिपूर्तिविषये चर्चा तीव्रा जाता। अस्मिन् विषये भारतस्य विदेशमन्त्रालयस्य आधिकारिकप्रवक्ता रणधीर जायसवालः शुक्रवासरे अवदत् यत् जलवायुपरिवर्तनं समस्तविश्वस्य सामान्यं संकटम् अस्ति। किन्तु तस्य समाधानस्य प्रमुखदायित्वं तेषां विकसितराष्ट्राणां भवति, ये ऐतिहासिकरूपेण वैश्विकस्तरे अधिकतमं कार्बन-उत्सर्जनं कृतवन्तः।
एषा प्रतिक्रिया नेपालस्य विदेशमन्त्री शिशिर खनालस्य तस्मिन् वक्तव्ये अनन्तरं अभवत्, यस्मिन् सः अमेरिका-देशं, चीन-देशं भारतं च विश्वस्य प्रमुखेषु हरितगृह-वायूनां उत्सर्जकेषु देशेषु अन्तर्भावितवान्। जलवायुपरिवर्तनजनितानां हानिनां क्षतिपूर्तये जलवायु-क्षतिपूर्तेः आवश्यकता अपि तेन प्रतिपादिता।
किन्तु अनन्तरं नेपालस्य विदेशमन्त्री शिशिर खनालः स्ववक्तव्यस्य स्पष्टीकरणं दत्त्वा अवदत् यत् तस्य उद्देश्यं कस्मादपि राष्ट्रात् प्रत्यक्षरूपेण क्षतिपूर्तेः याचनं नास्ति। संकटसमये भारतदेशेन प्रदत्तायाः शीघ्रसहायतायाः कृते सः गाढं कृतज्ञतां प्रकटितवान् तथा भारतस्य सहयोगस्य प्रशंसामपि अकरोत्।
नेपालस्य मतस्य प्रत्युत्तरे भारतस्य वक्तव्यम्, जलवायुकर्मणि CBDR-सिद्धान्ते बलं प्रदत्तम्।
भारतस्य मतानुसारं औद्योगिकविकासस्य काले ऐतिहासिकरूपेण अधिकतमं उत्सर्जनं कृतवन्तः विकसितदेशाः जलवायुकर्मणि अग्रणीभूमिकां निर्वहेयुः। ते विकासशीलदेशेभ्यः तथा जलवायुसंवेदनशीलेभ्यः राष्ट्रेभ्यः वित्तीयसहायतां प्रदाय हरितप्रौद्योगिक्याः हस्तान्तरणेऽपि नेतृत्वं कुर्युः।
अगस्तमासस्य २६ तमे दिवसे नेपालदेशे घटितायाः भीषणायाः प्राकृतिकविपत्तेः अनन्तरं भारतं मित्रराष्ट्रस्य सदृशं उत्तरदायित्वं निर्वहन् राहत-उद्धारकार्येषु व्यापकं सहयोगं प्रदत्तवान्। भारतस्य पक्षतः बहुलमात्रायां राहतसामग्री सह सुरुङ्ग-उद्धारविशेषज्ञानां दलमपि नेपालदेशं प्रेषितम्। विदेशमन्त्रालयेन पुष्टिः कृता यत् आवश्यकतायां सति भारतं भविष्येऽपि नेपालाय सर्वसम्भवसहायतां प्रदास्यति।
नेपालस्य प्रधानमन्त्री बालेन्द्रशाहः भारतीयसहायतायाः प्रशंसां कुर्वन् संसदः मध्ये भारतस्य प्रति सार्वजनिकरूपेण कृतज्ञतां प्रकटितवान्। आगामीसंयुक्तराष्ट्रमहासभायाः सत्रात् पूर्वम् एषः घटनाक्रमः दक्षिण-एशियाक्षेत्रे वैश्विकजलवायुन्यायस्य विकसितराष्ट्राणां च दायित्वस्य विषये नूतनां चर्चां जनयति।
आपदया कियान् कुलः क्षतिः अभवत्?
नेपालस्य राष्ट्रिय-आपदा-जोखिम-न्यूनीकरण-प्रबन्धन-प्राधिकरणस्य (NDRRMA) प्रारम्भिकमूल्याङ्कनेन बाढ्या उत्पन्नस्य विनाशस्य गम्भीरं चित्रं प्रकाशितम्। अनुमानानुसारं सम्पत्तीनां, गृहाणां, मार्गाणां तथा आधारभूतसंरचनानां न्यूनातिन्यूनं २.५६ अरब-डॉलर-परिमितं, अर्थात् प्रायः ३८७.५ अरब-नेपाली-रूप्यकाणां क्षतिः अभवत्। अपि च, आपदनन्तरं प्रथमेषु चतुर्षु मासेषु आवश्यकसेवानां पुनर्स्थापनायै अस्थायिपुनर्वासाय च ५.२६ कोटि-डॉलर-परिमितस्य, अर्थात् ७.९५ अरब-नेपाली-रूप्यकाणां तात्कालिकव्ययस्य आवश्यकता भविष्यतीति अनुमानितम्।
नेपालः किमर्थं जलवायुपरिवर्तनस्य क्षतिपूर्तिं याचते?
नेपालः अस्य संकटस्य “जलवायु-न्यायस्य (Climate Justice)” तथा “जलवायु-क्षतिपूर्तेः (Loss and Damage Compensation)” दृष्टिकोणेन अवलोकनं करोति। अस्य पृष्ठतः नेपालस्य प्रमुखाः तर्काः निम्नलिखिताः सन्ति:
- अत्यधिकसंवेदनशीलता किन्तु नगण्यं उत्सर्जनम्: नेपालः जलवायुपरिवर्तनेन सर्वाधिकं प्रभावितेषु संवेदनशीलेषु च देशेषु अन्यतमः अस्ति, यद्यपि वैश्विकहरितगृहवायूनाम् उत्सर्जने तस्य योगदानं नगण्यं (0.1 प्रतिशतादपि न्यूनम्) अस्ति।
- ऐतिहासिकं दायित्वम् : नेपालस्य मतम् अस्ति यत् एतादृश्याः अतितीव्राः अकालसम्भूताः च आपदः (यथा हिमनदीनां द्रवणं सहसा च जाताः भीषणाः बाढाः) वैश्विकतापवृद्धेः परिणामाः सन्ति। अस्य कृते विश्वस्य प्रमुखाः औद्योगिक-अर्थव्यवस्थाः तथा अधिक-उत्सर्जकाः देशाः ऐतिहासिकरूपेण उत्तरदायिनः सन्ति।
- सहायता न, अपितु न्यायस्य याचना: नेपालः एतत् केवलं मानवीयसहायतारूपेण (Aid) न पश्यति, अपितु तेषां राष्ट्राणां नैतिकम् अन्तर्राष्ट्रीयं च दायित्वम् (Compensation) मन्यते, येषां महत् प्रदूषणं निर्धनानां पर्वतीयदेशानां च कृते दुष्परिणामान् जनयति।


