Rakhi ki Kahani:रक्षा बंधन का पर्व क्यों मनाया जाता है? जानिए राखी से जुड़ी 4 पौराणिक कथाएं। Why is Raksha Bandhan Celebrated? Know 4 Mythological Stories Associated with the Sacred Festival of Rakhi. रक्षाबन्धनपर्व किमर्थं आचर्यते? रक्षासूत्रेण सम्बद्धाः चतस्रः पौराणिकाः कथाः ज्ञातव्याः।

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रक्षा बंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक माना जाता है। हर साल इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उनकी सुख-समृद्धि और लंबी उम्र की कामना करती हैं। वहीं, भाई भी बहनों की रक्षा और हर परिस्थिति में उनका साथ देने का संकल्प लेते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि राखी बांधने की यह परंपरा आखिर शुरू कैसे हुई और इसके पीछे कौन-सी पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं?

सावन पूर्णिमा पर मनाया जाता है रक्षा बंधन, जानिए कैसे शुरू हुई राखी की परंपरा।

हर वर्ष सावन पूर्णिमा के पावन अवसर पर रक्षा बंधन यानी राखी का त्योहार पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस बार रक्षा बंधन 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाया जा रहा है। यह पर्व भाई-बहन के बीच प्रेम, विश्वास, स्नेह और एक-दूसरे की रक्षा के संकल्प का प्रतीक माना जाता है। ‘रक्षा बंधन’ का शाब्दिक अर्थ ही रक्षा का बंधन यानी सुरक्षा का पवित्र धागा है।

इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी या रक्षासूत्र बांधकर उनकी लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं। इसके बदले भाई अपनी बहनों की हर परिस्थिति में रक्षा करने और उनका साथ निभाने का संकल्प लेते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पवित्र पर्व की शुरुआत कैसे हुई और इसके पीछे कौन-कौन सी पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हैं? आइए जानते हैं रक्षा बंधन से जुड़ी प्रमुख पौराणिक कथाएं।

माता लक्ष्मी और राजा बलि से जुड़ी है रक्षा बंधन की पौराणिक कथा

रक्षा बंधन से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा का संबंध माता लक्ष्मी और राजा बलि से बताया जाता है। मान्यता के अनुसार, एक समय राजा बलि ने भगवान विष्णु को पाताल लोक का द्वारपाल बना लिया था। भगवान विष्णु के पाताल लोक चले जाने से माता लक्ष्मी चिंतित हो गईं। इसके बाद नारद जी की सलाह पर माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को वापस वैकुंठ लाने का उपाय किया।

कहा जाता है कि माता लक्ष्मी ने एक गरीब स्त्री का रूप धारण किया और पाताल लोक पहुंचीं। वहां उन्होंने राजा बलि की कलाई पर रक्षासूत्र यानी राखी बांधी। राखी बंधवाने के बाद राजा बलि ने माता लक्ष्मी से उपहार मांगने के लिए कहा। तब माता लक्ष्मी ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया और राजा बलि से भगवान विष्णु को वापस वैकुंठ ले जाने की इच्छा जताई। राजा बलि ने उनकी इच्छा स्वीकार कर भगवान विष्णु को उनके साथ जाने की अनुमति दे दी। इसी कथा को भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और रक्षा बंधन की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।

कथा के अनुसार, राजा बलि ने अपनी बहन माता लक्ष्मी को दिए वचन का सम्मान करते हुए भगवान विष्णु को वापस वैकुंठ लोक जाने की अनुमति दे दी। मान्यता है कि यह घटना सावन माह की पूर्णिमा के दिन हुई थी। इसी पौराणिक प्रसंग को रक्षा बंधन की परंपरा की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है। कहा जाता है कि तभी से सावन पूर्णिमा के दिन भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और रक्षा के संकल्प का यह पवित्र पर्व मनाने की परंपरा चली आ रही है।

भगवान कृष्ण और द्रौपदी के पवित्र बंधन से जुड़ी है रक्षा बंधन की कथा।

एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार, महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण ने जब सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया, तब उनकी उंगली पर चोट लग गई और रक्त बहने लगा। यह देखकर द्रौपदी ने बिना देर किए अपनी साड़ी का एक हिस्सा फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया, जिससे रक्तस्राव रुक सके। द्रौपदी के इस स्नेह, समर्पण और सेवा भाव से भगवान कृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने द्रौपदी को हर संकट और परिस्थिति में उसकी रक्षा करने का वचन दिया। मान्यता है कि बाद में कौरवों की सभा में चीरहरण के प्रसंग के दौरान भगवान कृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाकर अपने इस वचन को निभाया। इसी कथा को भाई-बहन के प्रेम, स्नेह और रक्षा के पवित्र भाव से जोड़कर देखा जाता है।

यमराज और यमुना के पवित्र भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ी है यह पौराणिक कथा

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, यमराज और उनकी बहन यमुना काफी समय से एक-दूसरे से नहीं मिल पाए थे। एक दिन यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया। बहन का निमंत्रण स्वीकार कर यमराज उनके घर पहुंचे। यमुना ने भाई का प्रेमपूर्वक स्वागत किया, उनका आदर-सत्कार किया, माथे पर तिलक लगाया और उनकी कलाई पर रक्षासूत्र बांधा।

यमुना के स्नेह और सत्कार से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान मांगने के लिए कहा। तब यमुना ने इच्छा जताई कि यमराज हर वर्ष इसी दिन उनसे मिलने आएं। मान्यता है कि जिस दिन यमराज अपनी बहन यमुना से मिलने पहुंचे, उस दिन सावन पूर्णिमा थी। यमुना ने यह भी कहा कि जो बहन इस दिन अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधे, उसे भय से मुक्ति मिले। इसी पौराणिक प्रसंग को रक्षा बंधन की परंपरा की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है।

इंद्राणी ने देवराज इंद्र की कलाई पर बांधा रक्षासूत्र, रक्षा बंधन से जुड़ी है यह पौराणिक कथा।

भविष्य पुराण में वर्णित एक पौराणिक प्रसंग के अनुसार, देवताओं और असुरों के बीच हुए युद्ध में जब देवता लगातार कमजोर पड़ने लगे, तब इंद्राणी यानी शची ने देवगुरु बृहस्पति की सलाह ली। मान्यता है कि सावन पूर्णिमा के दिन इंद्राणी ने देवराज इंद्र की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा। कहा जाता है कि रक्षासूत्र के प्रभाव और आशीर्वाद से देवताओं का मनोबल बढ़ा और अंततः देवराज इंद्र सहित देवताओं को युद्ध में विजय प्राप्त हुई। इसी प्रसंग को रक्षा बंधन से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं में शामिल किया जाता है।

( English)

The festival of Raksha Bandhan is considered a symbol of love, trust and affection between brothers and sisters. On this special occasion, sisters tie a sacred thread, or Rakhi, on their brothers’ wrists and pray for their happiness, prosperity and long life. In return, brothers pledge to protect and support their sisters through every situation. But do you know how this tradition of tying Rakhi began and which mythological stories are associated with it?

Raksha Bandhan, also known as Rakhi, is celebrated every year on the auspicious occasion of Sawan Purnima with great enthusiasm and devotion across the country. This year, the festival will be observed on Friday, August 28, 2026. The festival symbolizes the bond of love, trust and affection between brothers and sisters, along with a sacred promise of protection.

The term ‘Raksha Bandhan’ literally refers to a bond of protection. On this day, sisters tie a Rakhi or sacred thread around their brothers’ wrists and pray for their long life, prosperity, happiness and well-being. Brothers, in return, pledge to protect and support their sisters in every situation. But do you know how this sacred tradition began and which mythological beliefs are associated with the festival?

Goddess Lakshmi Tied a Rakhi to King Bali: The Mythological Story of Lord Vishnu’s Return to Vaikuntha.

A popular mythological story associated with Raksha Bandhan is linked to Goddess Lakshmi and King Bali. According to the legend, King Bali once appointed Lord Vishnu as the gatekeeper of the netherworld, or Patala Lok. With Lord Vishnu away in Patala Lok, Goddess Lakshmi became deeply concerned. Following Narada’s advice, she decided to find a way to bring her husband back to Vaikuntha.

It is believed that Goddess Lakshmi disguised herself as a poor woman and went to Patala Lok. There, she tied a sacred protection thread, or Rakhi, around King Bali’s wrist. After receiving the Rakhi, King Bali asked her to choose a gift. Goddess Lakshmi then revealed her true identity and expressed her wish to take Lord Vishnu back to Vaikuntha. Respecting her request, King Bali allowed Lord Vishnu to return with her. This traditional legend is often associated with the sacred bond symbolized by Raksha Bandhan.

According to the legend, King Bali honored the promise he had made to his sister, Goddess Lakshmi, and allowed Lord Vishnu to return to Vaikuntha. It is believed that this incident took place on the full moon day of the month of Shravan. This mythological episode is traditionally associated with the origin of Raksha Bandhan. Since then, according to popular belief, the festival has been celebrated on Shravan Purnima as a symbol of the love, trust and sacred bond between brothers and sisters.

The Sacred Bond Between Lord Krishna and Draupadi: A Mythological Story Linked to Raksha Bandhan.

According to another popular mythological legend, during the Mahabharata era, Lord Krishna injured his finger after using the Sudarshan Chakra to defeat Shishupala, causing it to bleed. Seeing this, Draupadi immediately tore a piece of cloth from her saree and tied it around Krishna’s finger to stop the bleeding. Touched by her affection, care and selfless gesture, Lord Krishna promised to protect Draupadi in every difficult situation. It is believed that later, during the disrobing episode in the Kaurava court, Lord Krishna protected Draupadi’s honor and fulfilled his promise. This story is traditionally associated with the sacred spirit of love, affection and protection symbolized by Raksha Bandhan.

The Mythological Story of the Sacred Sibling Bond Between Yamaraj and Yamuna.

According to another mythological legend, Yamaraj and his sister Yamuna had been unable to meet each other for a long time. One day, Yamuna invited her brother to her home for a meal. Accepting her invitation, Yamaraj arrived at his sister’s house, where Yamuna warmly welcomed and honored him. She applied a tilak on his forehead and tied a sacred protection thread around his wrist.

Pleased by his sister’s affection and hospitality, Yamaraj asked Yamuna to seek a boon. Yamuna wished that he would visit her every year on the same day. According to the belief, the day Yamaraj visited his sister was Shravan Purnima. Yamuna also wished that any sister who tied a sacred thread on her brother’s wrist on this day would be blessed with freedom from fear. This traditional legend is associated with the origin and significance of Raksha Bandhan.

Goddess Indrani Tied a Sacred Thread to Lord Indra: A Mythological Tale Linked to Raksha Bandhan.

According to a mythological account mentioned in the Bhavishya Purana, the gods began to lose ground during a battle between the gods and demons. At that time, Indrani, also known as Shachi, sought the guidance of Brihaspati, the preceptor of the gods. It is believed that on the full moon day of Shravan, Indrani tied a sacred protection thread around Lord Indra’s wrist. According to the legend, the sacred thread and divine blessings strengthened the morale of the gods, eventually leading Lord Indra and the gods to victory. This episode is considered one of the mythological traditions associated with Raksha Bandhan.

(संस्कृत)

रक्षाबन्धनपर्व भ्रातृभगिन्योः प्रेम्णः, विश्वासस्य च स्नेहस्य प्रतीकं मन्यते। अस्मिन् विशेषे दिवसे भगिन्यः भ्रातॄणां हस्तेषु रक्षासूत्रं बद्ध्वा तेषां सुखसमृद्धेः दीर्घायुष्यस्य च कामनां कुर्वन्ति। भ्रातरश्च भगिनीभ्यः सर्वासु परिस्थितिषु रक्षणस्य साहाय्यस्य च संकल्पं कुर्वन्ति। किन्तु किं भवन्तः जानन्ति यत् रक्षासूत्रबन्धनस्य एषा परम्परा कथम् आरब्धा तथा च तस्याः पृष्ठे काः पौराणिककथाः सम्बद्धाः सन्ति?

प्रतिवर्षं श्रावणमासस्य पूर्णिमायां रक्षाबन्धनपर्व, अथवा राखीपर्व, सम्पूर्णे देशे हर्षोल्लासेन श्रद्धया च आचर्यते। अस्मिन् वर्षे रक्षाबन्धनपर्व शुक्रवासरे, अगस्तमासस्य २८ दिनाङ्के, २०२६ तमे वर्षे भविष्यति। एतत् पर्व भ्रातृभगिन्योः प्रेम्णः, विश्वासस्य, स्नेहस्य तथा परस्पररक्षणस्य संकल्पस्य च प्रतीकं मन्यते। ‘रक्षाबन्धनम्’ इत्यस्य अर्थः रक्षणस्य पवित्रबन्धनम् इति भवति।

अस्मिन् दिवसे भगिन्यः भ्रातॄणां हस्तेषु राखीं अथवा रक्षासूत्रं बध्नन्ति तथा तेषां दीर्घायुः, सुखसमृद्धिः, सौख्यं च कामयन्ते। भ्रातरश्च भगिनीभ्यः सर्वासु परिस्थितिषु रक्षणस्य साहाय्यस्य च वचनं ददति। किन्तु किं भवन्तः जानन्ति यत् एतत् पवित्रं पर्व कथम् आरब्धम् तथा च तेन सह काः पौराणिकाः मान्यताः सम्बद्धाः सन्ति?

देवी लक्ष्म्याः असुरराजस्य बलेः च सम्बद्धा रक्षाबन्धनस्य पौराणिकी कथा।

रक्षाबन्धनपर्वसम्बद्धा एका प्रसिद्धा पौराणिककथा देवी लक्ष्म्याः राज्ञः बलेः च सम्बन्धिता अस्ति। पौराणिकमान्यतानुसारं एकदा राजा बलिः भगवन्तं विष्णुं पाताललोकस्य द्वारपालरूपेण नियुक्तवान्। भगवति विष्णौ पाताललोकं गते सति देवी लक्ष्मीः अत्यन्तं चिन्तितवती। ततः नारदमुनेः परामर्शेन सा स्वपतिं विष्णुं पुनः वैकुण्ठं नेतुं उपायं चिन्तितवती।

कथानुसारं देवी लक्ष्मीः निर्धनस्त्रियाः रूपं धृत्वा पाताललोकम् अगच्छत्। तत्र सा राज्ञः बलेः हस्ते रक्षासूत्रं बद्धवती। रक्षासूत्रबन्धनानन्तरं राजा बलिः तस्यै उपहारं दातुम् इच्छितवान्। तदा देवी लक्ष्मीः स्वस्य वास्तविकं रूपं प्रकट्य भगवन्तं विष्णुं पुनः वैकुण्ठं नेतुम् इच्छां प्रकटितवती। राज्ञा बलिना तस्याः इच्छा स्वीकृता तथा भगवतः विष्णोः वैकुण्ठगमनाय अनुमतिः प्रदत्ता। एषा पौराणिकी कथा रक्षाबन्धनस्य पवित्रपरम्परया सह सम्बद्धा इति मान्यता अस्ति।

पौराणिककथानुसारं राजा बलिः स्वभगिन्यै देव्यै लक्ष्म्यै दत्तं वचनं सम्मान्य भगवन्तं विष्णुं पुनः वैकुण्ठलोकं गन्तुम् अनुमतिं दत्तवान्। एषा घटना श्रावणमासस्य पूर्णिमायां तिथौ अभवत् इति मान्यता अस्ति। एतं पौराणिकप्रसङ्गं रक्षाबन्धनपर्वस्य प्रारम्भेन सह सम्बद्धं मन्यन्ते। लोकमान्यतानुसारं तस्मादेव कालात् श्रावणपूर्णिमायां भ्रातृभगिन्योः प्रेम्णः, विश्वासस्य, स्नेहस्य च पवित्रबन्धनस्य प्रतीकरूपेण रक्षाबन्धनपर्व आचरितुं परम्परा प्रवृत्ता।

भगवतः कृष्णस्य द्रौपद्याः च पवित्रबन्धनेन सम्बद्धा रक्षाबन्धनस्य पौराणिकी कथा।

अन्यया पौराणिककथया अनुसारं महाभारतकाले भगवान् श्रीकृष्णः सुदर्शनचक्रेण शिशुपालस्य वधं कृतवान्। तस्मिन् समये तस्य अङ्गुल्यां क्षतिः जाता, ततः रक्तं प्रवाहितुम् आरब्धम्। एतत् दृष्ट्वा द्रौपदी शीघ्रं स्वस्याः साटिकायाः एकं भागं विदार्य भगवतः कृष्णस्य अङ्गुल्यां अबध्नात्, येन रक्तस्रावः स्थगितः भवेत्।

द्रौपद्याः प्रेम्णा, सेवाभावेन च प्रसन्नः भगवान् कृष्णः तस्यै सर्वासु परिस्थितिषु रक्षणस्य वचनं दत्तवान्। पौराणिकमान्यतानुसारं पश्चात् कौरवाणां सभायां द्रौपद्याः चीरहरणस्य समये भगवान् कृष्णः तस्याः लज्जां रक्षित्वा स्ववचनं पालयामास। एषा कथा भ्रातृभगिन्योः प्रेम्णः, स्नेहस्य रक्षणस्य च पवित्रभावेन सह सम्बद्धा इति मान्यता अस्ति।

यमराजस्य यमुनायाश्च पवित्रभ्रातृभगिनीसम्बन्धेन सम्बद्धा पौराणिकी कथा।

अन्यया पौराणिककथया अनुसारं यमराजः तस्य भगिनी यमुना च दीर्घकालं यावत् परस्परं मिलितुं न अशक्नुताम्। एकदा यमुना स्वभ्रातरं यमराजं स्वगृहे भोजनाय आमन्त्रितवती। यमराजः तस्याः आमन्त्रणं स्वीकृत्य भगिन्याः गृहम् आगतवान्। यमुना प्रेमपूर्वकं भ्रातरं स्वागतेन सत्कारेण च सम्मानितवती। सा तस्य ललाटे तिलकं कृत्वा हस्ते रक्षासूत्रं च अबध्नात्।

भगिन्याः स्नेहेन सत्कारेण च प्रसन्नः यमराजः यमुनां वरं याचितुं उक्तवान्। तदा यमुना इच्छां प्रकटितवती यत् सः प्रतिवर्षम् अस्मिन्नेव दिने तस्याः समीपम् आगच्छेत्। मान्यतानुसारं यस्मिन् दिने यमराजः स्वभगिनीं यमुनां द्रष्टुम् आगतवान्, सः दिवसः श्रावणपूर्णिमायाः आसीत्। यमुनया एतदपि उक्तं यत् या भगिनी अस्मिन् दिने स्वभ्रातुः हस्ते रक्षासूत्रं बध्नाति, सा भयात् मुक्तिं प्राप्नुयात्। एषः पौराणिकप्रसङ्गः रक्षाबन्धनपर्वस्य प्रारम्भेन सह सम्बद्धः इति मान्यता अस्ति।

इन्द्राण्या देवराजस्य इन्द्रस्य हस्ते बद्धं रक्षासूत्रम्, रक्षाबन्धनसम्बद्धा पौराणिकी कथा।

भविष्यपुराणे वर्णितस्य एकस्य पौराणिकप्रसङ्गस्य अनुसारं देवानाम् असुराणां च युद्धे यदा देवाः पराजयं प्राप्नुवन्तः आसन्, तदा इन्द्राणी शची देवगुरोः बृहस्पतेः परामर्शम् अगृह्णात्। मान्यतानुसारं श्रावणपूर्णिमायां तिथौ इन्द्राणी देवराजस्य इन्द्रस्य हस्ते रक्षासूत्रं बद्धवती। कथानुसारं रक्षासूत्रस्य प्रभावेन दैवीयाशीर्वादेन च देवानां मनोबलं वर्धितम् तथा अन्ते देवराजः इन्द्रः देवाश्च युद्धे विजयम् अलभन्त। अयं पौराणिकप्रसङ्गः रक्षाबन्धनपर्वसम्बद्धासु मान्यतासु एकः इति मन्यते।

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