अफगानिस्तान के दुर्लभ लाजावर्त पत्थर से बनेगा देश का पहला नीला शिवलिंग, MP में आकार ले रहीं अनोखी शिव प्रतिमाएं.India’s First Blue Shivling to Be Crafted from Rare Afghan Lapis Lazuli, Unique Shiva Sculptures Taking Shape in MP. अफगानिस्तानस्य दुर्लभ-लाजावर्त-शिलया निर्मीयते भारतस्य प्रथमं नीलवर्णं शिवलिङ्गम्, मध्यप्रदेशे अद्भुताः शिवप्रतिमाः आकारं गृह्णन्ति।
अफगानिस्तान से लाए गए दुर्लभ लाजावर्त पत्थर से इस विशेष शिवलिंग को तराशा जाएगा। इसके लिए करीब 15 लाख रुपये कीमत वाले एकल पत्थर (सिंगल पीस) का इस्तेमाल किया जा रहा है।

अफगानिस्तान से आएगा 15 लाख रुपये का दुर्लभ लाजावर्त पत्थर.
ग्वालियर के रीजनल आर्ट एंड क्राफ्ट सेंटर में राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा इस अनूठे शिवलिंग को आकार दे रहे हैं। इसके निर्माण के लिए अफगानिस्तान से लाजावर्त यानी लैपिस लाजुली का विशाल एकल शिलाखंड मंगाया जा रहा है।
जानकारी के मुताबिक, लाजावर्त का यह विशाल शिलाखंड करीब 5×5 फीट आकार का होगा, जिसकी अनुमानित कीमत लगभग 15 लाख रुपये है। अपने गहरे नीले रंग, सुनहरी चमक और दुर्लभ उपलब्धता के चलते लाजावर्त को दुनियाभर में बेहद मूल्यवान और खास पत्थर माना जाता है। बताया जा रहा है कि यह शिलाखंड जल्द ही ग्वालियर पहुंच सकता है।
पांच देशों से मंगाए गए खास पत्थरों से तैयार होंगी 70 भव्य प्रतिमाएं.
यह परियोजना सिर्फ शिवलिंग के निर्माण तक सीमित नहीं है। मंदिर परिसर के लिए कुल 70 प्रतिमाएं तैयार की जानी हैं, जिनमें से 60 प्रतिमाओं का निर्माण ग्वालियर में किया जाएगा। इन मूर्तियों के लिए भारत के साथ अफगानिस्तान, ब्राजील, सूडान और वियतनाम से चुनिंदा पत्थर मंगाए जा रहे हैं। भगवान गणेश की प्रतिमा सूडान के हरे मर्गज स्टोन, भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा वियतनाम के ब्लैक मार्बल, नंदी की प्रतिमा जैसलमेर के गोल्डन स्टोन और माता पार्वती की प्रतिमा मकराना के सफेद संगमरमर से तैयार की जाएगी।
बाली के अनोखे शिवलिंग से मिली प्रेरणा, उसी तर्ज पर तैयार होगा भव्य शिवलिंग.
इस अनोखे शिवलिंग का स्वरूप इंडोनेशिया के बाली द्वीप स्थित एक संग्रहालय में स्थापित सैंडस्टोन शिवलिंग से प्रेरित है। प्रस्तावित मंदिर का नाम ‘वंशवृद्धि महादेव मंदिर’ रखा गया है। मान्यता के अनुसार, मंदिर में स्थापित होने वाला शिवलिंग संतान प्राप्ति और वंशवृद्धि की आस्था का केंद्र रहेगा। वहीं, लाजावर्त पत्थर का इस्तेमाल प्राचीन समय से ही आभूषणों और चित्रकला में किया जाता रहा है।
English
This unique Shivling will be carved from a rare Lapis Lazuli stone sourced from Afghanistan. The sculpture will be crafted from a single piece of stone valued at around ₹15 lakh.
Rare Lapis Lazuli Stone Worth ₹15 Lakh to Arrive from Afghanistan.
National Award-winning sculptor Deepak Vishwakarma is giving shape to this unique Shivling at the Regional Art and Craft Centre in Gwalior. A massive single-piece block of Lapis Lazuli, also known as Lazavart, is being brought from Afghanistan for its creation.
According to the information available, the massive Lapis Lazuli stone is expected to measure around 5×5 feet and is estimated to be worth approximately ₹15 lakh. Known for its deep blue colour, golden shimmer and rarity, Lapis Lazuli holds significant value and importance worldwide. The stone is expected to reach Gwalior soon.
70 Grand Sculptures to Be Crafted from Special Stones Sourced from Five Countries.
The project goes far beyond the creation of the Shivling. A total of 70 idols are planned for the temple, with 60 of them being crafted in Gwalior. Special stones are being sourced from five countries—India, Afghanistan, Brazil, Sudan and Vietnam. Lord Ganesha’s idol will be carved from green Margaj stone from Sudan, Lord Kartikeya’s from black marble from Vietnam, Nandi from Jaisalmer’s golden stone, and Goddess Parvati’s idol from white Makrana marble.
Inspired by Bali’s Unique Shivling, a Grand Shivling to Be Crafted Along the Same Lines.
The design of this unique Shivling draws inspiration from a sandstone Shivling displayed at a museum on Indonesia’s Bali Island. The proposed temple has been named ‘Vanshvriddhi Mahadev Temple’. According to the belief associated with the temple, the Shivling will become a symbol of faith in fertility and the continuation of the family lineage. Lapis Lazuli, meanwhile, has been used since ancient times in jewellery and painting.
संस्कृत
अफगानिस्तानतः आनीतया दुर्लभया लाजावर्त-शिलया अस्य विशिष्टस्य शिवलिङ्गस्य निर्माणं भविष्यति। अस्य कृते प्रायः पञ्चदश-लक्ष-रूप्यकमूल्यस्य एकखण्ड-शिलायाः उपयोगः क्रियते।
अफगानिस्तानतः आगमिष्यति पञ्चदशलक्षरूप्यकमूल्यः दुर्लभः लाजावर्तः शिलाखण्डः।
ग्वालियर-स्थिते क्षेत्रीय-कला-शिल्प-केन्द्रे राष्ट्रिय-पुरस्कारप्राप्तः मूर्तिकारः दीपकः विश्वकर्मा अस्य अद्वितीयस्य शिवलिङ्गस्य स्वरूपं निर्माति। अस्य निर्माणार्थम् अफगानिस्तानतः लाजावर्तस्य अर्थात् लैपिस्-लाजुली-शिलायाः विशालः एकखण्डः शिलाखण्डः आनीयते।
प्राप्तविवरणानुसार, अयं विशालः लाजावर्त-शिलाखण्डः प्रायः ५×५ पाद-परिमितः भविष्यति तथा अस्य मूल्यं प्रायः पञ्चदशलक्ष-रूप्यकाणि कथ्यते। गाढनीलवर्णः, सुवर्णाभा तथा दुर्लभता च अस्य प्रमुखाः विशेषताः सन्ति, अतः अयं शिलाखण्डः विश्वे विशेषमहत्त्वं धारयति। अयं शिलाखण्डः शीघ्रमेव ग्वालियरं प्राप्स्यति इति अपेक्षा अस्ति।
पञ्चदेशेभ्यः आनीताभिः विशिष्टाभिः शिलाभिः निर्मास्यन्ते सप्ततिः भव्याः प्रतिमाः।
इदं प्रकल्पं केवलं शिवलिङ्गनिर्माणे एव सीमितं नास्ति। देवालयस्य कृते सप्ततिः प्रतिमाः निर्मास्यन्ते, तासु षष्टिः प्रतिमाः ग्वालियर-नगरे निर्मीयन्ते। एतासां प्रतिमानां निर्माणार्थं भारतम्, अफगानिस्तानम्, ब्राजीलदेशः, सूडानदेशः तथा वियतनामदेशः इत्येतेभ्यः पञ्चदेशेभ्यः विशिष्टाः शिलाः आनीयन्ते। श्रीगणेशस्य प्रतिमा सूडानदेशीयेन हरित-मर्गज-शिलाखण्डेन, श्रीकार्तिकेयस्य प्रतिमा वियतनामदेशीयेन कृष्ण-संगमर्मरेण, नन्दिनः प्रतिमा जैसलमेरस्य सुवर्णवर्णीय-शिलया, माता पार्वत्याः प्रतिमा च मकरानादेशीयेन श्वेत-संगमर्मरेण निर्मास्यते।
बालीदेशस्य अद्वितीय-शिवलिङ्गात् प्रेरणां प्राप्य निर्मास्यते भव्यं शिवलिङ्गम्।
अस्य विशिष्टस्य शिवलिङ्गस्य स्वरूपं इण्डोनेशियादेशस्य बालीद्वीपे स्थिते संग्रहालये प्रतिष्ठितेन बलुआ-पाषाण-शिवलिङ्गेन प्रेरितम् अस्ति। अस्य देवालयस्य नाम ‘वंशवृद्धि महादेव मन्दिरम्’ इति निर्धारितम् अस्ति। मान्यतानुसारं अत्र प्रतिष्ठापितं शिवलिङ्गं सन्तानप्राप्तेः वंशवृद्धेश्च श्रद्धायाः केन्द्रं भविष्यति। लाजावर्त-शिलायाः उपयोगः च प्राचीनकालादेव आभूषणनिर्माणे चित्रकलायां च क्रियते।


