छत्तीसगढ़ की महिला किसान ने रचा सफलता का नया इतिहास, महज 15 पौधों से तैयार किया लाल चंदन का विशाल संसार, अब देश-विदेश में बढ़ी मांग। Chhattisgarh Woman Farmer Creates a Red Sandalwood Success Story from Just 15 Saplings, Demand Now Grows Across India and Abroad। छत्तीसगढस्य महिला-कृषिका केवलं पञ्चदश-रक्तचन्दन-रोपणैः सफलतायाः विशालं संसारं निर्मितवती, अधुना तस्य देशे विदेशेषु च महती मागणी अस्ति।

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बस्तर की प्रगतिशील महिला किसान प्रभाती भारत ने लाल चंदन की खेती और जैविक कृषि को अपनाकर सफलता का ऐसा प्रेरणादायक मॉडल तैयार किया है, जो आज पूरे छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए नई राह और मिसाल बन रहा है।

बस्तरस्य सुता प्रभाती भारतः जैविककृषेः अभियानस्य माध्यमेन अनेकाः महिलाः कृषिकार्ये सहभागितायै प्रेरितवती।

बस्तर की प्रगतिशील महिला किसान प्रभाती भारत ने लाल चंदन की खेती और जैविक कृषि के क्षेत्र में सफलता का एक ऐसा अनूठा मॉडल तैयार किया है, जो आज पूरे छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत बन गया है। जगदलपुर से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित गारावंड खुर्द गांव की निवासी प्रभाती ने करीब 16 वर्ष पहले केवल 15 लाल चंदन के पौधों के साथ इस सफर की शुरुआत की थी।

आज प्रभाती भारत के खेत में लगभग 200 लाल चंदन के वृक्ष लहलहा रहे हैं। उनके निरंतर प्रयासों से बस्तर क्षेत्र में लाल चंदन के संरक्षण और पौधरोपण का अभियान भी लगातार विस्तार पा रहा है। प्रभाती ने वर्ष 2010 के आसपास भुवनेश्वर से लाल चंदन के पौधे मंगवाकर अपने खेत में रोपित किए थे। इसके बाद वन विभाग से भी उन्हें कुछ पौधे उपलब्ध कराए गए, जिससे उनके इस अनूठे प्रयास को और मजबूती मिली।

प्रभाती भारत ने अपने प्रयासों को केवल खेतों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि कई सार्वजनिक स्थानों पर भी लाल चंदन के पौधों का रोपण कराकर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की।

वर्षों की मेहनत, निरंतर संरक्षण, नियमित देखभाल और जैविक खेती की पद्धतियों के सकारात्मक परिणाम आज साफ दिखाई दे रहे हैं। प्रभाती भारत का खेत अब लाल चंदन के हरे-भरे वृक्षों से आच्छादित हो चुका है। उन्होंने अपने इस अभियान को खेत तक सीमित नहीं रखा, बल्कि बालाजी मंदिर, मां दंतेश्वरी मंदिर, शिव मंदिर समेत कई सार्वजनिक स्थलों पर भी लाल चंदन के पौधों का रोपण कराकर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उल्लेखनीय पहल की है।

प्रभाती भारत ने गांव की महिलाओं को एकजुट कर जैविक खेती की एक नई पहल शुरू की। उन्होंने खेतों में मजदूरी करने वाली महिलाओं को प्राकृतिक खेती की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया और उन्हें रासायनिक खेती छोड़कर जैविक पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित किया। उनके निरंतर प्रयासों का परिणाम है कि आज गारावंड खुर्द बस्तर के उन चुनिंदा गांवों में गिना जाता है, जहां बड़ी संख्या में किसान संकर बीजों के बिना पारंपरिक और जैविक खेती को सफलतापूर्वक अपना रहे हैं।

450 से ज्यादा दुर्लभ और पारंपरिक किस्मों को सहेजकर रखा

प्रभाती भारत ने 450 से अधिक दुर्लभ और विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी देशी धान की किस्मों को संरक्षित कर एक समृद्ध बीज बैंक तैयार किया है। वे बस्तर संभाग की पहली महिला किसान हैं, जिन्होंने बड़े स्तर पर ब्लैक राइस (काला चावल) और रेड राइस (लाल चावल) की व्यावसायिक खेती को अपनाया। उनके शुगर-फ्री लाल चावल और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर काले चावल की बढ़ती मांग अब देश की सीमाओं को पार कर विदेशों तक पहुंच चुकी है।

प्रभाती की सफलता में परिवार का सहयोग भी बना मजबूत आधार

प्रभाती भारत की उल्लेखनीय सफलता में उनके परिवार का सहयोग भी एक मजबूत आधार रहा है। उनके पति विजय भारत वनौषधीय पौधों के विशेषज्ञ हैं, जबकि उनके ससुर स्वर्गीय विशाल भारत वन विभाग में रेंजर के पद पर कार्यरत रहे। प्रभाती ने औषधीय पादप बोर्ड से विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करने के साथ ही ग्रामीण वनस्पति विशेषज्ञ का पाठ्यक्रम भी पूरा किया है। वर्तमान में वे विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही दुर्लभ वनस्पतियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए निरंतर कार्य कर रही हैं।

किसानों की आय बढ़ाने के लिए लाल चंदन की खेती बन सकती है लाभकारी विकल्प

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बस्तर की अनुकूल जलवायु लाल चंदन की खेती के लिए काफी उपयुक्त है। इंदिरा गांधी कृषि महाविद्यालय के वैज्ञानिक दीपक शर्मा के अनुसार, प्रदेश के वन क्षेत्रों के साथ-साथ खेतों की मेड़ों पर लाल चंदन का रोपण किसानों की आय बढ़ाने का एक लाभकारी और दीर्घकालिक विकल्प बन सकता है। हालांकि लाल चंदन के वृक्षों को पूर्ण रूप से विकसित होने में लगभग 15 से 20 वर्ष का समय लगता है, लेकिन परिपक्व होने के बाद इसकी बहुमूल्य लकड़ी और तेल बाजार में ऊंची कीमत प्राप्त कर सकते हैं।

English

Prabhati Bharat, a progressive woman farmer from Bastar, has developed an inspiring model of red sandalwood cultivation and organic farming, setting a new benchmark for farmers across Chhattisgarh.

Prabhati Bharat, a progressive woman farmer from Bastar, has developed a unique and successful model in red sandalwood cultivation and organic farming, which has now become a source of inspiration and guidance for farmers across Chhattisgarh. A resident of Garawand Khurd village, located around 10 kilometres from Jagdalpur, Prabhati began her journey nearly 16 years ago with just 15 red sandalwood saplings.

Today, nearly 200 red sandalwood trees are thriving on Prabhati Bharat’s farm. Her sustained efforts have also helped expand the movement for the conservation and plantation of red sandalwood across the Bastar region. Around 2010, Prabhati brought red sandalwood saplings from Bhubaneswar and planted them on her farm. Later, she also received a few saplings from the Forest Department, further strengthening her unique initiative.

Prabhati Bharat did not limit her efforts to her farmland; she also promoted the plantation of red sandalwood saplings at several public places, making a significant contribution to environmental conservation.

Years of dedicated effort, continuous protection, regular care, and the adoption of organic farming practices have now yielded remarkable results. Prabhati Bharat’s farm is today covered with lush green red sandalwood trees. She has expanded her initiative beyond her farmland by promoting the plantation of red sandalwood saplings at Balaji Temple, Maa Danteshwari Temple, Shiva Temple, and several other public places, making a notable contribution to environmental conservation.

Prabhati Bharat brought together women from her village and launched a new campaign to promote organic farming. She trained women working as farm labourers in natural farming techniques and encouraged them to move away from chemical-based cultivation and adopt organic methods. As a result of her sustained efforts, Garawand Khurd is now counted among the select villages of Bastar where a large number of farmers are successfully practising traditional and organic farming without relying on hybrid seeds.

Preserved and Conserved More Than 450 Rare and Traditional Varieties।

Prabhati Bharat has preserved more than 450 rare and endangered indigenous varieties of paddy and developed a rich seed bank. She is the first woman farmer in the Bastar division to take up large-scale commercial cultivation of black rice and red rice. The growing demand for her sugar-free red rice and antioxidant-rich black rice has now reached markets across India and abroad.

Family Support Played a Key Role in Prabhati’s Success

Prabhati Bharat’s remarkable success has been strongly supported by her family. Her husband, Vijay Bharat, is an expert in medicinal plants, while her late father-in-law, Vishal Bharat, served as a ranger in the Forest Department. Prabhati has received specialised training from the Medicinal Plants Board and has also completed a course in rural botanical expertise. She is currently working continuously towards the conservation and propagation of rare plant species facing the threat of extinction.

Red Sandalwood Cultivation Can Be a Profitable Option to Increase Farmers’ Income

Agricultural experts believe that Bastar’s favourable climate is well suited for red sandalwood cultivation. According to Deepak Sharma, a scientist at Indira Gandhi Agricultural College, planting red sandalwood in forest areas and along farm boundaries could become a profitable long-term option for increasing farmers’ income. Although red sandalwood trees take around 15 to 20 years to mature, their valuable wood and oil can command high prices in the market once fully developed.

संस्कृत:

बस्तरस्य प्रगतिशीला महिला-कृषिका प्रभाती भारतः रक्तचन्दनस्य कृषिं जैविककृषिं च अवलम्ब्य सफलतायाः एतादृशं प्रेरणादायकं प्रतिमानं निर्मितवती, यत् अद्य समग्रस्य छत्तीसगढ-प्रदेशस्य कृषकाणां कृते नवीनमार्गदर्शकं आदर्शं च जातम्।

बस्तरस्य प्रगतिशीला महिला-कृषिका प्रभाती भारतः रक्तचन्दनस्य कृषौ जैविककृषेः क्षेत्रे च सफलतायाः अद्वितीयं प्रतिमानं विकसितवती, यत् अद्य समग्रस्य छत्तीसगढ-प्रदेशस्य कृषकाणां कृते प्रेरणायाः मार्गदर्शनस्य च स्रोतः अभवत्। जगदलपुरनगरात् प्रायः दश किलोमीटर-दूरे स्थितस्य गारावण्ड-खुर्द-ग्रामस्य निवासिनी प्रभाती षोडशवर्षेभ्यः पूर्वं केवलं पञ्चदश रक्तचन्दन-रोपकैः स्वस्य यात्रायाः आरम्भम् अकरोत्।

अद्य प्रभाती भारतस्य कृषिक्षेत्रं प्रायः द्विशतं रक्तचन्दनवृक्षैः समृद्धम् अस्ति। तस्याः निरन्तरप्रयासैः बस्तरप्रदेशे रक्तचन्दनस्य संरक्षणस्य वृक्षारोपणस्य च अभियानं निरन्तरं विस्तृतं भवति। प्रभाती प्रायः २०१० तमे वर्षे भुवनेश्वरनगरात् रक्तचन्दनस्य रोपकान् आनीय स्वकृषिक्षेत्रे रोपितवती। अनन्तरं वनविभागादपि तस्यै केचन रोपकाः प्राप्ताः, येन तस्याः अद्वितीयः प्रयासः अधिकं सुदृढः अभवत्।

प्रभाती भारतः स्वप्रयत्नान् केवलं कृषिक्षेत्रपर्यन्तं न सीमितवती, अपितु अनेकसार्वजनिकस्थलेषु अपि रक्तचन्दनस्य रोपणं कारयित्वा पर्यावरणसंरक्षणस्य दिशि महत्त्वपूर्णां पहलाम् अकरोत्।

वर्षाणां परिश्रमस्य, निरन्तरसंरक्षणस्य, नियमितपरिचर्यायाः जैविककृषिपद्धतेः च परिणामः अद्य स्पष्टतया दृश्यते। प्रभाती भारतस्य कृषिक्षेत्रम् अधुना हरितैः रक्तचन्दनवृक्षैः समाच्छादितम् अभवत्। सा स्वस्य अभियानं केवलं कृषिक्षेत्रपर्यन्तं न सीमितवती, अपितु बालाजी-मन्दिरे, माता-दन्तेश्वरी-मन्दिरे, शिवमन्दिरे तथा अन्येषु बहुषु सार्वजनिकस्थलेषु अपि रक्तचन्दनरोपणं कारयित्वा पर्यावरणसंरक्षणस्य दिशि उल्लेखनीयम् उपक्रमम् अकरोत्।

प्रभाती भारतः ग्रामस्य महिलाः एकत्रीकृत्य जैविककृषेः नवीनम् अभियानम् आरब्धवती। सा कृषिक्षेत्रेषु श्रमिकरूपेण कार्यं कुर्वतीभ्यः महिलाभ्यः प्राकृतिककृषेः विधीनां प्रशिक्षणं दत्त्वा ताः रासायनिककृषेः परित्यागाय जैविककृषिपद्धतीनां स्वीकाराय च प्रेरितवती। तस्याः निरन्तरप्रयत्नानां फलस्वरूपम् अद्य गारावण्ड-खुर्दग्रामः बस्तरप्रदेशस्य तेषु विशिष्टग्रामेषु गणितः अस्ति, यत्र बहवः कृषकाः संकरबीजानाम् उपयोगं विना पारम्परिकां जैविककृषिं च सफलतया कुर्वन्ति।

४५० तः अधिकानां दुर्लभ-पारम्परिक-प्रजातीनां संरक्षणं कृतम्।

प्रभाती भारतः ४५० तः अधिकानां दुर्लभानां विलुप्तिप्रायाणां च देशीयधान्यप्रजातीनां संरक्षणं कृत्वा समृद्धं बीजबैङ्कं निर्मितवती। सा बस्तरसम्भागस्य प्रथमा महिला-कृषिका अस्ति, या बृहद्-स्तरे कृष्णतण्डुलस्य (ब्लैक राइस) रक्ततण्डुलस्य (रेड राइस) च व्यावसायिककृषिम् आरब्धवती। तस्याः शर्करारहितस्य रक्ततण्डुलस्य तथा प्रति-ऑक्सीकारक-तत्त्वैः समृद्धस्य कृष्णतण्डुलस्य च वर्धमाना मागणी अधुना देशसीमाः अतिक्रम्य विदेशेष्वपि प्राप्नोति।

प्रभाती भारतस्याः सफलतायां परिवारस्य सहयोगोऽपि महत्त्वपूर्णं योगदानम् अकरोत्।

कृषिविशेषज्ञाः मन्यन्ते यत् बस्तरप्रदेशस्य अनुकूलं जलवायुमण्डलं रक्तचन्दनस्य कृषये अत्यन्तम् उपयुक्तम् अस्ति। इन्दिरागान्धी-कृषिमहाविद्यालयस्य वैज्ञानिकस्य दीपकशर्मणः मतानुसारं प्रदेशस्य वनक्षेत्रेषु कृषिक्षेत्राणां सीमासु च रक्तचन्दनस्य रोपणं कृषकाणाम् आयवृद्धये लाभप्रदः दीर्घकालिकः विकल्पः भवितुं शक्नोति। यद्यपि रक्तचन्दनवृक्षस्य पूर्णविकासाय प्रायः पञ्चदशतः विंशतिवर्षाणि आवश्यकानि भवन्ति, तथापि परिपक्वतां प्राप्तस्य तस्य बहुमूल्या काष्ठसामग्री तैलं च विपण्यां उच्चं मूल्यं प्राप्नुतः।

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