गंगाजल में मिला बैक्टीरिया का दुश्मन! इंसानों के लिए सुरक्षित वायरस को लेकर रिसर्च में बड़ा खुलासा.Bacteria Hunter Found in Ganga Water! Research Reveals Virus That Is Safe for Humans. गङ्गाजले प्राप्तः जीवाणूनां विनाशकः विषाणुः! मानवेषु सुरक्षिततां प्रति अनुसन्धानस्य महत्त्वपूर्णः निष्कर्षः

देहरादून: सनातन धर्म में गंगा नदी को अत्यंत पवित्र माना जाता है और इसके जल का धार्मिक महत्व भी विशेष है। धार्मिक आस्था के साथ-साथ गंगा की स्वशुद्धिकरण क्षमता लंबे समय से वैज्ञानिकों के शोध का विषय रही है। अब गंगा नदी पर किए गए एक नए अध्ययन में वायरस और बैक्टीरियोफेज की उल्लेखनीय विविधता सामने आई है।शोधकर्ताओं ने हरिद्वार के तीन अलग-अलग स्थानों से जल के नमूने एकत्र किए और उनकी जीनोम आधारित जांच की। इस अध्ययन में वायरस की 6,543 अलग-अलग प्रजातियों की पहचान की गई। शोध के निष्कर्षों से गंगाजल में मौजूद सूक्ष्मजीवों और उनकी विविधता को समझने के लिए नए वैज्ञानिक रास्ते खुल सकते हैं।
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की शोध टीम ने किया गंगाजल पर वैज्ञानिक अध्ययन.
दुनियाभर में करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों की आस्था गंगा नदी से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि गंगा की पवित्रता और जल की स्वच्छता बनाए रखने के लिए समय-समय पर विभिन्न प्रयास किए जाते हैं। धार्मिक महत्व के साथ-साथ गंगा का जल लंबे समय से वैज्ञानिकों के शोध का विषय भी रहा है।इसी कड़ी में हरिद्वार स्थित गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने गंगाजल का वैज्ञानिक अध्ययन किया। इस शोध दल में सुमित चंद, विजेता चौधरी, सागर विश्वकर्मा, रमेश चंद्र दुबे और हरीश चंद्र सहित अन्य संस्थानों के शोधकर्ता भी शामिल रहे।

शोध रिपोर्ट के अनुसार, गंगा में मौजूद बैक्टीरियोफेज की विविधता भविष्य में प्रदूषण की निगरानी, जल गुणवत्ता के प्रबंधन और एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बैक्टीरिया से मुकाबला करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि इस अध्ययन को गंगाजल के पीने योग्य होने का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।गंगा के जल में मौजूद वायरस और सूक्ष्मजीवों का अध्ययन करने के लिए शोधकर्ताओं ने हरिद्वार के तीन प्रमुख क्षेत्रों—दक्षेश्वर महादेव मंदिर, हरकी पैड़ी और चंडी देवी घाट—से पानी के नमूने एकत्र किए। इन स्थानों पर श्रद्धालुओं और अन्य लोगों की आवाजाही के कारण मानवीय गतिविधियां काफी अधिक रहती हैं।अध्ययन के दौरान तीनों स्थानों से समान मात्रा में पानी लेकर नमूनों को आपस में मिलाया गया। इसके बाद नमूने को माइनस 20 डिग्री सेल्सियस तापमान पर सुरक्षित रखा गया। शोधकर्ताओं ने आगे की जांच में डीएनए और आरएनए का विश्लेषण किया, ताकि गंगाजल में मौजूद विषाणुओं की विविधता को बेहतर ढंग से समझा जा सके।
गंगा नदी के जल में मौजूद सूक्ष्मजीवों और वायरस की पहचान करने के लिए शोधकर्ताओं ने मेटाजीनोमिक तकनीक का सहारा लिया। इस आधुनिक तकनीक की मदद से किसी एक वायरस या बैक्टीरिया को प्रयोगशाला में अलग-अलग विकसित करने के बजाय, पर्यावरण से लिए गए नमूने में मौजूद सभी आनुवंशिक पदार्थों का एक साथ विश्लेषण किया जाता है।अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं को कुल 5,49,515 सीक्वेंस रीड प्राप्त हुईं। सीक्वेंस रीड से आशय डीएनए या आरएनए में मौजूद न्यूक्लियोटाइड के क्रम से संबंधित उस डेटा से है, जिसे सीक्वेंसिंग मशीन रिकॉर्ड करती है। ये आंकड़े जल के नमूने में मौजूद वायरस के आनुवंशिक अंशों से जुड़े थे।रिपोर्ट के मुताबिक, नमूनों की सीक्वेंसिंग की गुणवत्ता और विश्लेषण की गहराई पर्याप्त थी। इसके आधार पर शोधकर्ता गंगा नदी के पानी में मौजूद विभिन्न वायरस प्रजातियों का अध्ययन और उनकी विविधता का आकलन कर सके।

गंगाजल में मिलीं वायरस की 6,543 प्रजातियां, अध्ययन में बैक्टीरियोफेज की विविधता भी उजागर.
गंगा नदी के तीन अलग-अलग क्षेत्रों से लिए गए पानी के नमूनों के वैज्ञानिक विश्लेषण में वायरस की 6,543 प्रजातियों की पहचान की गई। अध्ययन के दौरान वायरस के 17 अलग-अलग फाइला (वर्गीकरण की व्यापक श्रेणियां) भी चिह्नित किए गए। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें यूरोविरिकोटा (Uroviricota) श्रेणी के सबसे अधिक 3,575 सीक्वेंस रीड दर्ज किए गए।इसके अलावा, नेगार्नाविरिकोटा श्रेणी में 474, पिसुविरिकोटा में 460, आर्टवर्विरिकोटा में 361 और किट्रिनोविरिकोटा में 338 सीक्वेंस रीड मिले। वहीं, क्रेसड्नाविरिकोटा, सेलविरिकोटा, लेनारविरिकोटा और कोसाविरिकोटा जैसी अन्य श्रेणियों में इनकी संख्या लगभग 172 से 199 के बीच रही।
कॉडोविरिसीटीज़ वर्ग में बैक्टीरियोफेज की प्रमुख मौजूदगी.
अध्ययन में बैक्टीरियोफेज की विविधता भी सामने आई। ये ऐसे वायरस होते हैं जो बैक्टीरिया को संक्रमित करते हैं। रिपोर्ट में कॉडोविरिसीटीज़ (Caudoviricetes) वर्ग से संबंधित 3,575 सीक्वेंस रीड दर्ज किए गए। इसके अलावा, रेवट्राविरिसीटीज़ में 360, पिसोनिविरिसीटीज़ में 287, मोंजिविरिसीटीज़ में 237 और एलियोविरिसीटीज़ में 222 रीड मिले।इसी तरह, स्टेलपाविरिसीटीज़ में 135, पैपोवाविरिसीटीज़ में 124 तथा हरविविरिसीटीज़ और नाल्डाविरिसीटीज़ में 115-115 रीड दर्ज किए गए। वहीं, अल्सुविरिसीटीज़, हावेल्टोविरिसीटीज़ और रेपेन्सिविरिसीटीज़ समूहों में बैक्टीरियोफेज से संबंधित रीड की संख्या लगभग 151 से 214 के बीच बताई गई।शोध के ये निष्कर्ष गंगा के जल में मौजूद वायरस और बैक्टीरियोफेज की व्यापक विविधता को समझने में मदद कर सकते हैं। हालांकि, वायरस की मौजूदगी या उनकी विविधता के आधार पर गंगाजल को सीधे पीने योग्य नहीं माना जा सकता।

English
Dehradun: The Ganga is regarded as one of the holiest rivers in Sanatan Dharma, and its water holds immense religious significance. Beyond its spiritual importance, the river’s natural self-purification capacity has also attracted scientific attention. A recent study has revealed remarkable diversity among viruses and bacteriophages found in the Ganga.Researchers collected water samples from three different locations in Haridwar and conducted genome-based analyses. The study identified 6,543 distinct viral species. These findings could help scientists better understand the microbial diversity of the Ganga and the role of viruses in its aquatic ecosystem.
Gurukul Kangri University Research Team Conducts Scientific Study on Ganga Water.
The Ganga holds deep spiritual significance for millions of followers of Sanatan Dharma across the world. This is why various initiatives are undertaken to preserve the river’s sacred status and maintain the cleanliness of its water. Apart from its religious importance, the Ganga has also been the subject of numerous scientific studies.As part of these ongoing research efforts, scientists from Gurukul Kangri University in Haridwar conducted a scientific study of Ganga water. The research team included Sumit Chand, Vijeta Chaudhary, Sagar Vishwakarma, Ramesh Chandra Dubey and Harish Chandra, along with researchers from other institutions.
To investigate the viruses and microorganisms present in the river, researchers collected water samples from three locations in Haridwar: the Daksheshwar Mahadev Temple area, Har Ki Pauri and the Chandi Devi Ghat area. These locations experience substantial human activity throughout the day.Equal quantities of water were collected from all three sites and combined to prepare a sample for analysis. The sample was then preserved at minus 20 degrees Celsius. Researchers subsequently examined its DNA and RNA to gain a better understanding of the diversity of viruses present in the Ganga.
Researchers used metagenomic technology to identify microorganisms and viruses present in the water of the Ganga River. Unlike conventional methods, which involve isolating and growing a particular virus or bacterium in a laboratory, this technique examines the genetic material present in an environmental sample collectively.During the analysis, researchers obtained a total of 549,515 sequence reads. A sequence read refers to data recorded by a sequencing machine that represents the order of nucleotides in DNA or RNA. These reads were associated with genetic fragments of viruses found in the water samples.According to the report, the quality and depth of sequencing were sufficient to analyse the viral species present in the river water. This enabled researchers to examine the diversity of viruses detected in the Ganga and improve their understanding of its microscopic ecosystem.
6,543 Viral Species Identified in Ganga Water Samples, Study Reveals Diverse Bacteriophages.
Scientific analysis of water samples collected from three locations along the Ganga River identified 6,543 viral species. Researchers also classified the detected viruses into 17 different viral phyla. According to the report, the Uroviricota group recorded the highest number, with 3,575 sequence reads.Other groups included Negarnaviricota with 474 reads, Pisuviricota with 460, Artverviricota with 361 and Kitrinoviricota with 338 reads. Meanwhile, groups such as Cressdnaviricota, Sellaviricota, Lenarviricota and KosaVirocota reportedly recorded approximately 172 to 199 reads.
Caudoviricetes Emerges as a Major Group in Bacteriophage Findings.
The study also highlighted the diversity of bacteriophages, which are viruses that infect bacteria. The report recorded 3,575 sequence reads associated with the Caudoviricetes class. Other groups included Revtraviricetes with 360 reads, Pisoniviricetes with 287, Monjiviricetes with 237 and Ellioviricetes with 222 reads.Additionally, 135 reads were reported for Stellpaviricetes, 124 for Papovaviricetes, and 115 each for Herelleviricetes and Naldaviricetes. The Alsuviricetes, Huaveltoviricetes and Repen siviricetes groups reportedly had between approximately 151 and 214 bacteriophage-associated reads.These findings may help scientists better understand the diversity of viruses and bacteriophages present in the Ganga’s aquatic ecosystem. However, the detection of viral diversity alone does not establish that the river water is safe for drinking.
संस्कृति
देहरादूनम्: सनातनधर्मे गङ्गानदी अत्यन्तं पवित्रा मन्यते। गङ्गाजलस्य धार्मिकं महत्त्वम् अपि विशिष्टम् अस्ति। धार्मिकमहत्त्वस्य अतिरिक्तं गङ्गायाः स्वशुद्धीकरणक्षमता वैज्ञानिकानाम् अनुसन्धानस्य विषयः अस्ति। गङ्गानद्यां कृतेन नवीनवैज्ञानिकाध्ययनेन विषाणूनां तथा जीवाणुभक्षकविषाणूनां उल्लेखनीया विविधता प्रकाशिता।शोधकर्तारः हरिद्वारस्य त्रिभ्यः भिन्नस्थानेभ्यः जलनमूनानि संगृह्य तेषां जीनोमाधारितं परीक्षणम् अकुर्वन्। अस्मिन् अध्ययने विषाणूनां ६,५४३ भिन्नाः प्रजातयः चिह्निताः। एते निष्कर्षाः गङ्गाजले विद्यमानानां सूक्ष्मजीवानां विविधतां तथा जलीयपारिस्थितिकीतन्त्रे तेषां भूमिकां ज्ञातुं वैज्ञानिकानां साहाय्यं करिष्यन्ति।
गुरुकुलकाङ्गडीविश्वविद्यालयस्य अनुसन्धानदलेन गङ्गाजलस्य वैज्ञानिकाध्ययनं कृतम्.
विश्वस्य विभिन्नेषु भागेषु निवसतां कोटिशः सनातनधर्मावलम्बिनां श्रद्धा गङ्गानद्या सह सम्बद्धा अस्ति। अतः गङ्गायाः पवित्रतां जलस्य च स्वच्छतां संरक्षितुं समये समये विविधाः प्रयासाः क्रियन्ते। धार्मिकमहत्त्वस्य अतिरिक्तं गङ्गाजलं वैज्ञानिकानाम् अनुसन्धानस्य विषयः अपि अस्ति।अस्यामेव अनुसन्धानपरम्परायां हरिद्वारस्थस्य गुरुकुलकाङ्गडीविश्वविद्यालयस्य शोधकर्तृभिः गङ्गाजलस्य वैज्ञानिकमध्ययनं कृतम्। अस्मिन् शोधदले सुमितचन्दः, विजेताचौधरी, सागरविश्वकर्मा, रमेशचन्द्रदुबे तथा हरीशचन्द्रः इत्येतेषां सह अन्यसंस्थानानां शोधकर्तारः अपि सम्मिलिताः आसन्।
अनुसन्धानप्रतिवेदनानुसारं गङ्गायां विद्यमानानां जीवाणुभक्षकविषाणूनां विविधता भविष्ये प्रदूषणस्य निरीक्षणे, जलगुणवत्तायाः प्रबन्धने तथा प्रतिजैविकप्रतिरोधकजीवाणूनां नियन्त्रणे उपयोगिनी भवितुम् अर्हति। तथापि शोधकर्तारः स्पष्टं कृतवन्तः यत् अस्य अध्ययनस्य निष्कर्षाः गङ्गाजलं पेययोग्यम् अस्ति इति प्रमाणं न भवन्ति।गङ्गाजले विद्यमानानां विषाणूनां सूक्ष्मजीवानां च अध्ययनाय शोधकर्तारः हरिद्वारस्य त्रिभ्यः स्थानेभ्यः—दक्षेश्वरमहादेवमन्दिरक्षेत्रात्, हरकीपौडीतः तथा चण्डीदेवीघाटक्षेत्रात्—जलनमूनानि सङ्गृहीतवन्तः। एतेषु स्थानेषु श्रद्धालूनां जनानां च आवागमनं बहुलं भवति, अतः मानवीयाः गतिविधयः अपि अधिकाः सन्ति।अध्ययनकाले त्रिभ्यः स्थानेभ्यः समानमात्रायां जलं गृहीत्वा नमूनानि परस्परं मिश्रितानि। ततः नमूनं माइनस २० डिग्री सेल्सियस तापमाने सुरक्षितं स्थापितम्। अनन्तरं शोधकर्तारः डीएनए तथा आरएनए इत्यनयोः परीक्षणं कृतवन्तः, येन गङ्गाजले विद्यमानानां विषाणूनां विविधतां सम्यक् ज्ञातुं शक्यते।
गङ्गानद्याः जले विद्यमानानां सूक्ष्मजीवानां विषाणूनां च पहिचानाय शोधकर्तारः मेटाजीनोमिकप्रविधेः उपयोगं कृतवन्तः। अस्याः आधुनिकप्रविधेः विशेषता अस्ति यत् प्रयोगशालायाम् एकस्य विषाणोः अथवा जीवाणोः पृथक्करणं कृत्वा तस्य संवर्धनं कर्तुं स्थाने, पर्यावरणात् सङ्गृहीते नमूने विद्यमानानां सर्वेषाम् आनुवंशिकपदार्थानां एकत्र परीक्षणं क्रियते।अध्ययनस्य परीक्षणकाले शोधकर्तारः कुलम् ५,४९,५१५ आनुवंशिकक्रमपाठान् प्राप्तवन्तः। सीक्वेन्स् रीड इति डीएनए अथवा आरएनए मध्ये विद्यमानानां न्यूक्लियोटाइड्-घटकानां क्रमसम्बद्धं तत् दत्तांशं कथ्यते, यत् अनुक्रमणयन्त्रेण अभिलिख्यते। एते दत्तांशाः जलनमूने विद्यमानानां विषाणूनां आनुवंशिकांशैः सम्बद्धाः आसन्।प्रतिवेदनानुसारं, आनुवंशिकानुक्रमणस्य गुणवत्ता तथा विश्लेषणस्य गहनता पर्याप्ता आसीत्। तेन शोधकर्तारः गङ्गाजले विद्यमानानां विविधविषाणुप्रजातीनाम् अध्ययनं कर्तुं तासां विविधतायाः च आकलनं कर्तुं समर्थाः अभवन्।
गङ्गाजलस्य नमूनेषु ६,५४३ विषाणुप्रजातयः चिह्निताः, जीवाणुभक्षकविषाणूनां विविधता अपि प्रकाशिता
गङ्गानद्याः त्रिभ्यः विभिन्नस्थानेभ्यः सङ्गृहीतानां जलनमूनानां वैज्ञानिकपरीक्षणे ६,५४३ विषाणुप्रजातयः चिह्निताः। अध्ययनकाले विषाणूनां १७ भिन्नाः व्यापकवर्गाः अपि अभिज्ञाताः। प्रतिवेदनानुसारम्, यूरोविरिकोटा (Uroviricota) वर्गे सर्वाधिकाः ३,५७५ आनुवंशिकक्रमपाठाः प्राप्ताः।अन्येषु वर्गेषु नेगार्नाविरिकोटा-वर्गे ४७४, पिसुविरिकोटा-वर्गे ४६०, आर्टवर्विरिकोटा-वर्गे ३६१ तथा किट्रिनोविरिकोटा-वर्गे ३३८ क्रमपाठाः प्राप्ताः। क्रेसड्नाविरिकोटा, सेलविरिकोटा, लेनारविरिकोटा तथा कोसाविरिकोटा इत्यादिषु वर्गेषु क्रमपाठानां संख्या प्रायः १७२ तः १९९ पर्यन्तम् आसीत्।
कॉडोविरिसीटीज़-वर्गे जीवाणुभक्षकविषाणूनां विशेषा विविधता.
अध्ययने जीवाणुभक्षकविषाणूनां विविधता अपि प्रकाशिता। एते विषाणवः जीवाणून् संक्रमितुं शक्नुवन्ति। प्रतिवेदनानुसारं कॉडोविरिसीटीज़ (Caudoviricetes) वर्गसम्बद्धाः ३,५७५ आनुवंशिकक्रमपाठाः अभिलिखिताः। रेवट्राविरिसीटीज़-वर्गे ३६०, पिसोनिविरिसीटीज़-वर्गे २८७, मोंजिविरिसीटीज़-वर्गे २३७ तथा एलियोविरिसीटीज़-वर्गे २२२ क्रमपाठाः प्राप्ताः।तदतिरिक्तं स्टेलपाविरिसीटीज़-वर्गे १३५, पैपोवाविरिसीटीज़-वर्गे १२४ तथा हरविविरिसीटीज़-नाल्डाविरिसीटीज़-वर्गयोः प्रत्येकस्मिन् ११५ क्रमपाठाः अभिलिखिताः। अल्सुविरिसीटीज़, हावेल्टोविरिसीटीज़ तथा रेपेन्सिविरिसीटीज़ इत्येतेषु वर्गेषु जीवाणुभक्षकविषाणुसम्बद्धानां क्रमपाठानां संख्या प्रायः १५१ तः २१४ पर्यन्तम् आसीत्।एते अनुसन्धाननिष्कर्षाः गङ्गाजले विद्यमानानां विषाणूनां जीवाणुभक्षकविषाणूनां च विविधतां ज्ञातुं साहाय्यं कर्तुं शक्नुवन्ति। तथापि, केवलं विषाणूनां उपस्थित्या अथवा विविधतया गङ्गाजलं पेययोग्यम् इति निष्कर्षः न कर्तुं शक्यते।


