जन्माष्टमी पर सजेगा श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, भक्ति में डूबेंगे श्रद्धालु। Shri Krishna Janmashtami Celebration to Be Held, Devotees to Immerse Themselves in Devotion. जन्माष्टम्यां सज्जितः भविष्यति श्रीकृष्णजन्मोत्सवः, भक्ताः भक्तिरसे निमज्जिष्यन्ति।

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धार्मिक ग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी के व्रत को विशेष महत्व दिया गया है। स्कन्दपुराण के अनुसार, जो व्यक्ति जानबूझकर कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत नहीं करता, उसे गंभीर धार्मिक दोष का भागी बताया गया है। वहीं, ब्रह्मपुराण में उल्लेख मिलता है कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को देवकी के पुत्र भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ था।

शास्त्रों के अनुसार, यदि दिन या रात में थोड़े समय के लिए भी रोहिणी नक्षत्र का संयोग हो, तो विशेष रूप से चंद्रमा से युक्त रात्रि में जन्माष्टमी व्रत करना श्रेष्ठ माना गया है। भविष्यपुराण में भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत की महिमा का वर्णन करते हुए इसे न करने वाले व्यक्ति के लिए कठोर फल का उल्लेख किया गया है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, जन्माष्टमी पर मुख्य रूप से अष्टमी तिथि में उपवास करने का विधान है। जब यही अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त होती है, तो इसे ‘जयंती’ कहा जाता है। वह्निपुराण में भी कहा गया है कि कृष्ण पक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला के लिए भी रोहिणी नक्षत्र विद्यमान हो, तो वह तिथि ‘जयंती’ कहलाती है। इसलिए ऐसी स्थिति में श्रद्धालुओं को विशेष प्रयासपूर्वक व्रत और भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करनी चाहिए।

(पूर्ण विधि)

व्रत से पहले हल्का भोजन और संयम का पालन जरूरी।

व्रत की तैयारी एक दिन पहले से ही शुरू हो जाती है। व्रत की पूर्व रात्रि में श्रद्धालुओं को हल्का भोजन करने और ब्रह्मचर्य का पालन करने की सलाह दी जाती है। व्रत वाले दिन सुबह स्नान आदि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर पूजा की तैयारी करनी चाहिए। इसके बाद सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्पाल, भूमि, आकाश, खेचर, अमर तथा ब्रह्मा आदि देव शक्तियों को नमन कर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। तत्पश्चात जल, फल, कुश और गंध हाथ में लेकर विधिपूर्वक व्रत का संकल्प किया जाता है ।

” ममाखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये “

अब मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए ‘सूतिकागृह’ नियत करें। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। मूर्ति में बालक श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किए हों अथवा ऐसे भाव हो। इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें। पूजन में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इन सबका नाम क्रमशः निर्दिष्ट करना चाहिए।

फिर निम्न मंत्र से पुष्पांजलि अर्पण करें-

‘प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामनः।

वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नमः।

सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तु ते।

‘अंत में प्रसाद वितरण कर भजन-कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करें।

(उद्देश्य)

जो व्यक्ति जन्माष्टमी के व्रत को करता है, वह ऐश्वर्य और मुक्ति को प्राप्त करता है। आयु, कीर्ति, यश, लाभ, पुत्र व पौत्र को प्राप्त कर इसी जन्म में सभी प्रकार के सुखों को भोग कर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है। जो मनुष्य भक्तिभाव से श्रीकृष्ण की कथा को सुनते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। वे उत्तम गति को प्राप्त करते हैं।

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की कथा।

  • कंस का अत्याचार: मथुरा के राजा कंस के अत्याचार बढ़ गए थे। उसने अपनी बहन देवकी और उसके पति वासुदेव को कारागार में बंद कर दिया था।
  • आकाशवाणी: आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवां पुत्र कंस का वध करेगा। इससे बचने के लिए कंस ने देवकी की सातों संतानों को जन्म लेते ही मार दिया।
  • आठवें अवतार का प्रकट होना: जब आठवां पुत्र होने वाला था, तब कारागार में कड़े पहरे थे। भाद्रपद अष्टमी की घनघोर अंधेरी रात में भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ।
  • वासुदेव द्वारा गोकुल प्रस्थान: वासुदेवजी को आकाशवाणी और भगवान के निर्देश से पता चला कि नंदगांव में यशोदा के यहाँ कन्या (माया) जन्मी है।
  • चमत्कार: पहरेदार सो गए, कारागृह के दरवाजे खुल गए और उफनती यमुना ने वासुदेवजी को पार जाने का मार्ग दिया।
  • गोकुल में आदान-प्रदान: वासुदेवजी ने कान्हा को नंद बाबा के घर सुरक्षित सुलाया और वहां की कन्या को लेकर मथुरा लौट आए। इसके बाद कंस का अंत हुआ और पृथ्वी पर धर्म की स्थापना हुई।

( English)

Hindu scriptures attach great religious significance to the observance of the Krishna Janmashtami fast. According to the Skanda Purana, a person who knowingly refrains from observing the Janmashtami fast is said to incur serious religious consequences. The Brahma Purana states that Lord Krishna, the son of Devaki, manifested on the Ashtami Tithi of the Krishna Paksha during the month of Bhadrapada in the Kali Yuga.

According to scriptural traditions, if the Rohini Nakshatra is present even for a brief period during the day or night, the Janmashtami fast is considered particularly auspicious when observed during the night associated with the Moon. The Bhavishya Purana also describes the religious importance of observing the Krishna Janmashtami fast and mentions severe consequences for those who deliberately fail to observe it.

Scriptures prescribe fasting primarily on the Ashtami Tithi of Janmashtami. When the Ashtami Tithi coincides with the Rohini Nakshatra, it is known as ‘Jayanti’. The Vahni Purana further states that even a brief presence of the Rohini Nakshatra during Krishna Paksha Janmashtami gives the occasion the designation ‘Jayanti’. Therefore, devotees are encouraged to observe the fast with special devotion and worship Lord Krishna on such an occasion.

(Complete Procedure)

Light Meal and Self-Discipline Advised Before the Fast.

Preparation for the fast begins from the previous night. Devotees are advised to have a light meal and observe celibacy on the night before the fast. On the fasting day, one should complete the morning bath and other daily rituals before beginning the worship. Thereafter, prayers should be offered to the Sun, Moon, Yama, Time, transitional forces, elemental beings, Wind, guardians of the directions, Earth, Sky, celestial beings, immortals and Lord Brahma. The devotee should then sit facing east or north and formally take the vow of the fast with water, fruits, kusha grass and sandalwood fragrance in hand.

“For the removal of all my sins and for the fulfillment of all my cherished wishes”

“I hereby undertake the sacred fast (vrata) of Shri Krishna Janmashtami.”

Now, at noon, take a bath with water containing black sesame seeds and designate a ‘Sutikagriha’ (birth chamber) for Mother Devaki. Thereafter, install an idol or picture of Lord Shri Krishna. The idol should depict Mother Devaki breastfeeding infant Shri Krishna, with Goddess Lakshmi touching her feet, or expressing such a devotional sentiment. After this, perform the worship according to the prescribed rituals. During the worship, the names of Devaki, Vasudeva, Baladeva, Nanda, Yashoda and Lakshmi should be mentioned respectively in the prescribed order.

Then offer flowers with the following mantra- ‘Praname Deva Janani Tvaya Jatastu Vamanah. Vasudevat Tatha Krishno Namastubhyam Namo Namah. Suputrarghyam Pradattam Me Grihanemam Namo’stu Te.’Finally, distribute the prasad and observe a night vigil while singing devotional hymns and performing kirtan.

Then offer flowers with the following mantra.

Praname Deva Janani Tvaya Jatastu Vamanah.

“Vasudevat Tatha Krishno Namastubhyam Namo Namah.

“Suputrarghyam Pradattam Me Grihanemam Namo’stu Te.’

Finally, distribute the prasad and observe a night vigil while singing devotional hymns and performing kirtan.

(Purpose)

The Story of Lord Shri Krishna’s Birth Celebration.

  • Kansa’s Tyranny: The atrocities of Kansa, the king of Mathura, had increased. He had imprisoned his sister Devaki and her husband Vasudeva.
  • The Appearance of the Eighth Incarnation: When the eighth child was about to be born, the prison was under strict security. On the dark and stormy night of Bhadrapada Ashtami, Lord Shri Krishna manifested.
  • Vasudeva’s Departure for Gokul: Vasudeva learned through the divine voice from the heavens and the Lord’s instructions that a girl child (Maya) had been born to Yashoda in Nandgaon.
  • Miracle: The guards fell asleep, the doors of the prison opened, and the surging Yamuna provided Vasudeva with a path to cross the river.
  • Exchange in Gokul: Vasudeva safely laid Kanhā to rest at Nanda Baba’s house and returned to Mathura with the girl child from there. After this, Kansa was vanquished and righteousness was established on Earth.

(संस्कृत)

धार्मिकग्रन्थेषु श्रीकृष्णजन्माष्टम्याः व्रतस्य विशेषं महत्त्वं प्रतिपादितम् अस्ति। स्कन्दपुराणानुसारं यः मनुष्यः जानन्नपि श्रीकृष्णजन्माष्टम्याः व्रतं न करोति, सः गम्भीरं धार्मिकदोषं प्राप्नोति इति कथितम् अस्ति। ब्रह्मपुराणे वर्णितं यत् कलियुगे भाद्रपदमासस्य कृष्णपक्षस्य अष्टमीतिथौ देवक्याः पुत्रः भगवान् श्रीकृष्णः प्रादुरभवत्।

शास्त्रानुसारं यदि दिवसे वा रात्रौ वा कलामात्रमपि रोहिणीनक्षत्रस्य संयोगः भवति, तर्हि विशेषतः चन्द्रसम्बन्धिन्यां रात्रौ जन्माष्टमीव्रतस्य आचरणं श्रेष्ठं मन्यते। भविष्यपुराणेऽपि श्रीकृष्णजन्माष्टम्याः व्रतस्य महत्त्वं वर्णितम् अस्ति तथा व्रतस्य अनुष्ठानं न कुर्वतः जनस्य कृते कठोरफलस्य उल्लेखः कृतः अस्ति।

शास्त्रेषु जन्माष्टम्यां मुख्यतया अष्टमीतिथौ उपवासस्य विधानं निर्दिष्टम् अस्ति। यदा अष्टमीतिथिः रोहिणीनक्षत्रेण युता भवति, तदा सा ‘जयन्ती’ इति कथ्यते। वह्निपुराणेऽपि उक्तं यत् कृष्णपक्षस्य जन्माष्टम्यां कलामात्रमपि यदि रोहिणीनक्षत्रं भवति, तर्हि सा तिथिः ‘जयन्ती’ इति संज्ञां प्राप्नोति। अतः तादृशे शुभसमये श्रद्धालुभिः विशेषप्रयत्नेन व्रतमाचरित्वा भगवान् श्रीकृष्णस्य पूजनं करणीयम्।

(सम्पूर्णविधिः)

व्रतस्य पूर्वरात्रौ लघुभोजनं संयमपालनं च।

व्रतस्य पूर्वरात्रौ व्रतधारिभिः लघुभोजनं कर्तव्यं तथा ब्रह्मचर्यस्य पालनं करणीयम्। व्रतदिने प्रातःकाले स्नानादिनित्यकर्माणि समाप्य पूजाविधेः प्रारम्भः करणीयः। ततः सूर्यं, सोमं, यमं, कालं, सन्धिं, भूतानि, पवनं, दिक्पतीन्, भूमिं, आकाशं, खेचरान्, अमरान् तथा ब्रह्मादीन् नमस्कृत्य पूर्वाभिमुखं वा उत्तराभिमुखं वा उपविशेत्। अनन्तरं जलं, फलानि, कुशान्, गन्धं च गृहीत्वा विधिपूर्वकं व्रतस्य सङ्कल्पं कुर्यात्।

” ममाखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये “

अधुना मध्याह्नसमये कृष्णतिलमिश्रितजलेन स्नानं कृत्वा देवक्यै ‘सूतिगृहम्’ नियोजयेत्। ततः भगवान् श्रीकृष्णस्य प्रतिमां वा चित्रं वा स्थापयेत्। प्रतिमायां बालकं श्रीकृष्णं स्तनपाययन्ती देवकी भवेत् तथा लक्ष्मीः तस्याः चरणौ स्पृशन्ती भवेत् अथवा तादृशो भावः प्रदर्शनीयः। ततः विधिविधानपूर्वकं पूजनं कुर्यात्। पूजने देवकीं, वसुदेवं, बलदेवं, नन्दं, यशोदां, लक्ष्मीं च क्रमेण निर्दिशेत्।

ततः निम्नलिखितेन मन्त्रेण पुष्पाञ्जलिं समर्पयेत्-

‘प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामनः।

वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नमः।

सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं मे गृहाणेमं नमोऽस्तु ते।

‘अन्ते प्रसादवितरणं कृत्वा भजन-कीर्तनं कुर्वन् रात्रिजागरणं कुर्यात्।

यः जनमाष्टमी-व्रतं करोति, सः ऐश्वर्यं मोक्षं च प्राप्नोति। आयुः, कीर्तिम्, यशः, लाभं, पुत्रान् पौत्रांश्च प्राप्य अस्मिन्नेव जन्मनि सर्वविधानि सुखानि भुक्त्वा अन्ते मोक्षं प्राप्नोति। ये मनुष्याः भक्तिभावेन श्रीकृष्णस्य कथां शृण्वन्ति, तेषां समस्तानि पापानि विनश्यन्ति। ते उत्तमां गतिं प्राप्नुवन्ति।

श्रीकृष्णजन्मोत्सवस्य कथा।

  • कंसस्य अत्याचारः: मथुरायाः राजा कंसः अत्याचारान् वर्धितवान् आसीत्। सः स्वभगिनीं देवकीं तस्याः पतिं वसुदेवं च कारागारे अबध्नात्।
  • अष्टमावतारस्य प्राकट्यम्: यदा अष्टमः पुत्रः जन्मं प्राप्तुं प्रवृत्तः आसीत्, तदा कारागारे कठोरं रक्षणम् आसीत्। भाद्रपद-अष्टम्याः घोरान्धकारपूर्णरात्रौ भगवान् श्रीकृष्णः प्रादुरभवत्।
  • वसुदेवस्य गोकुलप्रस्थानम्: वसुदेवः आकाशवाण्या भगवतः निर्देशेन च ज्ञातवान् यत् नन्दग्रामे यशोदायाः गृहे कन्या (माया) जाता।
  • चमत्कारः: प्रहरीणः सुप्ताः अभवन्, कारागारस्य द्वाराणि उद्घाटितानि अभवन्, तथा च उफनन्ती यमुना वसुदेवाय पारं गन्तुं मार्गम् अददात्।
  • गोकुले आदान-प्रदानम्: वसुदेवः कान्हां नन्दबाबोः गृहे सुरक्षितं शायितवान् तथा तत्र जातां कन्यां गृहीत्वा मथुरां प्रत्यागच्छत्। ततः कंसस्य अन्तः अभवत् तथा पृथिव्यां धर्मस्य स्थापना अभवत्।

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